भारत में प्राकृतिक आपदाओं का भय हमेशा बना रहता है और इनमें भूकम्प, बाढ़ और चक्रवात गम्भीर चुनौतियां हैं। भूकम्प के जोखिम वाले क्षेत्र व उसके बचाव के उपायन पर इस आलेख में विस्तृत चर्चा की गई है।
भारत एक ऐसा देश है जहां प्राकृतिक आपदाओं का भय हमेशा बना रहता है और इनमें भूकम्प, बाढ़ और भाय चक्रवात गम्भीर चुनौतियां हैं। इनमें भूकम्प एक बड़ी समस्या उत्पन्न करने वाली आपदा है और दुर्भायवश हाल के वर्षों में भूकम्प की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जैसे कि फरवरी 2025 तक भारत में 159 भूकम्प दर्ज किए गए, जिनमें दिल्ली में 4.0 तीव्रता का भूकम्प भी शामिल है। वैसे तो प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, लेकिन उचित तैयारी और प्रभावी बचाव उपायों से उनके हानिकारक प्रभावों और क्षति को कम किया जा सकता है। भारत का लगभग 59% भू-भाग भूकम्प की सम्भावना वाले क्षेत्रों में आता है, जिसमें से कुछ क्षेत्र अत्यधिक जोखिम वाले हैं। भूकम्प से बचाव के लिए पूर्व-तैयारी अत्यंत आवश्यक है।
देश को भूकम्प के संकट के आधार पर चार मुख्य जोन (II, III, IV, V) में बांटा गया है, जहां जोन-त सबसे अधिक घातक होता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) भारत में आपदा प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भूकम्परोधी तकनीकें, जैसे बेस आइसोलेशन और शॉक एब्जॉर्बर, ऊंचे भवनों को भूकम्प के झटकों से बचाने में सहायता करती हैं।
भारत में भूकंम्प का संकट और बचाव के तरीके
भारत की भूगर्भीय संरचना इसे भूकम्प के प्रति संवेदनशील बनाती है। देश को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा भूकम्पीय जोनेशन मैप के आधार पर चार मुख्य जोन में विभाजित किया गया है, जो संकट के स्तर को दर्शाते हैं।
जोन-V (अत्यधिक उच्च जोखिम): यह भारत का सबसे
सक्रिय भूकम्पीय क्षेत्र है। इसमें पूर्वोत्तर के सभी राज्य (जैसे असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा), जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्से (जैसे कश्मीर घाटी), हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड (विशेषकर हिमालयी क्षेत्र), गुजरात का कच्छ क्षेत्र, उत्तरी बिहार का कुछ हिस्सा और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं।
जोन-IV (उच जोखिम): इस क्षेत्र में दिल्ली, मुम्बई, पश्चिम
बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन के क्षेत्र और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से आते हैं। इन क्षेत्रों में मध्यम से उच्च तीव्रता के भूकम्प आने की सम्भावना रहती है।
जोन-III (मध्यम जोखिम): यह क्षेत्र मध्यम तीव्रता के भूकम्पों के लिए संवेदनशील है और इसमें देश के कई मध्यवर्ती हिस्से शामिल हैं।
जोन-।। (कम जोखिम): यह सबसे कम भूकम्पीय सक्रिय क्षेत्र है और इसमें प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्से शामिल हैं, जहां भूकम्प का भय अपेक्षाकृत कम होता है।
भूकम्प से पहले की तैयारी
भूकम्प के जोखिमों को देखते हुए भूकम्प से बचाव के लिए व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। भूकम्प आने से पहले की गई तैयारी जीवन रक्षक सिद्ध हो सकती है। जागरूकता और शिक्षा इसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अपने परिवार और समुदाय को भूकम्प के संकटों और उनसे निपटने के तरीकों के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है। यदि आप घर का निर्माण कर रहे हैं या मरम्मत करवा रहे हैं, तो सुनिश्चित करें कि यह भूकम्परोधी मानकों (बिल्डिंग कोड) के अनुसार हों। पुराने भवनों का रेट्रोफिटिंग (भूकम्परोधी सुधार) भी एक महत्वपूर्ण उपाय है।

एक आपातकालीन किट (जिसे गो-बैग भी कहते हैं) हमेशा तैयार रखें। इसमें पानी, खराब न होने वाला भोजन, प्राथमिक चिकित्सा किट, दवाएं, टॉर्च, बैटरी चालित रेडियो, अतिरिक्त बैटरी, सीटी, नकद, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की प्रतियां और मोबाइल चार्जर जैसी आवश्यक चीजें होनी चाहिए।
अपने घर, स्कूल और कार्यस्थल पर सुरक्षित स्थानों (जैसे मजबूत मेज या बिस्तर के नीचे या अंदरूनी दीवार के पास) की पहले से पहचान करके रखें। घातक स्थानों (जैसे खिड़कियों, बाहरी दीवारों, भारी फर्नीचर या शीशे के पास) से बचें। इसके अलावा अपने परिवार के साथ एक निकासी योजना बनाएं और उसका नियमित रूप से अभ्यास करें। घर से बाहर निकलने के लिए कई रास्तों की पहचान करें और एक सुरक्षित मिलन स्थल तय करें। भारी फर्नीचर, अलमारियों और वॉटर हीटर को दीवारों से कसकर बांधे ताकि भूकम्प के दौरान वे गिरें नहीं। भारी वस्तुओं को निचली अलमारियों पर रखें ताकि भूकम्प के कारण उनके गिरने की सम्भावना न बने। अंतिम और आवश्यक बात कि परिवार के सदस्यों के आपातकालीन सम्पर्क नम्बरों की एक सूची हमेशा अपने पास रखें।
भूकम्प के दौरान क्या करें?
भूकम्प के झटके का अनुभव होते ही तुरंत यह प्रतिक्रिया देना महत्वपूर्ण है- झुको, ढको और पकड़ो। यह सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है। झुको अर्थात तुरंत जमीन पर झुक जाएं। ढको अर्थात किसी मजबूत मेज या डेस्क के नीचे छिप जाएं। अपने सिर और गर्दन को अपने हाथों से ढकें। पकड़ो यानी मेज या डेस्क को कसकर पकड़ लें जब तक कि कम्पन बंद न हो जाए। यदि आप घर के अंदर हों तो खिड़कियों, शीशों, बाहरी दीवारों और भारी फर्नीचर से दूर रहें।
ऊंचे भवनों में भूकम्परोधी तकनीकें
आधुनिक शहरीकरण के साथ ऊंचे भवनों का निर्माण बढ़ रहा है और इन भवनों को भूकम्प के झटकों से बचाने के लिए विशेष इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है। बेस आइसोलेशन एक उन्नत तकनीक है जिसमें भवन की नींव और जमीन के बीच लचीले आइसोलेटर (जैसे रबर या स्टील के पैड) लगाए जाते हैं। ये आइसोलेटर भूकम्प के दौरान जमीन के कम्पन को भवनों तक पहुंचने से पहले अवशोषित कर लेते हैं, जिससे भवनों का कम्पन कम हो जाता है शॉक एब्जॉर्बर/डैम्पर, भवन के विभिन्न स्तरों या संरचनात्मक स्वरूपों में लगाए जाते हैं।
ये भूकम्प के दौरान उत्पन्न होने वाली ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और उसे गर्मी में परिवर्तित कर देते हैं, जिससे इमारत का झूलना और कम्पन कम हो जाता है। सिस्मोटेक्टोनिक डिजाइन में भवनों का डिजाइन इस तरह से किया जाता है कि वे अपेक्षित भूकम्पीय बलों को झेल सकें। शीयर वॉल वास्तव में बिल्डिंग के अंदर या बाहरी किनारों पर बनी मजबूत दीवारें होती हैं जो भूकम्पीय बलों के विरुद्ध भवन को अतिरिक्त कठोरता और ताकत प्रदान करती हैं, जिससे पार्श्व विस्थापन कम होता है।
डॉ. मनीष मोहन गोरे

