वाकई बड़ी ताकतों से टक्कर का हौसला है। वह केवल डीप स्टेट से टकराना नहीं है, उससे भी डीपर इल्यूमिनाती से टकराना है। नये FCRA Rules एक उत्तर हैं उन लोगों को जो भारत को टेकन फॉर ग्रांटेड लेते हैं। इस हद तक कि सनातन को डेंगू मलेरिया कहें। इस हद तक कि भारत के कई अंचलों का जनसांख्यिकीय चरित्र बदल जाए। दुनिया का कोई देश इस तरह से विदेशी धन का ऐसा खुला नाट्य अपनी भूमि पर नहीं होने देता।
ओशो याद है। जिस अमेरिका ने ओशो को विचार की स्वतंत्रता नहीं दी- वीज़ा रद्द किया, देश निकाला किया। परंतु वही अमेरिका भारत में धर्म-प्रचार की निर्बाध स्वतंत्रता चाहता है। किन्तु यह संप्रभुता का प्रश्न है, धर्म का नहीं।
FCRA धर्म-आधारित नहीं है। यह सभी विदेशी वित्तपोषित संगठनों पर समान रूप से लागू है— चाहे हिंदू हों, ईसाई, मुस्लिम, या पर्यावरण संगठन। जो Greenpeace, Amnesty और ActionAid पर लागू हुआ, वही मिशनरी संगठनों पर भी लागू होता है। FCRA का मूल उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हित के विरुद्ध विदेशी अंशदान के दुरुपयोग को रोकना है- यह किसी पंथ के विरुद्ध नहीं, संप्रभुता के पक्ष में है।
विश्व का कोई भी गंभीर राष्ट्र विदेशी धन को बिना निगरानी के अपनी भूमि पर सामाजिक-धार्मिक पुनर्संरचना का साधन नहीं बनने देता। भारत का FCRA न केवल वैध है— वह वैश्विक मानकों की तुलना में अपेक्षाकृत उदार भी है। जो इसका विरोध करते हैं, वे पारदर्शिता के विरोधी हैं, धर्म के पक्षधर नहीं।
जो राष्ट्र भारत के FCRA की आलोचना करते हैं उनके अपने कानून:
अमेरिका— FARA उल्लंघन पर 5 वर्ष कारावास (भारत का 3 गुना);
अधिकारियों पर आपराधिक दायित्व।
ऑस्ट्रेलिया— विदेशी हस्तक्षेप पर 20 वर्ष कारावास (भारत का लगभग 7 गुना); यह भारत के FCRA के किसी भी प्रावधान से तुलनीय नहीं।
Foreign Influence Transparency Scheme 10 दिसंबर 2018 को लागू हुई। इसका उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया की सरकार और राजनीति पर विदेशी प्रभाव की प्रकृति, स्तर और विस्तार को सार्वजनिक दृष्टि में लाना है।
चीन— विदेशी NGO सुरक्षा मंत्रालय के अधीन, धार्मिक गतिविधियाँ पूर्णतः प्रतिबंधित, धन-संग्रह निषिद्ध, एक-वर्ष पूर्व अनुमोदन अनिवार्य। विदेशी NGO को अपनी वार्षिक गतिविधि योजना, परियोजना कार्यान्वयन और धन-उपयोग का विवरण एक वर्ष पूर्व अपने Professional Supervisory Unit को भेजना अनिवार्य है।
भारत के FCRA में ऐसा कोई एक-वर्ष का पूर्व-अनुमोदन नहीं। केवल वार्षिक लेखा FC-4 प्रपत्र में प्राप्ति के बाद प्रस्तुत करना है। तुलनात्मक निष्कर्ष यह कि चीन का प्रावधान भारत से अत्यधिक कठोर है— धन खर्च होने से पहले वार्षिक अनुमोदन। जिस विदेशी NGO का पंजीकरण रद्द किया जाए, वह 5 वर्ष तक चीन में कोई कार्यालय स्थापित नहीं कर सकती और कोई गतिविधि नहीं कर सकती।
यदि संगठन अनुच्छेद 47 का उल्लंघन करे तो सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय उसे “अवांछित” घोषित कर सकता है। चीन में विदेशी NGO सीधे सुरक्षा-बल के नियंत्रण में हैं। भारत में पंजीकरण MHA के पास है।
इज़राइल — 50% से अधिक विदेशी वित्तपोषित NGO को हर प्रकाशन, TV, होर्डिंग पर घोषणा अनिवार्य। इज़राइली कानून की माँग है कि विदेशी वित्तपोषण पर निर्भर संगठन इसे सार्वजनिक अधिकारियों के साथ सभी संचार में, टीवी, समाचारपत्रों, होर्डिंग और ऑनलाइन में घोषित करें। इन समूहों के प्रतिनिधियों को संसदीय समिति की बैठकों में भाग लेते समय भी विदेशी वित्तपोषण घोषित करना होगा।
फ्रांस ने हाल ही में विदेशी हस्तक्षेप पर एक कानून पारित किया है जिसमें विभिन्न ऑनलाइन निगरानी उपाय और विदेशी हित-प्रतिनिधित्व करने वाले समूहों के लिए एक रजिस्ट्री शामिल है। दिसंबर 2023 में यूरोपीय आयोग ने भी “तृतीय देशों की ओर से हित-प्रतिनिधित्व की पारदर्शिता पर एक निर्देश” का प्रस्ताव रखा जिसने विदेशी वित्तपोषित संगठनों का रजिस्टर बनाने के प्रस्ताव से यूरोपीय नागरिक समाज में हलचल मचा दी।
ब्रिटेन की Foreign Influence Registration Scheme (FIRS) 2024 में लागू हुई। इसके दो स्तर हैं— राजनीतिक प्रभाव स्तर पर उन संगठनों या व्यक्तियों को सरकार के साथ पंजीकरण अनिवार्य है जिनकी वित्तपोषण व्यवस्था में किसी विदेशी शक्ति के निर्देश पर ब्रिटेन में पैरोकारी या अभियान-गतिविधियाँ शामिल हों।
भारत का FCRA- पंजीकरण, उद्देश्य-सीमित उपयोग, एकल खाता, पदाधिकारी पहचान और 20% प्रशासनिक व्यय-सीमा- इन सबकी तुलना में न्यूनतम कठोर और अधिकतम पारदर्शिता-केंद्रित विधान है। आलोचना का एकमात्र आधार यह है कि आलोचक भारत की संप्रभुता को अपवाद मानते हैं- नियम नहीं।
2013 के एक अध्ययन के अनुसार 98 देशों में से 51 देश या तो विदेशी NGO वित्तपोषण पर प्रतिबंध (12 देश) लगाते हैं या सीधा प्रतिबंध (39 देश) लगाते हैं। जो देश भारत की आलोचना करते हैं— अमेरिका, UK, ऑस्ट्रेलिया, इज़राइल— उन सबके पास अपने-अपने कड़े कानून हैं। यह दोहरा मापदंड राजनीतिक है, वैधानिक नहीं।
मैं नहीं कहता कि समस्या का पूरा उत्तर पा लिया गया है। FCRA एक राष्ट्रीय विधिक उपकरण है। वह दृश्य वित्तपोषण को नियंत्रित कर सकता है। किंतु एक Subterranean संरचना है जो crypto-finance, think-tank infiltration, academic capture और media ownership के माध्यम से काम करती है- जो FCRA की पहुँच से बाहर है। किन्तु FCRA के 2020 और 2025 के संशोधन बताते हैं कि देश में कोई देख रहा है।
– मनोज श्रीवास्तव
