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‘कैंसल कल्चर’ और शास्त्रार्थ परम्परा

‘कैंसल कल्चर’ और शास्त्रार्थ परम्परा

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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हमारे समाज के हिंदुनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ वर्ग में पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से दिखाई देने लगी है, जो भारतीय चिंतन-परंपरा के स्वभाव से मेल नहीं खाती। यह प्रवृत्ति है मतभेद रखने वाले व्यक्ति या उसके विचारों को संपूर्णतः अस्वीकार कर देना, जिसे आज प्रचलित भाषा में ‘कैंसल कल्चर’ कहा जाता है। भारतीय परंपरा का स्वभाव कभी ऐसा नहीं रहा। यहाँ शास्त्रार्थ की परंपरा थी, विचारों का मंथन था, मतभेद थे, किंतु मतभिन्न व्यक्ति का निषेध नहीं था।

विडंबना यह है कि जिन आब्राहमिक मजहबी और वैचारिक परंपराओं के एकांगी दृष्टिकोण की हम आलोचना करते हैं, उनसे वैचारिक संघर्ष करते-करते कहीं हम स्वयं भी उसी मानसिकता से प्रभावित होने लगे हैं। आज यदि कोई व्यक्ति हमारे स्थापित निष्कर्षों से भिन्न कोई बात कहता है, तो उसके तर्कों का परीक्षण करने के स्थान पर अनेक बार उसके संपूर्ण व्यक्तित्व और उसके समस्त विचारों को ही अस्वीकार कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति न तो सनातन की है, न भारतीय दर्शन की।

किसी भी मनुष्य के विचार पूर्ण नहीं होते। प्रत्येक व्यक्ति सत्य के किसी एक पक्ष को देखता है। जब अनेक दृष्टियाँ, अनेक अनुभव और अनेक तर्क परस्पर संवाद करते हैं, तभी व्यापक सत्य का उदय होता है। इसीलिए भारतीय परंपरा ने विचार-विमर्श को संघर्ष नहीं, बल्कि तत्त्वबोध का साधन माना। न्यायशास्त्र का प्रसिद्ध वचन है— ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’, अर्थात् निरंतर संवाद और शास्त्रार्थ से ही तत्त्व का बोध होता है। इसलिए किसी मत को सुनने से पहले ही उसका निषेध कर देना भारतीय दृष्टि नहीं, बल्कि वैचारिक असहिष्णुता का लक्षण है।

इसी संदर्भ में आज अनेक बार यह भी कहा जाता है कि केवल रामचरितमानस या हनुमान चालीसा के पाठ से समाज की वर्तमान समस्याओं का समाधान नहीं होगा। यह किसी व्यक्ति का मत हो सकता है और उस पर विचार भी किया जा सकता है, किंतु इस आधार पर इन ग्रंथों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक योगदान को नकार देना न्यायसंगत नहीं है।
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जब भारत पर इस्लामी आक्रमणों का दीर्घकालीन दबाव था, जब औपनिवेशिक शासन भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति को दुर्बल करने में लगा था और जब ईसाई मिशनरियों द्वारा व्यापक स्तर पर वैचारिक तथा धार्मिक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास हो रहा था, तब करोड़ों परिवारों में रामचरितमानस और हनुमान चालीसा ने केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि धर्म, नैतिकता, पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के आधार के रूप में कार्य किया।
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आज से एक-दो पीढ़ी पूर्व तक भारतीय समाज में जो धर्मनिष्ठा, नैतिक अनुशासन और सांस्कृतिक संस्कार दिखाई देते थे, उनके निर्माण में इन ग्रंथों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसलिए यदि आज की चुनौतियों के लिए नए उपायों की आवश्यकता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि जिन्होंने समाज की रक्षा की, उनके महत्व को ही नकार दिया जाए। सनातन परंपरा का स्वभाव नवीन को स्वीकार करना है, किंतु वह नवीनता के नाम पर अपने आधारों का तिरस्कार नहीं करती।

कोई व्यक्ति वेद, उपनिषद्, दर्शन और शास्त्रों का कितना ही बड़ा ज्ञाता क्यों न हो, प्रत्येक युग अपनी परिस्थितियों के अनुसार अभिव्यक्ति और कार्यपद्धति का निर्माण करता है। परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के ज्ञान से नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक चिंतन, अनुभव और पुरुषार्थ से आता है। इसी कारण हमारे भीतर विचारों को सुनने और स्वीकार करने का संस्कार जीवित रहना चाहिए। यदि कोई हमारी आलोचना करता है, तो उसकी बात को धैर्यपूर्वक सुनना चाहिए। संभव है उसके विचारों में ऐसा कोई पक्ष हो, जो हमारे चिंतन को अधिक परिपक्व बना दे।

भारतीय मनीषा ने कभी मतभेद को शत्रुता का कारण नहीं माना, बल्कि तत्त्व की खोज का साधन माना है। इसी कारण न्याय परंपरा में कहा गया है “वादे वादे जायते तत्त्वबोधः”, अर्थात् विचार-विमर्श और शास्त्रार्थ से ही तत्त्व का बोध होता है। इसलिए किसी व्यक्ति या उसके विचारों को बिना विचार किए कैंसल कर देना सनातन परंपरा का स्वभाव नहीं है। जो सार है उसे ग्रहण करना, जो असंगत है उसे तर्कपूर्वक छोड़ देना और संवाद को निरंतर बनाए रखना ही भारतीय चिंतन की पहचान है।

यह प्रवृत्ति विशेष रूप से वामपंथी विचारधारा में दिखाई देती है। वहाँ किसी विचार से असहमति होने पर उसके साथ संवाद करने के बजाय उसे अस्वीकार कर देना और समाज से अलग-थलग कर देना एक सामान्य कार्यपद्धति बन जाती है। किंतु सनातन का स्वभाव इससे सर्वथा भिन्न है। हमारे यहाँ मतभेद का अर्थ शत्रुता नहीं होता। हम व्यक्ति को नहीं, उसके विचारों की समीक्षा करते हैं। समाज में अनेक प्रकार के विचार आएँगे, अनेक मत प्रकट होंगे और अनेक प्रश्न उठेंगे। उनका समाधान भी समाज ही अपने सामूहिक चिंतन और अनुभव से खोजेगा। इसलिए हमें समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया पर विश्वास रखना चाहिए। सभी को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता ही हिंदू भाव का आधार है।

आज जो व्यक्ति हमारे विचारों का विरोध कर रहा है, वही कल उन्हीं विचारों का समर्थक भी बन सकता है। यही कारण है कि सनातन परंपरा किसी को अंतिम रूप से अस्वीकार नहीं करती। जैसे एक वटवृक्ष से समय-समय पर असंख्य शाखाएँ निकलती रहती हैं, वैसे ही सनातन के मूल विचारों से नए-नए चिंतन और अभिव्यक्तियाँ जन्म लेती रहेंगी। विचारों का यह मंथन कभी रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि यही परंपरा समाज को जीवंत बनाए रखती है और मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

कभी-कभी समय ऐसा आता है जब मन में यह भावना उठती है कि अब सब कुछ समाप्त हो गया है, समाज में परिवर्तन की कोई संभावना शेष नहीं रही। चारों ओर उपभोक्तावाद, भौतिकतावाद, अति-व्यक्तिवाद और बाजारवाद का प्रभाव देखकर निराशा स्वाभाविक भी लगती है। परंतु इतिहास बताता है कि किसी जीवंत समाज का मूल्यांकन केवल उसके संकटों से नहीं, बल्कि उनसे उबरने की उसकी क्षमता से होता है।

आज भी देश के कोने-कोने में हजारों-लाखों लोग बिना किसी प्रसिद्धि या अपेक्षा के धर्म, समाज और संस्कृति के उत्थान के लिए अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। उनके प्रयास अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही है। यही छोटे-छोटे प्रयास समय के साथ एक विराट सामाजिक शक्ति का निर्माण करते हैं और वही शक्ति नई परिस्थितियों के अनुरूप नए समाधान भी खोजती है। इसलिए हमें कभी यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अब कुछ नहीं हो सकता। सनातन का विश्वास निराशा में नहीं, सतत पुरुषार्थ में है। जो समाज धर्म को धारण करता है, उसकी रक्षा धर्म स्वयं करता है। इसी सत्य को हमारे शास्त्रों ने “धर्मो रक्षति रक्षितः” कहकर व्यक्त किया है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, पुरुषार्थ का मार्ग कभी समाप्त नहीं होता और न ही समाधान की संभावनाएँ।

यदि हम यह मान लें कि इस बीज से कभी वृक्ष नहीं उगेगा, तो हमारे मान लेने से प्रकृति का नियम नहीं बदल जाता। बीज में जीवन की संभावना बनी रहती है। उसे उचित भूमि, जल, पोषण और समय मिले तो वही बीज एक दिन विशाल वृक्ष बन जाता है। धर्म भी ऐसा ही बीज है। यदि हमने अपने जीवन में धर्म के बीज की रक्षा की, उसका रोपण किया और अपने आचरण से उसका पोषण किया, तो वह एक दिन अवश्य फलित होगा। वही धर्मवृक्ष समाज को छाया देगा, असंख्य लोगों को आश्रय देगा और संकट की घड़ी में रक्षा का आधार बनेगा। इसी अनुभव को भारतीय परंपरा ने “धर्मो रक्षति रक्षितः” के सूत्र में व्यक्त किया है। धर्म की रक्षा करने वाला अंततः धर्म की ही रक्षा प्राप्त करता है।

आब्राहमिक दृष्टि से वैचारिक संघर्ष करते-करते हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए कि सनातन सृष्टि को एक ही जीवन या एक रेखीय इतिहास तक सीमित नहीं मानता। यहाँ कर्म, पुनर्जन्म और अनादि-अनंत सृष्टि का सिद्धांत है। इसलिए धर्म के लिए किया गया कोई भी पुरुषार्थ कभी व्यर्थ नहीं जाता। इस जन्म में बोया गया धर्म का बीज केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आगे की यात्रा का भी आधार बनता है। यही कारण है कि सनातन निराशा नहीं, धैर्य और पुरुषार्थ का संदेश देता है।

यदि कभी ऐसा समय भी आ जाए कि समाज का अधिकांश भाग धर्म से विमुख हो जाए, शासक अधर्म के मार्ग पर चलने लगें और धर्म की रक्षा करने वाले लोग बहुत कम रह जाएँ, तब भी निराश होने का कोई कारण नहीं है। सनातन का विश्वास किसी राजा, सत्ता या बहुसंख्या पर नहीं, बल्कि धर्म की शाश्वत शक्ति पर है।
भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥” (गीता 4.7)

अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ईश्वर स्वयं धर्म की स्थापना के लिए प्रवृत्त होते हैं। इसलिए यदि हम अकेले भी धर्म के बीज की रक्षा कर रहे हैं, उसका पोषण कर रहे हैं और उसे अपने आचरण में धारण किए हुए हैं, तो वह पुरुषार्थ कभी निष्फल नहीं होगा। धर्म की रक्षा का वास्तविक आधार मनुष्य की संख्या नहीं, बल्कि धर्म का शाश्वत सत्य है। उसी सत्य के बल पर छोटे-से बीज से भी एक दिन विशाल वटवृक्ष खड़ा होता है और वही संपूर्ण समाज को नई दिशा प्रदान करता है।

धर्म की रक्षा अंततः मनुष्य नहीं, स्वयं नारायण करते हैं। यही सनातन का विश्वास है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, हमारे भीतर यह भाव कभी दुर्बल नहीं पड़ना चाहिए कि धर्म का भविष्य किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता पर निर्भर है।

यदि हम धर्म का आचरण करते हैं, उसके बीज की रक्षा करते हैं और उसे अपने जीवन में धारण करते हैं, तो उसकी रक्षा का दायित्व भी उसी ईश्वरीय व्यवस्था का है। इसलिए कैंसल कल्चर जैसी मानसिकता हमारे भीतर स्थान नहीं बना सकती। आब्राहमिक मजहबों और कम्युनिस्ट विचारधारा से वैचारिक संघर्ष करते हुए यदि हम भी असहमति रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुनने से पहले ही अस्वीकार करने लगेंगे, तो फिर हमारे और उनमें अंतर क्या रह जाएगा?

इसी प्रकार आब्राहमिक मजहबों और कम्युनिस्ट चिंतन में इतिहास को प्रायः एक रेखीय क्रम में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है एक शुरुआत, एक अंत और वही अंतिम सत्य। जब किसी व्यवस्था में यह मान लिया जाता है कि सत्य की अंतिम घोषणा हो चुकी है, तब स्वाभाविक रूप से प्रश्न पूछने, पुनर्विचार करने और वैकल्पिक दृष्टि के लिए स्थान संकुचित होने लगता है।

कम्युनिस्ट विचारधारा में भी समाज और इतिहास की व्याख्या के लिए एक निश्चित वैचारिक ढाँचे को आधार बनाया जाता है, जबकि आब्राहमिक मजहबों की अनेक पारंपरिक व्याख्याओं में भी एक अंतिम सत्य की अवधारणा पर बल दिया जाता है। ऐसी स्थिति में असहमति संवाद का विषय नहीं रह जाती, बल्कि उसे अस्वीकार करने की प्रवृत्ति विकसित होने लगती है। आधुनिक समय का कैंसल कल्चर इसी मानसिकता की अभिव्यक्ति है, जहाँ किसी व्यक्ति के एक

विचार से असहमति होते ही उसके संपूर्ण व्यक्तित्व, उसके विचारों और उसके योगदान को ही नकार दिया जाता है।
सनातन की दृष्टि इससे सर्वथा भिन्न है। यहाँ सत्य को किसी एक व्यक्ति, किसी एक ग्रंथ, किसी एक आचार्य या किसी एक कालखंड की सीमाओं में नहीं बाँधा गया। इसलिए भारत में शास्त्रार्थ की परंपरा विकसित हुई। यहाँ विरोधी मत को पहले समझा गया, फिर उसका उत्तर दिया गया। मतभेद को ज्ञान का शत्रु नहीं, बल्कि तत्त्वबोध का साधन माना गया। इसी कारण भारतीय मनीषा ने कहा “वादे वादे जायते तत्त्वबोधः”। अर्थात् विचारों के मंथन से ही तत्त्व का बोध होता है। इसलिए सनातन ने विचारों का उत्तर विचार से दिया, तर्क का उत्तर तर्क से दिया, बहिष्कार से नहीं। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही

कारण है कि हजारों वर्षों के वैचारिक संघर्षों के बाद भी वह निरंतर नवीन रूपों में विकसित होता रहा है।
कम्युनिस्ट विचारधारा समाज को मूलतः शोषक और शोषित के द्वंद्व में देखती है। उसी आधार पर वर्ग-संघर्ष और वर्गविहीन समाज की कल्पना प्रस्तुत करती है। किंतु यह कल्पना प्रकृति के स्वभाव से मेल नहीं खाती। इस सृष्टि का आधार विविधता है, एकरूपता नहीं। पर्वत, नदियाँ, वनस्पतियाँ, जीव-जंतु, मनुष्य, उनके स्वभाव, उनकी क्षमताएँ सब विविध हैं। इसी विविधता से सृष्टि का संतुलन बना हुआ है। उसे समाप्त कर एक ही प्रकार का समाज निर्मित करने का विचार व्यवहार में कभी सफल नहीं हो सका।

यही कारण है कि सनातन सृष्टि को केवल भौतिक स्तर पर नहीं देखता। वह सृष्टि के त्रिगुणात्मक स्वरूप सत्त्व, रज और तम को स्वीकार करता है। साथ ही आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक, तीनों स्तरों पर जीवन का विचार करता है। जब दृष्टि इतनी व्यापक हो, तब निराशा का कोई कारण नहीं रह जाता। तब मतभेद भी विनाश का कारण नहीं बनते, बल्कि नए चिंतन और नए समाधान का आधार बनते हैं। यही सनातन की विशेषता है और यही कारण है कि हजारों वर्षों के उतार-चढ़ाव के बाद भी उसके भीतर नए विचार, नए आचार्य और नई धाराएँ निरंतर जन्म लेती रही हैं।

हम अपने शरीर को ही आज तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं, फिर आत्मा और सृष्टि के समग्र रहस्य को समझ लेने का दावा कैसे कर सकते हैं? यही कारण है कि सनातन केवल विचार करने की नहीं, बल्कि धर्म को धारण करने की बात करता है। धर्म कोई मत या नारा नहीं है, वह जीवन जीने की पद्धति है। जैसे-जैसे मनुष्य धर्म को अपने आचरण में उतारता है, उसका दृष्टिकोण व्यापक होता जाता है। वह संसार को अपने और पराए में नहीं बाँटता। इसीलिए हमारे ग्रंथों में सुर भी हैं और असुर भी। दोनों इसी सृष्टि का हिस्सा हैं।

संघर्ष किसी व्यक्ति के अस्तित्व से नहीं, बल्कि उन प्रवृत्तियों से है जो प्रकृति को केवल भोग की वस्तु मानती हैं, जीवन को केवल उपभोग तक सीमित कर देती हैं और आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म तथा ब्रह्म जैसे सिद्धांतों को अस्वीकार करती हैं। इसके विपरीत सनातन प्रकृति में माता का स्वरूप देखता है और उसके संरक्षण को अपना धर्म मानता है। संघर्ष का मूल कारण यही दो दृष्टियाँ हैं।

जब संघर्ष का स्वरूप इतना स्पष्ट है, तब निराश होकर यह मान लेना कि अब सब कुछ समाप्त हो गया है, सनातन की दृष्टि नहीं हो सकती। किसी के विचार हमसे भिन्न हों तो उसे सुनने से पहले ही अस्वीकार कर देना भी उचित नहीं है।

समाज का विकास बहिष्कार से नहीं, विचारों के मंथन से होता है। प्रत्येक युग अपने प्रश्न लेकर आता है और उन्हीं प्रश्नों के भीतर उनके उत्तर भी छिपे होते हैं। आज जिन चुनौतियों का सामना हम कर रहे हैं, वे पहले के दानवों की तरह प्रत्यक्ष नहीं हैं। वे विचारों, संस्कृति, शिक्षा, मनोरंजन और जीवनशैली के माध्यम से हमारे सामने उपस्थित हैं। इसलिए उनका उत्तर भी उसी युग के अनुरूप देना होगा। यही सनातन की परंपरा रही है। उसने प्रत्येक काल में परिस्थितियों के अनुसार अपने साधन बदले, किंतु अपने मूल सिद्धांत कभी नहीं छोड़े।

इसीलिए हमें निराशा नहीं, पुरुषार्थ का मार्ग चुनना होगा। विचारों का मंथन चलता रहे, समाज संवाद करता रहे, धर्म का बीज सुरक्षित रहे और प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसका पोषण करता रहे। यही वह मार्ग है जिससे समाज नई परिस्थितियों के अनुरूप नए समाधान खोजता है। अंततः विजय किसी व्यक्ति या विचारधारा की नहीं, धर्म की होती है। महाभारत का यह वाक्य केवल आदर्श नहीं, भारतीय इतिहास का अनुभव है
“यतो धर्मस्ततो जयः”। जहाँ धर्म है, वहीं अंततः विजय है।
यही विश्वास सनातन समाज की सबसे बड़ी शक्ति है।

– दीपक कुमार द्विवेदी

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