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भोजशाला वाग्देवी मंदिर: मुस्लिम पक्ष की बेवजह जिद?

भोजशाला वाग्देवी मंदिर: मुस्लिम पक्ष की बेवजह जिद?

by हिंदी विवेक
in अध्यात्म, ट्रेंडींग
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मध्‍य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा अंतरिम आदेश ने एक बार फिर उस ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक बहस को केंद्र में ला दिया है, जो वर्षों से चल रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने फिलहाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार किया है और भोजशाला परिसर के भीतर शुक्रवार की नमाज की अनुमति नहीं दी है।

इसके साथ ही राज्य सरकार को मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को परिसर में किसी भी प्रकार के ढांचागत परिवर्तन से भी रोक दिया है। हालांकि यह सच है कि उक्‍त आदेश अंतिम निर्णय नहीं है, लेकिन इसने विवाद के केंद्र में मौजूद कई प्रश्नों को फिर से सामने ला दिया है।

Bhojshala Mandir: भोजशाला मंदिर में किस देवी की पूजा होती है? वाग्देवी का  क्या है अर्थ - News18 हिंदी

इस विवाद पर अनेक मत हो सकते हैं! किंतु फिर भी जो सबसे प्रभावशाली मत हो सकता है, वह यही है कि यदि किसी संरक्षित परिसर को न्यायालय ने ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर माता वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर सहित भोजशाला माना है और साथ ही मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज की व्यवस्था भी सुझाई गई है, तो ऐसे में टकराव की बजाय समाधान की दिशा में आगे बढ़ना अधिक उपयुक्त होगा।

देखा जाए तो भारत के इतिहास में अनेक मंदिरों के ध्वंस और उन स्थलों पर मस्जिदों के निर्माण के दावे लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। इन दावों पर इतिहासकारों के बीच मतभेद भी हैं और कई मामलों में न्यायालयों में सुनवाई भी चलती रही है। किंतु क्‍या कोई एतिहासिक साक्ष्‍यों के आधार पर इस बात से मना कर सकता है कि इस्‍लामिक साम्राज्‍यों एवं गैर मुसलमानों के प्रति उनकी नफरत ने कई मंदिरों का विध्‍वंस किया, जिन्‍हें बनाने में कई हजार साल लगे होंगे, उन्‍हें भी इस आतताइयों ने नहीं छोड़ा!

धार भोजशाला विवाद: MP हाईकोर्ट ने भोजशाला को वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर माना,  2003 का ASI आदेश खारिज - Vsk Jodhpur

इस संदर्भ में सबसे अधिक प्रमाणिक मानी जानेवाी पुस्‍तक, “What Happened to Hindu Temples” में प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल और उनके सहयोगियों ने अपनी गहन रिसर्च में लगभग 2,000 ऐसे विशिष्ट स्थानों (मस्जिदों/स्मारकों) की सूची तैयार की है, जो पहले मंदिर थे और जिन्हें तोड़कर या उनके मलबे से इस्लामिक ढांचे बनाए गए। कई अन्‍य इतिहासकारों का व्यापक अनुमान है कि लगभग 800 से 1,000 वर्षों के इतिहास में (महमूद गजनवी से लेकर औरंगज़ेब तक) छोटे-बड़े मिलाकर 30,000 से 60,000 तक मंदिर तोड़े, लूटे या क्षतिग्रस्त किए गए।

Hindu Temples: What Happened to Them (Two Volumes) eBook : Goel, Sita Ram:  Amazon.in: Kindle Storeइसके बाद भी भारत में रह रहे मुसलमानों के मान-सम्‍मान को देखते हुए, यहां का बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समुदाय इन सभी मंदिरों पर आज कोई दावा नहीं ठोक रहा, बल्‍कि इसी पृष्ठभूमि में 1991 का Places of Worship (Special Provisions) Act अस्तित्व में आया, जिसका उद्देश्य 15 अगस्त 1947 की धार्मिक स्थिति को यथावत बनाए रखना था। एएसआई की निगरानी की संपत्‍त‍ियों को छोड़कर इस कानून के लागू होने के बाद अधिकांश ऐतिहासिक विवाद न्यायिक या राजनीतिक रूप से आगे नहीं बढ़ाए गए। काशी, मथुरा तथा कुछ अन्य मामलों को छोड़ दें तो देश के अधिकांश ऐसे स्थल, जिनके संबंध में ऐतिहासिक दावे किए जाते रहे हैं, अपनी वर्तमान स्थिति में बने हुए हैं।

अब भोजशाला का विवाद भी कुछ विशेश प्रकार का धार्मिक आस्था से जुड़ा मामला है। यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्मारक का भी प्रश्न है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उपलब्ध अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों तथा एएसआई से संबंधित तथ्यों के आधार पर अपना निर्णय दिया था। इसके बाद भी सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक आवश्यकताओं की उपेक्षा नहीं की है। उसने राज्य सरकार को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय धार्मिक अधिकारों और विरासत संरक्षण इन दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है।

भोजशाला विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम व्यवस्था बनाई है। यदि वैकल्पिक स्थान पर नमाज की व्यवस्था उपलब्ध कराई जा रही है और अंतिम निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखने की बात कही गई है, तो प्रश्न उठता है कि क्या इस व्यवस्था को अस्थायी रूप से स्वीकार कर न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ने देना अधिक उचित नहीं होगा? अस्‍थायी ही क्‍यों, क्‍या इस व्‍यवस्‍था को स्‍थायी रूप से स्‍वीकार करना सही नहीं होगा? क्‍योंकि एतिहासिक तमाम साक्ष्‍य यह बता रहे है, इसलिए यह सर्वविदित है कि धार की भोजशाला मां वाग्‍देवी का मंदिर है। वह सदियों तक भारतीय ज्ञान परंपरा का साक्षी रहा है।

वस्‍तुत: यह सभी के लिए ध्‍यान रखने की बात है कि भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता सहअस्तित्व रही है। इतिहास में अनेक कठिन दौर आए, किंतु अंततः समाज ने संवाद और सहिष्णुता का रास्ता चुना। भोजशाला जैसे संवेदनशील मामलों में भी आवश्यकता इसी दृष्टिकोण की है। एक तरह से देखें तो भोजशाला को लेकर कोई विवाद होना ही नहीं चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में एक ओर हाईकोर्ट के निर्णय पर तत्काल रोक लगाने से इनकार किया है, तो दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय के लिए वैकल्पिक नमाज स्थल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया है। इससे स्पष्ट है कि न्यायालय किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय या पराजय की बजाय संतुलित व्यवस्था की दिशा में बढ़ रहा है। वहीं, मुस्‍लिम समाज से भी आग्रह है कि वाग्‍देवी का ज्ञान मंदिर भारतीयता के लिए सांस्कृतिक विरासत है, इसलिए वह भी इसके संरक्षण के लिए आगे आए।

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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Tags: भोजशाला

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