एक ऐसा व्रत जिसे करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होने की मान्यता है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को आने वाली निर्जला एकादशी सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसे भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी भी कहा जाता है।
इस दिन बिना अन्न और बिना जल के व्रत रखने का विधान बताया गया है, इसलिए इसका नाम निर्जला एकादशी पड़ा। यह केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि संयम, तप, भक्ति, आत्मशुद्धि और श्रीहरि की शरणागति का पावन पर्व है।
मान्यता है कि महाभारत काल में भीमसेन अत्यधिक भूख के कारण वर्ष भर की सभी एकादशियाँ नहीं कर पाते थे। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के दिन कठोर निर्जल व्रत रखने का उपदेश दिया और कहा कि यदि यह व्रत श्रद्धा से किया जाए, तो साधक को सभी एकादशियों के पुण्य के समान फल प्राप्त हो सकता है। तभी से यह एकादशी भीमसेनी निर्जला एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
निर्जला एकादशी मुख्य रूप से भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना का दिन है। इस दिन श्रीविष्णु, लक्ष्मी-नारायण, श्रीकृष्ण और तुलसी माता की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। जो साधक इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, “ॐ नमो नारायणाय” या विष्णु सहस्रनाम का जप करते हैं, उन्हें विशेष पुण्य और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
इस व्रत का वास्तविक अर्थ केवल भूखा-प्यासा रहना नहीं है।
अन्न का त्याग हमें भोगों पर नियंत्रण सिखाता है,
जल का त्याग तृष्णा पर विजय का प्रतीक है,
जप और पूजा मन को भगवान में स्थिर करते हैं
और दान मनुष्य के भीतर सेवा, करुणा और विनम्रता का भाव जगाता है।
अर्थात निर्जला एकादशी हमें सिखाती है कि जीवन केवल शरीर का पालन नहीं, बल्कि आत्मा की साधना भी है।
इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही शुरू मानी जाती है। दशमी के दिन सात्त्विक भोजन करना चाहिए, तामसिक पदार्थों से दूर रहना चाहिए, क्रोध, असत्य, निंदा और अपशब्दों से बचना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें, भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा करें, तुलसी अर्पित करें, दीप जलाएँ और व्रत का संकल्प लें। दिन भर हरिनाम जप, विष्णु स्तुति, कथा, भजन और ध्यान करना श्रेष्ठ माना गया है। रात्रि में जागरण और भगवान के नाम का स्मरण व्रत को और भी पुण्यकारी बनाता है।
निर्जला एकादशी में परंपरागत रूप से अन्न, फल और जल तक का त्याग किया जाता है। यही कारण है कि यह वर्ष की सबसे कठिन एकादशियों में गिनी जाती है। लेकिन यहाँ एक बात बहुत महत्त्वपूर्ण है— धर्म विवेक सिखाता है, शरीर को कष्ट देकर अहंकार नहीं। इसलिए यदि किसी की शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह पूर्ण निर्जल रह सके, तो वह सामर्थ्य के अनुसार फलाहार, जल या केवल अन्नत्याग के साथ भी यह व्रत कर सकता है। भगवान भावना देखते हैं, प्रदर्शन नहीं।
इस दिन जलदान, घटदान, सत्तू, शक्कर, फल, छाता, वस्त्र, पंखा और शीतल पदार्थों का दान अत्यंत शुभ माना गया है। ग्रीष्म ऋतु में प्यासे को जल पिलाना, गरीब को अन्न देना, गौसेवा करना या जरूरतमंद की सहायता करना इस व्रत का अत्यंत पवित्र अंग है। निर्जला एकादशी हमें केवल अपने लिए पुण्य कमाने का नहीं, बल्कि दूसरों के लिए करुणा और सेवा का अवसर भी देती है।
निर्जला एकादशी के लाभों की बात करें तो शास्त्रीय मान्यता के अनुसार यह व्रत वर्ष भर की एकादशियों के समान पुण्य देने वाला माना गया है। इससे पापक्षय, मन की शुद्धि, संकल्पशक्ति, इंद्रिय-निग्रह, विष्णु कृपा, मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। गृहस्थ जीवन में यह व्रत शांति, समृद्धि, सद्बुद्धि और पारिवारिक मंगल के लिए भी शुभ माना जाता है। जो साधक भक्ति, जप, दान और संयम के साथ यह व्रत करते हैं, उनके भीतर आत्मबल और धैर्य की वृद्धि होती है।
लेकिन इस व्रत के साथ सावधानी भी आवश्यक है। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, स्तनपान कराने वाली माताएँ, मधुमेह, लो बीपी, किडनी, हृदय या गंभीर कमजोरी वाले लोग कठोर निर्जल व्रत करने से पहले अवश्य सोचें। बिना पानी के रहने से चक्कर, डिहाइड्रेशन, सिरदर्द, घबराहट, कमजोरी और बेहोशी जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इसलिए यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो सामर्थ्य के अनुसार व्रत करें।
धर्म का उद्देश्य शरीर को तोड़ना नहीं, आत्मा को भगवान से जोड़ना है।
निर्जला एकादशी का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं, तृष्णाओं, आलस्य और विकारों पर विजय पाकर श्रीहरि की शरण में जाए। एक दिन का यह तप हमें याद दिलाता है कि यदि जीवन में संयम, श्रद्धा और भक्ति आ जाए, तो साधारण मनुष्य भी असाधारण आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर सकता है।
निर्जला एकादशी पर यह मंत्र और स्तोत्र अवश्य पढ़ें —
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
ॐ नमो नारायणाय॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः॥
निर्जला एकादशी हमें यह सिखाती है कि भक्ति केवल मंदिर की पूजा नहीं, बल्कि मन का संयम, इंद्रियों का नियंत्रण, दया, दान और भगवान के प्रति समर्पण भी है। जो साधक श्रद्धा, नियम और विनम्रता के साथ यह व्रत करते हैं, उनके जीवन में श्रीहरि की कृपा, मन की शांति और आत्मिक प्रकाश का प्रवेश होता है।
हरि स्मरण ही निर्जला एकादशी का प्राण है।
व्रत केवल शरीर का नहीं, मन और आत्मा का भी होना चाहिए।

