| जी-7 में शामिल होना वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते कद का परिचायक है। वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों से निपटने और विश्व व्यवस्था को आकार देने में भारत अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, परंतु वहीं अविश्वसनीय अमेरिका व राष्ट्रपति ट्रम्प की टेड़ी चाल को समझकर भारत को आगे का मार्ग प्रशस्त करना होगा। |
जी-7 का गठन वर्ष 1975 में हुआ था और भारत 2003 से आमंत्रित होता रहा है। भारत की निरंतर उपस्थिति मात्र प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि विश्व महाशक्ति के रूप में उभरते भारत का प्रमाण है। प्रौद्योगिकी में भारत की प्रगति और कुशल मानव संसाधन के साथ स्थिर लोकतंत्र और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण भारत विश्व की भू-राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यह समूह जीडीपी के दो-तिहाई से अधिक प्रतिनिधित्व करने वाला एक प्रभावशाली आर्थिक शक्ति था, परंतु पिछले दो दशकों में चीन, आसियान देश और भारत जैसी नई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के उभार ने वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को बदल दिया।

फिर भी उन्नत प्रौद्योगिकियों, रक्षा क्षमताओं, हरित नवाचार और साइबर एवं अंतरिक्ष क्षेत्रों में नेतृत्व के कारण जी-7 का प्रभाव अभी भी बना हुआ है। 15 से 17 जून 2026 को फ्रांस के एवियन लेस बैंस में हुए जी-7 की बैठक पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण रही। ईरान और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए, सदस्य देशों ने रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त करने के लिए पहल की तथा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की ट्रम्प से लगभग 16 महीने बाद मुलाकात व वार्ता हुई।
मोदी और ट्रम्प के बीच द्विपक्षीय बैठक ऐसे समय में हुई, जब अमेरिका की विदेश नीति को लेकर भारत में अविश्वास बढ़ा है। होर्मुज जलमार्ग में अमेरिकी नौसेना के हमलों में भारतीय मूल के नाविकों की मौत ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। भारत अमेरिका को अपना सबसे अहम रणनीतिक साझेदार मानता है और आशा करता है कि विदेश में भारतीय नागरिकों के हितों की सुरक्षा होगी। इस बीच अमेरिका द्वारा फिर से इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम यूएस-पैसिफिक कमांड कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त पैसिफिक कमांड की आधिकारिक वेबसाइट पर एरिया ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी सेक्शन में पीओजेके व अक्साई चिन को भारत के हिस्से के रूप में नहीं दिखाया गया है।
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इससे भारत-अमेरिकी रणनीतिक सम्बंधों को पुनर्भाषित करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है। इस बदलाव से क्वाड की घटती प्राथमिकता तथा वाशिंगटन द्वारा भारत की भूमिका को कम करने को लेकर अनुमान लगाया जा सकता है। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने अमेरिकी साझेदारी के प्रति विश्वास दिलाया है। बैठक में दोनों नेताओं ने उभरती और दीर्घकालिक चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श किया, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और वैश्विक आर्थिक विकास शामिल हैं। भारत-अमेरिका की यह साझेदारी केवल पारम्परिक सुरक्षा चिंताओं तक सीमित नहीं है बल्कि ऐसे मुद्दे भी शामिल हैं, जो भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को आकार देने वाले हैं।
शीत युद्ध के समय से रूस भारत के लिए आर्थिक, राजनीतिक व रक्षा ढांचे का आधार रहा है, परंतु वर्ष 1991 में सोवियत संघ के पतन और भारत का आर्थिक मॉडल विफल होने के साथ ही पश्चिम के साथ भारत के सम्बंध निरंतर गहरे होते गए हैं। वर्तमान में भारत से निर्यात का लगभग एक तिहाई पश्चिमी देशों को जाता है। भारतीय पेशेवर और छात्र भी जी-7 देशों को ही प्राथमिकता देते हैं। ट्रम्प के अपने दूसरे कार्यकाल के प्रतिबंधात्मक नीतियों के कारण इसका प्रवाह यूरोप की ओर अवश्य हुआ है। रूस और चीन के साथ एक नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की चर्चा होने के बाद भी भारत की आर्थिक कूटनीति ब्रिक्स की अपेक्षा विकसित पश्चिमी देशों के साथ अधिक केंद्रित रही है।
ग्लोबल साउथ की वैश्विक आवाज और साझा वैश्विक चुनौतियों के समाधान में एक प्रमुख भागीदार के रूप में भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है। आर्थिक साझेदारियों में विविधता लाने और नई तकनीक व आपूर्ति श्रृंखला के बीच बेहतर समन्वय बनाने की नई दिल्ली ने अपने प्रयासों को आगे बढ़ाया है।
इस बैठक के अलावा कई द्विपक्षीय बैठकें हुई, जिसमें यूरोपीय संघ के नेताओं, जर्मनी के चांसलर, यूएई के राष्ट्रपति, ब्रिटेन व कनाडा के प्रधान मंत्री शामिल थे। ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका फर्स्ट के नाम पर अमेरिका के संकीर्ण राष्ट्रीय हितों को साधने का प्रयास करने से अटलांटिक पार विभाजन गहराता जा रहा है। ट्रम्प के नए दृष्टिकोण यूरोप, मध्य पूर्व और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति को गम्भीर रूप से प्रभावित करने वाले हैं।
ट्रम्प न केवल पश्चिम के आंतरिक संतुलन को बल्कि रूस और चीन के साथ उसके सम्बंधों की शर्तों को भी नया रूप देने के प्रयास में हैं। ईरान के साथ समझौते में उन्होंने इजराइल के साथ गठबंधन को तनावपूर्ण बना दिया है, जबकि दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की वैश्विक छवि बदल रहे हैं। ट्रम्प पर अविश्वास होने के कारण पश्चिमी देश अमेरिका पर निर्भरता घटाने के प्रयास में है। यूरोप पहले की तुलना में वर्तमान की स्थिति अलग है तथा अमेरिका की बात को मानने की अब राजनीतिक सीमाएं हैं।
इस बीच भारत और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ता सहयोग आज के वैश्विक स्तर पर शांति, स्थिरता और समृद्धि को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत का ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौता जुलाई महीने से लागू होने वाला है तथा यूरोपीय संघ के साथ एफटीए इस वर्ष के अंत तक होने वाला है। जर्मनी से हमें सबमरिन, तो फ्रांस से राफेल की अगली खेप के साथ ही मेक इन इंडिया के अंतर्गत राफेल भारत में ही बनाए जाने की भी योजना हैं।
भारत-फ्रांस के रक्षा सहयोग, इसरो और फ्रांस की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस के बीच 6 दशक पुराने सहयोग का समृद्ध विरासत के साथ लघु व उन्नत मॉड्यूलर रिएक्टरों के क्षेत्र में सहयोग तथा उच्च स्तरीय तकनीकी साझेदारी परिपक्व हो चुकी है। भारत ने जी- 20 की अध्यक्षता करते हुए भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे की शुरुआत की, जो चीन के बीआरआई से बेहतर है और वैश्विक रणनीतिक गतिशीलता को नया रूप देने में सक्षम है।
स्लोवाकिया की यात्रा किसी भारतीय प्रधान मंत्री की पहली यात्रा थी। हाल के महीनों में नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली के साथ बढ़ते सम्पर्क के बाद अब भारत-स्लोवाकिया के बीच की द्विपक्षीय सहयोग की व्यापक साझेदारी भारत-स्लोवाकिया सम्बंधों के लिए मील का पत्थर सिद्ध होने वाली है। भारतीय मूल के लोगों की वहां की अर्थव्यवस्था और समाज में सार्थक योगदान- व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष, शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग सहित अनेक क्षेत्रों में सम्बंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।
डॉ. नवीन कुमार मिश्र
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