हाल ही में मुंबई लोकल ट्रेन में हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। बारिश के दौरान ट्रेन का दरवाजा खुला रखा जाए या बंद, इसी छोटी सी बात को लेकर शुरू हुआ विवाद कुछ ही मिनटों में इतना बढ़ गया कि एक 22 वर्षीय युवक की जान चली गई।
यह घटना दुखद है, लेकिन उससे भी अधिक भयावह वह सवाल है जो यह हमारे सामने छोड़ जाती है। आखिर हम किस तरह के समाज में जी रहे हैं, जहाँ एक मामूली असहमति भी किसी की मृत्यु का कारण बन सकती है? हर ऐसी घटना के बाद हम अपराधी खोज लेते हैं। गिरफ्तारी होती है, मुकदमा चलता है और कुछ दिनों बाद मामला खबरों से गायब हो जाता है। लेकिन क्या केवल वही व्यक्ति दोषी है जिसने हमला किया? या फिर उस सामाजिक वातावरण की भी कुछ जिम्मेदारी है जिसने लोगों के भीतर धैर्य की जगह अधैर्य, संवाद की जगह टकराव और संवेदनशीलता की जगह आक्रामकता को पनपने दिया?

बीते कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएँ लगातार बढ़ी हैं। कभी सड़क पर ओवरटेक करने को लेकर हत्या, कभी पार्किंग विवाद में मारपीट, कभी मामूली कहासुनी पर चाकूबाजी तो कभी सोशल मीडिया की टिप्पणी पर हिंसा। कारण बदलते रहते हैं, लेकिन एक बात समान रहती है कि लोगों में अब सहनशीलता कम होती जा रही है।
मतभेद अब विचारों का अंतर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अपमान की तरह महसूस किए जाने लगे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। आज का युवा ऐसे माहौल में बड़ा हो रहा है जहाँ उस पर लगातार आगे बढ़ने, जीतने और खुद को साबित करने का दबाव बनाया जा रहा है। सफलता को लक्ष्य बनाना गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब जीवन को केवल जीत और हार के तराजू पर तौलने की आदत पड़ जाए। असहमति चुनौती बन जाती है और चुनौती टकराव में बदल जाती है।

विडंबना यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इस प्रश्न पर गंभीर दिखाई नहीं देती। स्कूल और कॉलेज बच्चों को विज्ञान, तकनीक और प्रतिस्पर्धा तो सिखा रहे हैं, लेकिन क्या वे उन्हें असफलता स्वीकार करना भी सिखा रहे हैं? क्या वे उन्हें यह बता रहे हैं कि हर विवाद का समाधान शक्ति प्रदर्शन नहीं होता? यदि एक शिक्षित समाज छोटी-छोटी बातों पर हिंसक हो रहा है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक संस्कारों का भी प्रश्न है।
तकनीक ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन उसने हमारी मानसिक आदतों को भी प्रभावित किया है। आज भोजन कुछ मिनटों में, जानकारी कुछ सेकंड में और मनोरंजन एक क्लिक पर उपलब्ध है। सुविधा अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन निरंतर त्वरित संतुष्टि ने धैर्य की क्षमता को कमजोर जरूर किया है।
जब व्यक्ति हर चीज तुरंत पाने को आतुर हो जाए, तब वास्तविक जीवन की असहमतियाँ और प्रतीक्षाएँ उसे परेशान करने लगती हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और गहरा किया है। यहाँ संवाद कम और प्रतिक्रिया अधिक दिखाई देती है। लोग अपने विचार तो व्यक्त करते हैं, लेकिन विरोधी विचारों को सुनना पसंद नहीं करते। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने ही विचारों के घेरे में कैद होने लगता है। फिर वास्तविक जीवन में कोई उससे असहमत होता है तो वह उसे विचार का नहीं, चुनौती का विषय मान बैठता है। इसे तकनीक को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते।

समाज के रूप में हमने भी बहुत कुछ खोया है। संयुक्त परिवारों का विघटन, सामाजिक संबंधों का कमजोर होना और बढ़ता भावनात्मक अकेलापन व्यक्ति को भीतर से असुरक्षित बना रहा है। पहले परिवार रहने की जगह नहीं था, वह भावनात्मक संतुलन का केंद्र भी था। आज संपर्क बढ़ा हैं, पर संवाद घटा है। भीड़ बढ़ी है, लेकिन अपनापन कम हुआ है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमने संयम को कमजोरी और आक्रामकता को आत्मविश्वास समझना शुरू कर दिया है। पीछे हटना हमें हार लगने लगा है, जबकि परिपक्व समाज की पहचान ही यह है कि वह हर मतभेद को संघर्ष में नहीं बदलता। लोकतंत्र की असली शक्ति बहस में नहीं, बहस के बाद भी साथ रहने की क्षमता में होती है।
मुंबई लोकल की घटना एक युवक की हत्या नहीं है। यह उस सामाजिक संतुलन के कमजोर पड़ने का संकेत है जो किसी भी सभ्यता को हिंसा से बचाए रखता है। इसलिए समाधान कठोर कानूनों में नहीं होगा। आज जरूरत ऐसी पीढ़ी तैयार करने की है जो असहमति के साथ जीना जानती हो, जो क्रोध और प्रतिक्रिया के बीच सोचने का समय निकाल सके, जो बहस में जीतने से अधिक संवाद को महत्व दे। परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों और नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि समाज केवल कुशल पेशेवरों से नहीं, जिम्मेदार नागरिकों से बनता है।
मुंबई की उस लोकल ट्रेन में एक युवक की जान चली गई, लेकिन उसके साथ एक चेतावनी भी हमारे सामने खड़ी हो गई है। किसी समाज की प्रगति उसकी सड़कों, इमारतों और तकनीक से नहीं मापी जाती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि मतभेद होने पर उसके लोग संवाद चुनते हैं या हिंसा। क्योंकि किसी भी समाज का पतन तब शुरू नहीं होता जब उसकी इमारतें गिरती हैं, वह तब शुरू होता है जब उसके लोगों का धैर्य गिरने लगता है और जब धैर्य कमजोर पड़ जाता है, तब चंद सेकंड का गुस्सा सचमुच जिंदगी भर का पछतावा बन जाता है।
– सोनम लववंशी
