राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई। 1930 में मुस्लिम लीग का अधिवेशन हुआ जहां पाकिस्तान की मांग की गई। पंजाब और सिंध के इलाकों में मुस्लिम लीग की गतिविधियां बढ़ती जा रही थी तो डॉक्टर हेडगेवार ने वहां संघ के कार्यों को प्रारंभ किया। इस नाते 1940 तक उन्होंने कई प्रवास किये और इसी क्रम को श्री गुरुजी ने भी भारत के विभाजन तक जारी रखा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक ढांचे को और अधिक सुदृढ़ किया। अतः 1947 तक संघ- पंजाब और सिंध के इलाकों में अपना अच्छा प्रभाव बना चुका था। संघ ने मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक और विभाजनकारी और हिंदू विरोधी कार्यों का डटकर सामना किया लेकिन कांग्रेस की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण भारत- विभाजन हो गया। अतः उस स्थिति में विभाजन की जो विभीषिका उत्पन्न हुई उसमें संघ ने मानवीय सेवा कार्यों का उपक्रम स्थापित किया- चाहे बंगाल हो या पंजाब वहां से आने वाले सभी शरणार्थियों की संघ के स्वयंसेवकों ने मदद की।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के प्रवास
• उस समय सिंध में जो परिस्थितियाँ उत्पन्न हो रही थीं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की दृष्टि से ओझल नहीं थीं। कांग्रेस के कराची अधिवेशन के लगभग एक वर्ष पश्चात्, डॉ. हेडगेवार का इसी शहर में प्रवास हुआ। इस यात्रा का मूल उद्देश्य स्पष्ट था – वहाँ के हिन्दू समाज को संभावित संकटों के प्रति सचेत करना और उन्हें समय रहते संगठित करने की दिशा में प्रेरित करना।

• राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पहले ही दशक के भीतर उसका कार्य सिंध प्रांत तक पहुँच चुका था। इस क्षेत्र में संघ का प्रथम केंद्र कराची बना, जहाँ मई 1932 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार “अखिल भारतीय तरुण हिन्दू परिषद्” द्वारा आयोजित “अखिल भारतीय हिन्दू युवा सम्मलेन” के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सम्मिलित हुए। उनके साथ प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक बाबाराव सावरकर भी उपस्थित थे। डॉ. हेडगेवार कराची में लगभग छह दिनों तक ठहरे और इस अवधि में सिंध तथा पंजाब से आए अनेक कार्यकर्ताओं के समक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मूल भावना, उद्देश्य और संगठनात्मक स्वरूप का परिचय प्रस्तुत किया।
• इसी प्रवास के दौरान कराची में संघ की पहली शाखा का शुभारंभ भी हुआ, जो सिंध में संघ-कार्य के औपचारिक विस्तार का प्रारंभिक चरण सिद्ध हुआ।
• सिंध जैसे सामरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में संघ कार्य की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु 1939 में बापुराव भिशिकर को भी कराची भेजा गया। वे एक अनुभवी और समर्पित स्वयंसेवक थे, जिन्होंने वहां पहुंचकर स्थानीय परिस्थिति का गहन अध्ययन किया और सिन्धी युवाओं से संपर्क स्थापित करना शुरू किया। उन्ही के प्रयासों से एक स्थानीय युवक – वासुदेव को संघकार्य से जोड़ा, जो आगे चलकर स्थानीय नेतृत्व के रूप में उभरे। इस संगठनात्मक विस्तार में जोगलेकर और जयंती व्यास जैसे वरिष्ठ स्वयंसेवकों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
• संघ कार्य के विस्तार और वैचारिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उस समय उठाया गया जब बाबासाहब आप्टे ने लगभग एक माह का संगठित प्रवास सिंध में किया। उनका यह प्रवास न केवल संगठनात्मक व्यवस्थाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए था, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं को वैचारिक मार्गदर्शन और प्रेरणा देने के उद्देश्य से भी अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध हुआ। इस दौरान उन्होंने कराची के प्रतिष्ठित विधिज्ञ खानचंद गोपालदास से संपर्क स्थापित किया और उन्हें संघ की विचारधारा तथा कार्यपद्धति से परिचित कराया। बाबासाहब आप्टे के प्रभावशाली संवाद से प्रेरित होकर गोपालदास ने न केवल संघ से सक्रिय रूप से जुड़े, बल्कि उन्हें संघचालक भी नियुक्त किया गया।
• सिंध में संघ कार्य के विस्तार में राजपाल पुरी की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे और उनका संघ से संपर्क प्रचारक के.डी. जोशी के माध्यम से हुआ। बाद में पुरी को सिंध के प्रांत प्रचारक भी नियुक्त किया गया। उन्हें युवाओं के बीच कार्य करने के लिए बाबासाहब आप्टे ने प्रेरित किया था। परिणामस्वरूप लालचंद अत्रे, लोकमान्य जेटली, वासुदेव तिवारी, वासुदेव चुलानी और मोहनलाल शर्मा जैसे युवा कार्यकर्ताओं का एक सक्रिय समूह तैयार हो गया।
• पंजाब भी, सिंध की भांति, मुस्लिम बहुसंख्यक जनसंख्या के आधार पर मुस्लिम लीग की पाकिस्तान-निर्माण योजना के लिए एक सहज और अनुकूल क्षेत्र बन गया। ऐसे समय में वहाँ भी हिंदू समाज को संगठित करना आवश्यक हो गया, ताकि यदि विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो, तो उसका संगठित प्रतिकार किया जा सके। इसी उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार का प्रथम प्रवास लाहौर में अगस्त 1938 में हुआ।


• तत्पश्चात, जब पंजाब में संघ का कार्य विस्तार होने लगा, तो लाहौर में एक शिक्षण वर्ग आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इस वर्ग में डॉ. हेडगेवार के साथ बाबासाहब आप्टे एवं गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर भी सम्मिलित हुए। 23 अगस्त को इस अधिकारी शिक्षण वर्ग में डॉ. हेडगेवार का प्रथम उद्बोधन हुआ। अगले दिन गुरुजी ने स्वयंसेवकों को संबोधित किया। चौथे दिन पुनः डॉ. हेडगेवार का भाषण निर्धारित था, किंतु स्वास्थ्य अचानक खराब हो जाने के कारण वह बोल नहीं सके। उस दिन गुरुजी ने ही उनका स्थान लेकर स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन किया। इस वर्ग में मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब विधान परिषद् के सदस्य एवं समाजसेवी राजा नरेन्द्रनाथ उपस्थित रहे। लाहौर प्रवास के दौरान डॉ. हेडगेवार ने वहाँ के प्रख्यात लेखक गोकुलचंद नारंग से भी भेंट की।
• संघ के कार्य की व्यापकता बढ़ाने के लिए डॉ. हेडगेवार ने 1937 में जनार्दन चिंचालकर और दिगंबर राजाभाऊ पातुरकर को लाहौर, कृष्णा (राजा) जोशी को सियालकोट तथा मोरेश्वर मुंजे को रावलपिंडी भेजा था। इन कार्यकर्ताओं ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पंजाब में संघ का एक आधारभूत संरचना तैयार की। बाबासाहब आप्टे और दादाराव परमार्थ को भी आवश्यकता अनुसार विभिन्न प्रांतों में भेजा जाता था—कभी महाराष्ट्र, कभी पंजाब, तो कभी उत्तर प्रदेश और महाकौशल क्षेत्र में उनका सतत प्रवास रहता था। डॉ. हेडगेवार पत्र-व्यवहार के माध्यम से इन सभी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करते रहते थे और समय-समय पर उनका उत्साहवर्धन भी करते थे।
श्रीगुरु जी के प्रवास
• सरसंघचालक के रूप में 1941 में गुरूजी का पहला लाहौर प्रवास हुआ। इस अवसर पर उन्होंने वहां के स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए मुंबई के संघचालक दादा नाइक का उदाहरण दिया, जिन्होंने 1934 में मुंबई में संघ कार्य की शुरुआत की थी। प्रारंभ में वहां शाखा की उपस्थिति मात्र 20 रहती थी, लेकिन दादा नाइक के अथक प्रयासों से छह वर्षों में यह संख्या 1500 तक पहुंच गई। गुरूजी ने लाहौर में स्पष्ट कहा, “जैसा काम दादाजी ने मुंबई में किया, वैसा हमें अपने यहाँ करना है।” इस प्रेरणा से पंजाब में संघ कार्य को नई दिशा मिली। 1942 में प्रांत प्रचारक माधवराव मूले के मार्गदर्शन से पंजाब से 40 प्रचारकों की टोली तैयार की गई, जिन्होंने संघ कार्य को तहसील स्तर तक पहुँचाने का कार्य किया।

• 1943 में लाहौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रथम कार्यालय बनकर तैयार हुआ, जिसका नाम डॉ. हेडगेवार भवन रखा गया। इस भवन का लोकार्पण स्वयं सरसंघचालक गुरूजी ने अपने कर-कमलों से किया।
• 1943 से ही गुरु गोलवलकर का सिंध में वार्षिक प्रवास प्रारंभ हुआ, जो संघ कार्य के विस्तार और सामाजिक संवाद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इस प्रवास के अंतर्गत उन्होंने हैदराबाद (सिंध), कराची, शुक्कर, शिकारपुर तथा मीरपुर ख़ास जैसे प्रमुख नगरों का भ्रमण किया और संघ कार्यकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं व्यावसायिक वर्गों से भी संवाद स्थापित किया।
• अगस्त 1947 को करांची में गुरुजी ने एक विराट सार्वजनिक सभा को संबोधित किया, जोकि अब तक की उनकी सबसे बड़ी सभा मानी जाती है। इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में लगभग 1 लाख से अधिक श्रोता उपस्थित थे। सभा का संचालन सिंध के प्रसिद्ध संत साधु टी. एल. वासवानी द्वारा किया गया, जो इस आयोजन को एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है। इस विशाल जनसभा से पूर्व नगर में संघ स्वयंसेवकों द्वारा भव्य पथ-संचलन निकाला गया, जिसमें लगभग 10,000 स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में भाग लिया।
• 7 अगस्त को गुरु गोलवलकर का हैदराबाद में प्रवास हुआ। वहाँ उन्होंने नेशनल कॉलेज के मैदान में स्वयंसेवकों तथा सामान्य नागरिकों के एक विशाल समूह को सार्वजनिक रूप से संबोधित किया। मुस्लिम लीग ने इस सभा को रोकने के हरसंभव प्रयास किए, किंतु संघ के अनुशासन और स्वयंसेवकों की प्रतिबद्धता ने सभी अवरोधों को निष्फल कर दिया। परिणामस्वरूप लगभग 35,000 लोगों ने अत्यंत शांति और अनुशासन के साथ गुरुजी का संबोधन सुना।
• उन दिनों संघ के कार्य की दृष्टि से पंजाब को सात विभागों में विभाजित किया गया था।
DivisionDistricts
1 Multan Mianwali, Monthomerry, Khanewal, Dera Ghazi Khan, Muzaffargarh, and Dera Ismail Khan
2 Rawalpindi Jhelum, Gujarat, Haripur, Peshawar, and Campbellpur
3 Layalpur Gujranwala, Jhang, Sargodha, and Sheikhupura
4 Jammu Jammu, Mirpur, Srinagar, Udhampur, Reasi, and Kathua
5 Jalandhar Ludhiana, Hoshiarpur, and Firozpur
6 Amritsar Sialkot, Gurdaspur, and Kangra
7 Lahore Lahore city, and Lahore District
• तत्कालीन स्थितियों की गंभीरता को समझने और संगठनात्मक रणनीति तय करने के उद्देश्य से नवंबर 1946 में सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने पंजाब का दौरा किया। भविष्य में आने वाले संकट का उन्हें स्पष्ट आभास हो रहा था। अपने इस दौरे में उन्होंने हिन्दू समाज को आत्मविश्वास तथा आत्म-रक्षा का सन्देश दिया।
• नवंबर 1946 में जब गुरु गोलवलकर का प्रवास पेशावर के वार्षिक उत्सव के अवसर पर हुआ, तो अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “काबुल और यहाँ के देहातों से आए भाइयों से मेरा आग्रह है कि वे यहाँ के संघ-बंधुओं से सतत संपर्क बनाए रखें, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सभी एक-दूसरे के सहयोगी बन सकें।” उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए सरदार हरि सिंह नलवा का उदाहरण प्रस्तुत किया और कहा, “जैसे उन्होंने सीमावर्ती प्रदेशों में हिंदुओं को एक सूत्र में पिरोने के लिए संघर्ष किया, वैसे ही आज हमें भी संगठित होने की आवश्यकता है।”
• उसी कालखंड में, 1946 में ही बहावलपुर और क्वेटा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पहली बार संघ की शाखाओं का शुभारंभ हुआ। बन्नू जैसे सीमांत क्षेत्र में तो संघ की गतिविधियाँ अत्यंत सक्रिय थीं—वहाँ के लगभग सभी विद्यालयों में नियमित रूप से शाखाएँ लगती थीं और स्वयंसेवकों की संख्या उल्लेखनीय रूप से अधिक थी।

• 1947 के निर्णायक और उथल-पुथल भरे समय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पंजाब में संगठनात्मक दृढ़ता बनाए रखने हेतु दो महत्वपूर्ण शिक्षावर्ग आयोजित किए। पहला शिक्षावर्ग फगवाड़ा में और दूसरा संगरूर के समीप मस्तवाना साहब गुरुद्वारे के परिसर में लगाया गया। मस्तवाना के वर्ग में स्वयं भैयाजी दाणी ने बौद्धिक सत्र का संचालन किया, जबकि दोनों वर्गों को सरसंघचालक गुरु गोलवलकर का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ।
• इन वर्गों में भारी संख्या में स्वयंसेवकों ने भाग लिया — संगरूर में लगभग 1400 और फगवाड़ा में 2300 स्वयंसेवकों की उपस्थिति थी।
• वस्तुतः यह उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि उस अस्थिर वातावरण में भी राष्ट्र के लिए कार्य करने का उत्साह और समर्पण कार्यकर्ताओं के भीतर कितना प्रबल था। इन शिक्षावर्गों के माध्यम से संघ ने न केवल संगठनात्मक सुदृढ़ता दिखाई, बल्कि उस संकट काल में भी सेवा और शौर्य का संकल्प पुनः सुदृढ़ किया।
स्थानीय स्तर पर संघ के प्रयास
• 1947 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं का विस्तार देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों के लगभग सभी प्रमुख शहरों तक हो चुका था। रावलपिंडी, लाहौर, पेशावर, अमृतसर, जालंधर और अंबाला जैसे शहरों में संघ का संगठनात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाने लगा था। मुस्लिम लीग और उससे सम्बद्ध पत्र-पत्रिकाओं में संघ के विरुद्ध विषवमन एक सामान्य बात बन चुकी थी। इसके बावजूद, संघ के स्वयंसेवक पूरे साहस और अनुशासन के साथ मुस्लिम लीग की उग्र गतिविधियों का सामना करते रहे और समाज में सुरक्षा एवं आत्मविश्वास का संचार करते रहे।
• विभाजन से पूर्व जब पश्चिमी पंजाब, सिंध और उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत के क्षेत्रों में स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी, तब पंजाब के प्रांत प्रचारक माधवराव मुले ने लाहौर स्थित संघ कार्यालय में सभी विभाग प्रचारकों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई। इस बैठक में बदलते हालात, समाज पर मंडरा रहे खतरे और संभावित रणनीतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। चर्चा के उपरांत बैठक का समारोप करते हुए माधवराव मुले ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा, “संघ कार्य समाज हितार्थ चलता है। समाज पर संकट आने पर उसकी सब प्रकार से रक्षा करना यह स्वयंसेवकों का परम कर्तव्य है। जैसे भी परिस्थिति बने उसका सामना करने हेतु जिन-जिन साधनों की आवश्यकता हो जुटना चाहिए।” इस बैठक में मुल्तान नगरपालिका के अध्यक्ष पंडित शिव दत्त पराशर, डॉ. वर्मन और डॉ. जावा; मुज़फ्फरगढ़ से चौधरी पूरण सिंह (एडवोकेट); मिंटगुमरी से लाला रामदत्त (एडवोकेट) और बैरिस्टर नंदलाल; पाकपटन से
मुल्क राज विज; तथा मियांवाली से चांदी राम उपस्थित थे।
जब भारत-विभाजन की घोषणा हो गयी तो संघ ने इसका विरोध कैसे किया
• विभाजन से कुछ ही दिन पूर्व, पंजाब के फगवाड़ा में आयोजित संघ के शिक्षण शिविर को संबोधित करते हुए गुरु गोलवलकर ने एक तीन दिवसीय प्रौढ़ कार्यकर्ता बैठक में दृढ़ स्वर में कहा था, “हम पाकिस्तान को नहीं जानते, न ही वह हमें स्वीकार है। हमें तो संगठित रूप से तथा आत्मविश्वासपूर्वक खड़े रहकर, आवश्यक संघर्ष करते हुए अपने-अपने स्थान पर डटे रहना चाहिए। यदि हम संघर्ष से डरकर अपनी जन्मभूमि को त्याग देंगे, तो इतिहास हमारे बारे में यह लिखते हुए नहीं हिचकेगा कि इन लोगों को विभाजन का, अपनी प्रियतम मातृभूमि के अंगच्छेद का कोई दुःख नहीं हुआ। इन लोगों ने अपने प्राणों को अपनी मातृभूमि तथा उज्ज्वल, पराक्रमी परंपरा से भी बढ़कर समझा। यदि ऐसा हुआ, तो निश्चय जानिए कि हमारे समाज में यह मनोदुर्बलता सदा के लिए छा जाएगी। इसलिए, जी-जान से प्रतिकार करते हुए हमें अंत तक अपने-अपने स्थानों पर ही डटे रहने का प्रयत्न करना चाहिए।


• फगवाड़ा का यह ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैम्प, जो निर्धारित अवधि तक चलना था, उसे दस दिन पहले ही समाप्त कर दिया गया, ताकि प्रशिक्षित स्वयंसेवक समय रहते अपने-अपने स्थानों विशेषकर मुल्तान और रावलपिंडी की सुरक्षा व्यवस्था संभाल सकें। हिंदुओं के विरुद्ध हो रहे नरसंहार को रोकने और उनके जीवन की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों ने ‘सेफ पॉकेट्स’ (सुरक्षित क्षेत्र) बनाए, जिनमें असहाय परिवारों को शरण दी जाती थी।
• यदि हम इस यात्रा को भारत-विभाजन तक सीमित रखें, तो स्पष्ट होता है कि तब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक अत्यंत तेज़ी से फैलता हुआ सामाजिक संगठन बन चुका था। उस समय इसकी सदस्य संख्या लगभग 20 लाख (2 मिलियन) तक पहुँच चुकी थी। संघ की गतिविधियाँ संपूर्ण भारत में फैल चुकी थीं, और यह संगठन हर आयु वर्ग और समाज के प्रतिष्ठित तबकों में अपनी गहरी पैठ बना चुका था। ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था, “Started in 1925, the Rashtriya Swayamsevak Sangh has innumerable morin, with a total membership of two million. Its volunteers and workers in Bombay city alone number 10,000…… The organisation which is open to Hindus only, has gained immense strength in the last six or seven years.”
• अंततः कांग्रेस और लीग के बीच राजनीतिक एवं व्यक्तिगत कारणों से स्वतंत्रता के साथ-साथ विभाजन को भी स्वीकार कर लिया गया। वैसे संघ विभाजित हुए क्षेत्रों विशेषकर सिंध, पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमांत जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एक व्यवस्थित संगठन के रूप में स्थापित हो चुका था, जो सांस्कृतिक जागरण का आधार बना। लेकिन जब विभाजन की विभीषिका जैसी परिस्थितियों ने जन्म लिया, तो संघ ने राहत और पुनर्वास कार्यों में भी अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाने वाला, संगठन बनकर राष्ट्रसेवा और मानवता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन किया।
विभाजन-विभीषिका के दौरान स्वयंसेवकों का बलिदान
• विभाजन के उस भयावह कालखंड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने अपने घर-परिवार, सुख-सुविधा और व्यक्तिगत जीवन की चिंता किए बिना समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। वे केवल विचार से नहीं, कर्म से भी राष्ट्ररक्षा के यज्ञ में आहुति देने वाले बने। लाहौर के वैद्यराज अमरनाथ डोगरा इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने कुछ निकटतम साथियों के साथ मिलकर उन्मादी और हिंसक तत्वों के खिलाफ मोर्चा संभाला। उनकी सक्रियता से चिंतित होकर स्थानीय पुलिस ने उन पर ₹5000 का इनाम घोषित कर दिया — जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी। परंतु डोगरा ने साहसपूर्वक भेष बदलकर भूमिगत हो गए और अंततः पुलिस कभी उन्हें पकड़ नहीं सकी। हालाँकि, हर स्वयंसेवक इतना भाग्यशाली नहीं रहा। कई स्वयंसेवकों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया, उन पर झूठे आरोप लगाए गए और उन्हें यातनाएँ दी गईं।
• संघ की ओर से किए जा रहे इन रक्षा प्रयासों की सबसे बड़ी कीमत उन 87 स्वयंसेवकों ने चुकाई जिन्होंने दंगों के दौरान लोगों की जान बचाते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। मुल्तान में मुस्लिम लीग के सक्रिय नेता सैय्यद गुलाम नबी शाह ने गैर-मुसलमानों के विरुद्ध एक व्यापक अभियान चला रखा था। उसके नेतृत्व में एक हिंसक भीड़ ने संघ के स्वयंसेवकों को निशाना बनाया। इसी हमले में मिंटगुमरी (अब साहीवाल) के स्वयंसेवक मनोहरलाल को पाँच गोलियाँ लगीं और उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। उसी भीड़ ने मुल्तान के ज्ञान तल्ला क्षेत्र में संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता सेठ शिव नारायण को भी निर्ममता से मार डाला।
• संघ के स्वयंसेवकों ने अत्यंत सीमित समय में एक ऐसा सघन सुरक्षा तंत्र तैयार कर लिया था, जो तत्कालीन संकटों और पीड़ितों की आवश्यकताओं को प्रभावी रूप से संबोधित कर सके। तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच संघ ने उन सभी उपायों को अपनाया जो पीड़ितों के आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए उनकी आत्मरक्षा को भी सुनिश्चित कर रहा था, इसमें चाहे वह सूचनाओं का नेटवर्क हो, राहत वितरण, विस्थापितों का पुनर्वास, या फिर सामुदायिक सुरक्षा व्यवस्था का निर्माण।
• हालाँकि, यह भी एक यथार्थ है कि मुस्लिम लीग का हमला केवल भौतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक, प्रशासनिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी गहराई से योजनाबद्ध था। उनके पास न केवल स्थानीय प्रशासन का मौन समर्थन था, बल्कि विभाजन की सत्ता-राजनीति ने भी उनके पक्ष को परोक्ष रूप से बल प्रदान किया। परिणामस्वरूप अंततः उन्हें सामरिक और वैचारिक लाभ मिला। परंतु इस अवधि, विशेषकर मार्च से सितंबर 1947 तक स्वयंसेवकों ने निरंतर, निर्भीक और संगठित प्रतिरोध किया। उन्होंने न केवल अपने हिन्दू समाज की रक्षा की, बल्कि व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने के बाद जो शून्य उत्पन्न हुआ था, उसमें राहत, साहस और संगठन का संचार किया।
• विडंबना यह रही कि इस साहसपूर्ण भूमिका के लिए उन्हें ‘सांप्रदायिक संगठन’ के रूप में प्रचारित करने का प्रयास किया गया। यह राजनीतिक व वैचारिक नैरेटिव उस समय की सत्ता संरचना द्वारा गढ़ा गया और वही इतिहास के कई पन्नों में तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि यह समय संघ के सेवा, समर्पण और संगठन की परीक्षा का कालखंड था, जिसे उन्होंने पूरे मनोयोग से निभाया।
सेवा कार्य : वास्तुहारा सहायता समिति
• 8 फरवरी सन 1950 के सायंकाल संघ के मुख्य प्रांतीय-कार्यालय, नं. 26, कार्नवालिस स्ट्रीट में संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं एवं निर्वासितों की सहायता के लिए इच्छुक अन्य कई सम्भ्रांत व्यक्तियों की एक बैठक बुलाई गयी, जिसमें वास्तुहारा-समस्या पर सर्वांगीण विचार-विमर्श करके यह निश्चय किया गया कि निर्वासित सहायता के संघ के इस कार्यक्रम को ‘वास्तुहारा सहायता समिति’ के नाम से प्रचलित कर परम पू. श्रीगुरूजी के निर्देशानुसार सर्वत्र इसी नाम से अविलम्ब ही कार्यारम्भ कर दिया जाए।
• कार्य का संचालन करने की दृष्टि से एक छोटी-सी कार्यकारिणी भी बनाई गयी, जिसमें समाज सेवा के लिए विख्यात कई विद्वान सम्मिलित हुए। कलकत्ता के बैरिस्टर श्री रणदेव चौधरीजी इस समिति के अध्यक्ष बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बंग प्रांतीय कार्यवाह श्री अमलकुमार बसु समिति के प्रधान कार्यवाह बने। मणिपुर राज्य के भूतपूर्व चीफ जस्टिस श्री कामाख्याराम बरुआ समिति की असम प्रांतीय शाखा के अध्यक्ष बने।
• इसी बैठक में यह भी तय हुआ कि सम्पूर्ण बंग-प्रांत अथवा आस-पास के प्रदेशों में जहाँ-जहाँ समिति के कार्य का विस्तार होगा, उन सब शाखाओं के मार्गदर्शन और संचालन का कार्य यही कार्यकारिणी करती रहेगी, एवं उसके हेतु समय-समय पर जो भी नियमादि बनाने पड़े, व व्यवस्था देनी आवश्यक हो, वे सब कार्य उक्त कार्यकारिणी के अधीन होंगे। वस्तुतः भावी संकट की सम्भावना के विचार से ही संघ ने इस समिति का गठन किया था।
• 14 मार्च को पूजनीय श्री गुरुजी ने एक वक्तव्य द्वारा समस्त देशवासियों के निकट एक निवेदन किया, जिसमें पूर्वी-बंगाल के विस्थापित हिन्दुओं की सहायता के लिए मुक्तहस्त से दान देने के लिये जनता का आह्वान किया गया था।
• परम पूजनीय श्री गुरुजी के उस वक्तव्य का जादू के समान असर हुआ। 14 मार्च को उनका वह वक्तव्य प्रकाशित हुआ और ठीक दो मास के अन्दर ‘वास्तुहारा सहायता’ के लिये नागपुर और कलकत्ते के कार्यालयों में लगभग 50 हजार रुपये सहायता कोष के रूप में एकत्रित हो गये और प्रतिदिन, प्रतिसप्ताह वह निधि बढ़ती ही रही। यहाँ तक कि प्रदेश-प्रदेश में निधि-संग्रह का कार्य विधिवत् बन्द होते समय तक समिति के कोष में कुल 8,56,689/-)॥ आठ लाख छप्पन हजार छ सौ नवासी रुपये डेड़ आने जमा हो गये।
• समिति द्वारा भोजन तथा वस्त्र वितरण की व्यवस्था : समिति की ओर से प्रत्येक परिवार को प्रति व्यक्ति एक पाव चावल एवं तरकारी, दाल, तेल, नमक, लकड़ी आदि सामग्री दी जाती रही। परन्तु जब विस्थापितों की संख्या शीघ्र ही बढ़ने लगी, तब समिति ने उनके लिये दो बार भोजन बनाकर खिलाने की व्यवस्था की। भोजन देने का यह कार्य 1950 के मार्च से शुरू हुआ, जो जून के अन्त तक अविरत रूप से चलता रहा। प्रतिदिन सुबह शाम लगभग 200 व्यक्ति भोजन करते थे। इस प्रकार विस्थापितों का आना बंद होने अर्थात जून मास के अन्त तक कुल 1568 परिवारों अर्थात लगभग छह हजार लोगों को समिति की ओर से आश्रय दिया गया। इसके अतिरिक्त सरकारी अधिकारियों द्वारा भेजे गये लगभग छह हजार विस्थापितों को भी समिति ने भोजन दिया। रुग्ण व्यक्तियों को औषध, दुग्ध व फल आदि देने की भी व्यवस्था समिति ने की थी। बहुत से विस्थापित अर्द्ध-नग्न अवस्था में ही यहाँ पहुँचते थे। अतः समिति ने उनके बीच यथासम्भव वस्त्र-वितरण किया।
• समिति द्वारा 80 हजार को भोजन, एक लाख को अल्पाहार एवं डेढ़ लाख को वस्त्र : यदि मोटी तौर पर कहा जाय तो फरवरी के आरम्भ से लेकर अगस्त के अन्त तक समित्ति को प्राथमिक सहायता के कार्य में बराबर व्यस्त रहना पड़ा। लगातार 6 मास तक चले इस कार्य के संकलित-वृत्त का सार यदि संक्षेप में बताना हो तो कहना पड़ेगा कि आसाम-बंगाल के समस्त सहायता केन्द्रों द्वारा 80 हजार से भी अधिक व्यक्तियों को समिति ने भोजन दिया। यह 80 हजार संख्या उन व्यक्तियों की है, जिनमें से अनेक केवल एक दिन तो अनेक लगातार तीन दिन तो कतिपय एक सप्ताह तथा कुछ तीन सप्ताह या उससे भी अधिक समय तक समित्ति के केन्द्रों व शिविरों से भोजन के रूप में सेवा ग्रहण कर चुके थे।
• विविध केन्द्रों द्वारा विशेषतया स्टेशनों पर मूरी, चिउड़ा और दूध आदि के रूप में जो अल्पाहार दिया गया उसका संकलित हिसाब करने पर स्पष्ट हो जाता है कि उस रूपमें कुल 1 लाख से अधिक विस्थापितों की सेवा की गयी।
• विभिन्न केन्द्रों में जो वस्त्र वितरण किया गया, उसके द्वारा डेढ़ लाख से भी अधिक वास्तुहाराओं को सहायता मिली और कपड़ों की 2500 से भी अधिक गाठें वितरित्त की गयीं।
• विस्थापित सेवा के इस अवसर पर जो स्वयंसेवक के नाते सहायता कार्य में जुटे रहे, उनकी संख्या समिति के आसाम-बंगाल के सारे सहायता-केन्द्रों को मिलाकर 5000 से भी ऊपर रही।
सेवा कार्य : पंजाब रिलीफ कमेटी
• पंजाब के अनेक शहरों में हिन्दू–सिख विरोधी सुनियोजित दंगों के परिणामस्वरूप गैर–मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन प्रारंभ हो गया। इन दंगों को मुस्लिम लीग प्रायोजित कर रही थी, जबकि कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार मिलकर भारत के विभाजन की रूपरेखा को अंतिम स्वरूप देने में लगे थे। ऐसे समय में गैर–मुसलमान समाज में व्याप्त असुरक्षा को दूर करने का दायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने हाथ में लिया। इस उद्देश्य से मार्च 1946 में संघ द्वारा पंजाब रिलीफ़ कमेटी का गठन किया गया, जिसकी पहल स्वयं संघ के सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने की थी।
• पंजाब रिलीफ़ कमेटी की शाखाएँ पंजाब के सभी प्रमुख शहरों में खोली गईं। यह समिति निर्वासितों को आर्थिक और सामाजिक दोनों प्रकार से राहत पहुँचाने का कार्य करती थी। क्षतिपूर्ति हेतु आवेदन सहित उन्हें रोजगार दिलाने के लिए प्रयत्न भी इसके कार्यों में शामिल था। इसके अतिरिक्त लापता पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की खोज, आर्थिक सहायता, न्यायालयीन मामलों में मार्गदर्शन तथा चिकित्सीय सेवा जैसी विविध प्रकार की सहायता भी समिति द्वारा उपलब्ध कराई जाती थी। इस समिति के अध्यक्ष पंजाब प्रान्त के संघचालक रायबहादुर लाला बद्रीदास और कोषाध्यक्ष डॉ. गोकुलचंद नारंग बनाये गए।
• इस केंद्रीय स्थल पर अनाज, वस्त्र, जूते आदि आवश्यक वस्तुओं का भंडारण किया जाता था। यहाँ लगभग 100 से 150 स्वयंसेवक दिन-रात रहकर ज़रूरतमंदों के लिए विभिन्न स्थानों पर राहत सामग्री पहुँचाने का कार्य करते थे।
• रिलीफ़ कमेटी को कई विभागों संकलन, सेवा, यातायात, कैम्प व्यवस्था आदि में विभाजित किया गया था। दंगों में अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए लोगों के अंतिम संस्कार की विशेष व्यवस्था भी की गई थी। इसके प्रमुख के रूप में दिल्ली के सर्जन डॉ. आर.एन. कटारिया और महेंद्र कार्यरत थे। उनकी टोली प्रतिदिन लगभग 10–12 मृतकों का अंतिम संस्कार करती थी। स्वयंसेवकों का यह दल सड़कों के किनारे पड़ी लावारिस लाशों का भी क्रियाकर्म संपन्न करता था।
• दिल्ली में भी शरणार्थियों की सहायता हेतु अप्रैल 1947 में हिंदू सहायता समिति का गठन किया गया। पलायन से मजबूर होकर प्रतिदिन लगभग चार हज़ार लोग दिल्ली पहुँच रहे थे। समिति के अध्यक्ष लाला हंसराज गुप्ता थे, जो संघ के प्रांत संघचालक भी थे, जबकि महासचिव का दायित्व वी.पी. जोशी को सौंपा गया। समिति का सबसे महत्वपूर्ण कार्य प्रतिदिन दिल्ली आने वाले हज़ारों शरणार्थियों के लिए शिविरों में रहने, भोजन, वस्त्र और औषधि आदि की व्यवस्था करना था। इसके लिए स्वयंसेवक प्रातः 5 बजे से रात 11 बजे तक रेलवे स्टेशन पर उपस्थित रहते। पहले स्टेशन पर ही शरणार्थियों को अल्पाहार दिया जाता और उसके बाद उन्हें समीप स्थित क्वींस गार्डन कैम्प में ले जाकर भोजन कराया जाता। उस समय दिल्ली में चार प्रमुख कैम्प सक्रिय थे—बिरला हाई स्कूल के पास सब्ज़ी मंडी कैम्प, हिंदू महासभा भवन कैम्प, पंचकुइयां कैम्प और नरेला कैम्प। दिल्ली के अतिरिक्त लखनऊ, कानपुर, प्रयाग, एटा, फ़िरोज़ाबाद, मैसूर, बंगलुरु, बेलगाम, चुरू, जयपुर और पूना जैसे अनेक शहरों में भी स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों के पुनर्वास और उनकी सहायता का कार्य किया।
• पंजाब रिलीफ कमिटी के लिए यह सेवा-कार्य इतना भी आसन नहीं था। हर दिन सरकारी दमन और गिरफ्तारियों का खतरा बना रहता था। जैसे केंद्रीय भण्डारण की स्थापना के एक महीने बाद ही वहां पंजाब पुलिस ने छापा मार दिया, क्योंकि उन्हें संदेह था कि राहत सामग्री की आड़ में शस्त्र जमा किए जा रहे हैं। किंतु पूरे दिन चली गहन तलाशी के बावजूद पुलिस को वहाँ कोई आपत्तिजनक वस्तु नहीं मिली। इसी प्रकार, जसवंत राय, जगदीश चंद्र, नानक चंद, गणपत राय और मेला राम – ये पाँच कार्यकर्ता पंजाब रिलीफ़ कमेटी के थे। वे जीप गाड़ियों में शरणार्थियों के लिए कपड़े आदि सामग्री लेकर डेरा इस्माइल खान जा रहे थे। इस दौरान पुलिस ने उन्हें मुरांग क्षेत्र में पकड़ लिया और गिरफ़्तार कर लिया। बाद में उन्हें ड्यूटी मजिस्ट्रेट वेद कुमार रानाडे के समक्ष पेश किया गया। उनके पक्ष में अधिवक्ता ने जमानत पर रिहाई का आवेदन प्रस्तुत किया था। अदालत ने पुलिस को इस विषय में अगले दिन रिपोर्ट देने का आदेश दिया था।
• इसके बावजूद, पंजाब रिलीफ़ कमेटी के अध्यक्ष रायबहादुर बद्रीदास लगातार संघ के इस सेवा-कार्य में पूर्ण मानयोग से जुटे हुए थे। वह लगातार अपील कर इस कार्य के लिए आर्थिक सहायता के साथ-साथ स्वयंसेवकों में जोश भरने का कार्य करते रहे। उन्होंने लिखा, “पंजाब रिलीफ़ कमेटी द्वारा हाल ही में की गई अपील को अच्छा प्रतिसाद मिला है। पंजाब हिंदू और सिख रिलीफ़ कमेटी, कलकत्ता के चेयरमैन श्री करमचंद ठापर ने पंजाब रिलीफ़ कमेटी द्वारा संचालित राहत कोष के लिए 25,000 रुपये भेजे हैं। नवांशहर (उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत) के रायबहादुर ईश्वरदास ने भी अपने हाल ही में किए गए 25,000 रुपये देने के वायदे में से 5,000 रुपये की अगली किश्त भेजी है। फिर भी हमारे पास उपलब्ध कोष बहुत अल्प हैं। प्रांत के हिंदुओं और सिखों के सामने असंख्य समस्याएँ खड़ी हैं। इसलिए हर हिंदू और सिख से आग्रह है कि वह अपनी सामर्थ्य अनुसार पंजाब रिलीफ़ कमेटी के कोष में योगदान करे। यही राष्ट्र की सच्ची सेवा का समय है। इस छोटी-सी अपील का व्यापक रूप से समर्थन किया जाना चाहिए। प्रत्येक अंशदान किया गया रुपया अत्यंत मूल्यवान है।”

