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ममता बनर्जी को हल्के में लेने की गलती…

ममता बनर्जी को हल्के में लेने की गलती…

by रमेश पतंगे
in राजनीति
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ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल में 15 वर्ष सत्ता रही। पिछले डेढ़ महीने में ममता बनर्जी के बारे में और उनके वफादार सहयोगियों के बारे में सभी समाचार चैनलों पर बयानों की बौछार हो रही है। जब तक कोई दूसरा गरम विषय नहीं मिल जाता, यह नौटंकी जारी रहेगी।

ममता बनर्जी के लगभग 58 विधायक उन्हें छोड़कर चले गए और 20 सांसद भी छोड़कर चले गए, इन खबरों को भी रंग-रंग कर विस्तार से बताया जाता है। जहाज डूबने लगता है तो उसमें चूहे पहले भागने लगते हैं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का जहाज डूबने लगा है। ऐसे डूबते जहाज में यदि हम बैठे रहे तो हमारा राजनीतिक भविष्य समाप्त हो जाएगा, इसलिए विधायक और सांसद भाग रहे हैं। उनके बारे में जरूरत से ज्यादा सहानुभूति या ‘ममता’ दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ममता बनर्जी का यह कठिन दौर चल रहा है। कुछ लोगों ने उनकी तुलना उद्धव ठाकरे से की है, लेकिन वह उचित नहीं है। ममता बनर्जी एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार से अत्यंत तीव्र संघर्ष करके आगे आई राजनेता हैं। उद्धव ठाकरे सत्ता का सोने का चम्मच लेकर जन्मे हैं। ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर सड़क पर संघर्ष का, पत्थर-लाठियाँ खाने का, सिर फटवाने का, आम जनता में घुलने-मिलने का है। उद्धव ठाकरे का सफर आलीशान गाड़ियों में दौरे करने का और श्रोताओं को पेटभर उपदेश देने का और विरोधियों को गालियाँ देने का है।

Mamata Banerjee meets Uddhav Thackeray, Sharad Pawar; to campaign for UBT  in Maharashtra | Mumbai News - Times of India

ममता बनर्जी राजनीति में कुशल नेता हैं। पार्टी का निर्माण कैसे करना है, कार्यकर्ताओं को कैसे प्रेरित करना है, जनता के किन मुद्दों को उठाना है, कौन-सी भावनात्मक चुनौती दी जाए तो जनता उनके पीछे खड़ी हो जाएगी, इस बारे में उनका ज्ञान निर्विवाद है। बंगाल में कम्युनिस्टों की सत्ता को लोकतांत्रिक तरीके से उखाड़ फेंकना बेहद मुश्किल काम था। कम्युनिस्टों का इतिहास ऐसा है कि एक बार हाथ आई सत्ता को वे प्राण जाते हुए भी नहीं जाने देते। सत्ता बनाए रखने के लिए दूसरों के प्राण लेने में उनकी बराबरी करने वाला कोई दूसरा राजनीतिक दल नहीं है।

ਸਟ੍ਰੀਟ ਫਾਈਟਰ' ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਨੂੰ ...

ऐसे दल को ममता बनर्जी ने बंगाल से समाप्त कर दिया, यह उनका बहुत बड़ा राष्ट्रीय कार्य है और उसी के साथ उनका यह कार्य बंगाल का चेहरा-मोहरा बदल डालने वाला सिद्ध हुआ। लोगों की अपेक्षाएँ ऐसी हो गईं कि अब बंगाल राष्ट्रीय अस्मिता से खड़ा रहेगा, बंगाल की वह खासियत है, परंतु ममता बनर्जी कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी वाले रास्ते पर चल दीं। घुसपैठिए मुसलमानों को उन्होंने बंगाल में मतदाता बनाया और उनकी अत्यधिक चापलूसी एवं तुष्टीकरण किया। गुंडों का भय उत्पन्न करके चुनाव जीतने का गुंडागर्दी वाला रास्ता उन्होंने अपना लिया। परिणाम यह हुआ कि उनका राज्य समाप्त हो गया।

ममता का राज्य (सत्ता) गई, फिर भी ममता उद्धव ठाकरे नहीं हैं, यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए। ममता बनर्जी के मामले में गाफिल रहने की गलती नहीं करनी चाहिए। अत्यंत विपरीत परिस्थिति में फिर से खड़े होने की क्षमता उनमें है। लंबे समय तक वे कांग्रेस में रहीं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उनकी ऐसी घेराबंदी की कि कई लोगों को लगा कि उनका राजनीतिक भविष्य समाप्त हो गया। 1998 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस स्थापित करने का फैसला लिया। वह प्रसंग अत्यंत नाटकीय है। वह ममता बनर्जी के चरित्र (जीवनी) में पढ़ने को मिलेगा।

To be relevant in 2019, Congress must rewind to 1996-2004

सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों को आखिरी क्षण में ममता बनर्जी ने कैसे मात दी, यह सारा इतिहास है। इसके बाद प्रचंड संघर्ष करके 2011 में उन्होंने बंगाल में सत्ता-परिवर्तन कर दिखाया। उनके उदय के कारण कांग्रेस समाप्त हुई और कम्युनिस्ट पार्टी भी समाप्त हुई। इतना सामर्थ्य उनके पास है, इसका विस्मरण नहीं होने देना चाहिए। फिर से कहना है कि ममता, उद्धव ठाकरे नहीं हैं। जिन्हें राजनीति के दाँव-पेंच नहीं समझते, सही निर्णय लेने का सही समय कौन-सा है इसका ज्ञान जिनके पास नहीं है, ऐसे राजनेता को ‘उद्धव ठाकरे’ कहते हैं। ममता बनर्जी का मतलब है निरंतर संघर्ष, सटीक निर्णय लेने की क्षमता और जनभावना की उत्तम जानकारी।

उद्धव ठाकरे यांच्या अडचणीत वाढ? | Shivsena UBT Uddhav Thackeray increase  problem in the case of Murud korlai nineteen Bungalow

ममता बनर्जी के बारे में गलत-सही अनेक वीडियो चल रहे हैं। साथ ही उनका खूब मजाक उड़ाने वाले भी वीडियो चल रहे हैं। ये सभी कृत्य करने वाले भाजपा की सेवा नहीं कर रहे, बल्कि कल भाजपा को मुसीबत में डालने के गड्ढे खोद रहे हैं। ममता बनर्जी को जनता ने नकार दिया है। जनता की स्वीकृति और अस्वीकृति जब चरम पर पहुँच जाते हैं, तो वे खतरनाक होते हैं क्योंकि ऐसे फैसले जनता भावना के आवेश में लेती है और भावनाएँ कभी स्थायी नहीं रहतीं। 1977 में जनता ने इंदिरा गांधी को भी हराया था और 1980 में उसी इंदिरा गांधी को दो-तिहाई बहुमत देकर चुनकर लाया, जनमत ऐसा होता है।

Khela ho gaya': Dressed as Mamata Banerjee, social media influencer mimics  TMC chief amid saffron surge | Today News

जनमत ममता बनर्जी के अनुकूल हो, ऐसा कोई भी निर्णय सत्ताधारी पार्टी ने किया तो वह उल्टा चाबुक बनकर उन्हीं पर वापस आएगा। ममता बनर्जी को गिरफ्तार करना या कोर्ट में घसीटना अथवा उन पर अजीबोगरीब आरोप लगाना— ये सभी मुद्दे भावनाओं को इधर-उधर करने वाले सिद्ध होंगे, इसका ध्यान रखना चाहिए। जीत प्राप्त करना कठिन होता है, लेकिन उससे भी मुश्किल प्राप्त की गई जीत को पचाना होता है— यह राजसत्ता का चिरकालिक सिद्धांत नहीं भूलना चाहिए।

– रमेश पतंगे

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Tags: CPM West BengalIndian ElectionsIndira Gandhi 1977mamata banerjeePolitical AnalystPolitical StrategyPublic OpinionTMC CrisisUddhav ThackerayWest Bengal Politicsजमीनी राजनीतिरमेश पतंगेराजनीतिक विमर्शवैचारिक लेख

रमेश पतंगे

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