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कैसे रुकेंगे बच्चियों के साथ यौन अपराध?

कैसे रुकेंगे बच्चियों के साथ यौन अपराध?

समाज को भयभीत करती घटनाएं

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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हाल ही में राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक नाबालिग के साथ दरिंदगी के गंभीर अपराध से समग्र समाज स्तब्ध है| बेटियों की सुरक्षा को लेकर हर परिवार चिंतित है| इस भयावह मामले में 13 वर्षीय बच्ची के साथ 32 लोगों ने बर्बरता की| मासूम बच्ची के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म और खरीद-फरोख्त का यह झकझोर देने वाला मामला दिशाहीन और अमानवीय होती सोच की बानगी है |

इस घिनौनी में वारदात में ई-रिक्शा चालक ने बच्ची को बातों ही बातों में विश्वास में लेकर एक होटल संचालक को बेच दिया| उसके बाद बंधक बनाकर अलग-अलग होटलों में उसके साथ लगातार 5 दिन तक दरिंदगी की गई| दर्द से तड़पती मासूम को शांत करने और सुलाने के लिए जबरन शराब पिलाई जाती थी| इस अमानवीयता को झेलने वाली बच्ची इस संसार से चली गई, पर समाज में अविश्वास और परिवारों में असुरक्षा से जुड़ी फिक्र तो सदा से ही हमारे हिस्से है|

वस्तुतः यह शर्मनाक और खौफनाक घटना खत्म होते नैतिक मूल्यों और लचर कानून व्यवस्था दोनों की कटु हकीकत लिए है| इतना ही नहीं नाबालिग बच्चियों के साथ होते संगठित अपराध और मानव तस्करी के आंकड़े तो डराने वाले ही हैं| पीड़ादायी है कि बेटियों के साथ कुत्सित सोच वाले लोगों के वहशीपन की घटनाएँ आए दिन हो रही हैं| दरिंदगी की इन्तेहा पार करने वाले ऐसे मामले बार-बार बेटियों की सुरक्षा और लोगों की निर्दयी होती सोच को सामने रखते हैं| इंसानी सोच का यह कलुषित पक्ष समाज में डर का सबसे बड़ा कारण बन गया है|

चिंतनीय है कि बात श्रीगंगानगर में हुई घिनौनी और बर्बर घटना भर की नहीं है| देश के हर हिस्से से आये दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं जिनमें मासूम बच्चियों के साथ ऐसी शर्मनाक और वीभत्स घटनाओं को अंजाम दिया जाता है| दुधमुंही बच्चियों से लेकर नाबालिग बच्चियों तक, महानगरों से लेकर दूर-दराज एक गाँवों में भी ऐसी हैवानियत की घटनाएं होती रहती हैं|

Stop violence against women & children. - Unibase

जीवन के सही मायने तक ना समझने वाली उम्र में भी बच्चियों के साथ भी हद दर्जे की बर्बरता हुई है| शर्मनाक ही है कि शारीरिक शोषण और क्रूरता के ऐसे मामलों में अनजान लोगों की ही नहीं अपनों की भी भागीदारी देखने को मिली है| कहना गलत नहीं होगा कि घर हो या बाहर, मौजूदा परिवेश में बेटियां असुरक्षित भी हैं और अमानवीयता भी झेल रही हैं | तभी तो स्कूलों के परिसर से लेकर आस-पड़ोस और खेल के मैदान से लेकर उनके अपने घर के आँगन तक, हर कहीं मासूम बच्चियों के साथ ऐसे वीभत्स कुकर्म को अंजाम दिया जा रहा है|

चाइल्डलाइट ग्लोबल चाइल्ड सेफ्टी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट ‘इंटू द लाइट इंडेक्स 2025’ के अनुसार भारत में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में 2017 से 2022 तक 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक हमारे यहाँ हर 30 मिनट में एक बच्चे के साथ यौन दुर्व्यवहार हो रहा है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की पिछले साल की रिपोर्ट बताती है कि भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है| रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2023 में कुल 1,77,335 मामले दर्ज किए गए| यह आंकड़ा 2022 के आंकड़ों की तुलना में लगभग 9 फीसदी अधिक है| इनमें विशेषरूप से बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों और अपहरण की घटनाएँ शामिल हैं| इन मामलों में नाबालिग लड़कियों साथ हो रहे अपराधों की संख्या सबसे चिंताजनक है|

When Will It Be #TimesUp For Sexual Assault - DissDash

असल में समाज के सभ्य-संवेदनशील लोगों को झकझोर कर रख देने वाले इन मामलों की पुनरावृत्ति होना सबसे चिंतनीय पक्ष है| खासकर बेटियों के अभिभावकों के मन में तो ऐसे समाचार नैराश्य, विषाद और भय पैदा करते हैं| मासूम बच्चियों के साथ होने वाली ऐसी हैवानियत उनके पूरे व्यक्तित्व को खंडित कर देती है। भावी जीवन में उनके विचार और व्यवहार दोनों ही ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण वाकये से प्रभावित होते हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से तो मासूम मन ऐसे हादसे से जीवन भर नहीं उबर पाता| यह बर्बरता बहुत सी बच्चियों का जीवन ही छीन लेती है|

विचारणीय है कि इन खबरों का समाज की मानसिकता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है| भय भरे परिवेश में बच्चियों का बचपन छीन जाता है| गाँवों-कस्बों में हुई ऐसी एक घटना कई बेटियों का स्कूल जाना छुड़वा देती है| माता-पिता कम उम्र में उनकी शादी करने को विवश हो जाते हैं| इतना ही नहीं बरसों तक चलने वाले ऐसे मुकदमे भी कहीं ना कहीं बेटियों के परिवारजनों के लिए ही प्रताड़ना का कारण बन जाते हैं| अफ़सोसनाक यह भी है कि कठोर कानून बनने के बावजूद ऐसे दुस्साहस भरे मामले हर दिन सामने आ रहे हैं|

ग़ौरतलब है कि बच्चों के लैंगिक उत्पीड़न को लेकर हमारे यहाँ 2012 में पॉक्सो एक्ट यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट बना था| इस अधिनियम के अंतर्गत नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराध और छेड़छाड़ के मामलों में कार्रवाई की जाती है| लेकिन आज भी देश में कम उम्र की बच्चियों के साथ होने वाले ऐसे हादसों पर लगाम नहीं लग पाई है|

ऐसी घटनाओं के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए ही उच्चतम न्यायालय द्वारा बच्चों की मासूमीयत को तार-तार करने वाली विकृत मानसिकता के लोगों को लेकर एक टिप्पणी की जा चुकी है कि ‘बच्चों का यौन शोषण या दुष्कर्म करने वाले अपराधियों की सज़ा को लेकर कड़े क़ानून बनाने पर संसद को विचार करना चाहिए।

गौरतलब है कि बाद में बच्चियों के साथ बढ़ती दरिंदगी पर लगाम लगाने के लिए पॉक्सो एक्ट 2012 में बाद में बदलाव कर और 12 साल तक की बच्ची से बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा का प्रावधान किया गया है| बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे सख्त कानून होने के बावजूद बच्चियों के साथ यह दरिंदगी हो रही है| जबकि कई मामलों में दोषियों को मौत की सजा भी हुई है| हाल ही में पुणे के नसरापुर में 3 साल की मासूम से दुष्कर्म और हत्या के जघन्य मामले में विशेष पॉक्सो अदालत ने दोषी को फांसी की सजा सुनाई है| यह फैसला मात्र 60 दिनों के रिकॉर्ड समय में ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी के तहत सुनाया गया।

कहना गलत नहीं होगा कि मासूम बच्चियों के साथ बलात्कार और यौन शोषण की घटनाएं विकृत और बर्बर मानसिकता को दर्शाती हैं। कानूनी लचरता संग हर ओर परोसी जा रही अश्लीलता ने हालात भयावह बना दिए हैं| स्मार्ट स्क्रीन में पल-पल देखा जा रहा पॉर्न और नेगेटिव कंटेन्ट हर उम्र के लोगों में कुत्सित मनःस्थिति को पोषण दे रहा है| कहीं न कहीं जीवन के हर पहलू पर विस्तार पा रही संस्कारहीन सोच और नैतिक अवमूल्यन ही भयावह हादसों के लिए जिम्मेदार है। इसीलिए कड़े कानूनों संग इंसानी मन में बेटियों की सुरक्षा के प्रति मानवीय दायित्व और संवेदनशील सोच का भाव भी आवश्यक है|

– डॉ. मोनिका शर्मा

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