जब हम भारतीय समाज के ऐतिहासिक ताने-बाने, स्वतंत्रता के बाद की उसकी लंबी यात्रा और वर्तमान दौर की गहरी उथल-पुथल का विश्लेषण करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार राजनीतिक अतिवाद ने उस मूल सामाजिक सहमति को खंडित किया जो देश की आज़ादी के शुरुआती दशकों में बनी थी।
सन 1990 के दशक से पहले, जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं हुई थी, तब आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार आरक्षित वर्गों की कुल आबादी लगभग 22 प्रतिशत हुआ करती थी, जबकि अनारक्षित वर्ग, जिन्हें सामान्य या सवर्ण कहा जाता है, उनकी आबादी लगभग 78 प्रतिशत थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद राजनीतिक समीकरणों में जो बदलाव लाए गए, उसके पीछे एक ऐसा वैचारिक भय काम कर रहा था कि 22 प्रतिशत की यह संख्या लोकतांत्रिक और बहुसंख्यक आबादी के आंकड़े को सीधे तौर पर पार नहीं कर सकती। इस खाई को पाटने और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए मंडल आयोग जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया गया, जिसका मूल उद्देश्य हिंदू समाज के भीतर एक ऐसा स्थायी वर्ग-संघर्ष पैदा करना था जो आर्थिक और सामाजिक रूप से पारंपरिक समूहों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर सके। इस एजेंडे के तहत यह दुष्प्रचारित किया गया कि इन वर्गों ने पिछले पांच हजार वर्षों से समाज का पूरी तरह शोषण किया है और तथाकथित वंचितों को पानी तक नहीं पीने दिया।
जबकि ऐतिहासिक और सामाजिक यथार्थ इसके बिल्कुल विपरीत रहा है; समाज का पूरा ढांचा पारंपरिक रूप से आपसी निर्भरता और पूरकता पर टिका था, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ओबीसी और एससी जातियां एक-दूसरे की पूरक थीं और कोई भी वर्ग अकेले जीवित नहीं रह सकता था। इसके विपरीत, जिन समूहों को इस राजनीतिक फेरबदल के तहत ओबीसी आरक्षण के दायरे में लाया गया, उनमें से कई जातियां सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत संपन्न थीं, जिनके पास बड़े पैमाने पर भूमि, संसाधन और ऐतिहासिक राजवंश तथा रियासतें थीं। इस व्यवस्था ने हिंदू समाज को हमेशा के लिए एक स्थायी वर्ग-संघर्ष और विभाजन के गहरे खांचों में बांट दिया, क्योंकि ओबीसी आरक्षण हमेशा से विशुद्ध रूप से वर्ग-आधारित राजनीति का हथियार रहा है, जिसके परिणामस्वरूप 1990 के पूर्व जो सामान्य वर्ग कुल आबादी का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा हुआ करता था, वह नीतियों और सामाजिक विस्थापन के चलते आज सिमटकर मात्र 20 से 30 प्रतिशत के दायरे में आ गया है।
इसी पृष्ठभूमि में जाति और आधुनिक राजनीतिक ‘कास्ट’ के अंतर को समझना भी अनिवार्य हो जाता है। सदियों के इतिहास में कभी इस बात का एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि तथाकथित वर्गों के बीच कभी कोई रक्तरंजित या हिंसक युद्ध हुआ हो; वैचारिक मतभेद, संवाद और शास्त्रार्थ हमेशा रहे हैं, जो कभी यूरोप या अरब के चर्च और कबीलाई संघर्षों की तरह खूनी संघर्षों में नहीं बदले। हमारे यहाँ जाति का मूल अर्थ कुल, वंश और परंपरा का वृक्ष है जो व्यक्ति को उसकी सांस्कृतिक जड़ों और गौरव से जोड़ता है। समय और आवश्यकता के अनुसार जातियां और ट्रेड-आधारित व्यवस्थाएं हमेशा बदलती रहती हैं आज जो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या सैनिक हैं, वे कल की नई सामाजिक श्रेणियां हैं। ट्रेड-आधारित व्यवस्था कभी खत्म नहीं होती, क्योंकि स्थायी तो केवल ‘वर्ण’ होता है जो व्यक्ति के गुण, कर्म और स्वभाव से निर्धारित होता है।
आधुनिक दौर में युवा पीढ़ी यानी जेन-जी को लेकर समाज में एक अत्यंत विरोधाभासी और भ्रामक बहस चलाई जा रही है। कम्युनिस्ट और वामपंथी विचारक एक तरफ तो आज की युवा पीढ़ी को यह कहकर महिमामंडित करते हैं कि यह पीढ़ी स्वभाव से ही उदंड, स्वच्छंद, अनुशासनहीन और स्थापित सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध बगावत करने वाली है, वहीं दूसरी तरफ वे यह भी तर्क देते हैं कि कोई भी जाति या वर्ण जन्म से तय नहीं होना चाहिए। लेकिन इसी तर्क की आड़ में वे हमारे प्राचीन वेदों, उपनिषदों और ग्रंथों को ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक’ व्यवस्था बताकर उन्हें पूरी तरह खारिज करने और नष्ट करने का षड्यंत्र रचते हैं। विडंबना यह है कि जो लोग ग्रंथों को नकारने के लिए जन्म आधारित व्यवस्था का विरोध करते हैं, वही लोग राजनीतिक स्वार्थ के लिए आरक्षण और पहचान की राजनीति के जरिए जाति को हमेशा के लिए और अधिक कठोर और स्थायी बना देते हैं। यदि हम अपने मूल वैदिक दर्शन की ओर देखें, तो वहाँ वर्ण और पहचान कोई जन्मजात और अपरिवर्तनीय लकीर नहीं थी; प्राचीन काल में तप, साधना, गुण, कर्म और स्वभाव के माध्यम से वर्ण परिवर्तन और वैचारिक उत्थान के द्वार हमेशा खुले रहते थे, जबकि आज की आधुनिक राजनीतिक प्रणाली ने समाज को स्थायी और अटूट खांचों में विभाजित कर दिया है।
वैश्विक इतिहास के पन्नों को पलटते हुए यह भी देखना होगा कि किस प्रकार विभिन्न ताकतों और ईसाई मिशनरियों ने दुनिया भर के मूल निवासियों को ‘सभ्य’ बनाने के छद्म एजेंडे के नाम पर उनकी संस्कृतियों, परंपराओं और उनके अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया। आज वही खतरनाक प्रयास हमारे अपने देश भारत में भी दोहराए जा रहे हैं, जहाँ समाज को जबरदस्ती एक समान सांचे में ढालने की जिद पाल ली गई है, जो कि प्रकृति के बुनियादी नियमों के बिल्कुल विपरीत है। यह पूरी सृष्टि त्रिगुणात्मक है यहाँ सत, रज और तम गुणों की विविधता के कारण संसार का कोई भी जीव, प्राणी या मनुष्य एक समान नहीं हो सकता। समानता का वास्तविक अर्थ हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार समान और न्यायसंगत अवसर प्रदान करना है, लेकिन आज समानता के नाम पर एक कृत्रिम एकरूपता थोपने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। इस विकृत मानसिकता के चलते राज्य को एक सर्वशक्तिमान ‘माई-बाप’ बना दिया गया है, जिससे यह भ्रम फैलाया गया है कि राज्य ही सब कुछ सुधार सकता है और हर समस्या का समाधान कर सकता है।
इसी व्यवस्थागत अराजकता और राजनीतिक अतिवाद के परिणामस्वरूप आज हिंदू समाज के भीतर अधिकारों की मांग अंतहीन होती जा रही है, और लोगों की लालसा व भूख लगातार बढ़ती जा रही है। स्थिति यह हो गई है कि अब जनसंख्या के अनुपात के आधार पर आरक्षण की मांग की जाने लगी है और निजी क्षेत्र तक में आरक्षण के दायरे को खींचने के प्रयास हो रहे हैं। इस अतिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति के कारण समाज में दिन-प्रतिदिन टकराव और संघर्ष गहराता जा रहा है, जो यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो एक दिन भारत को गृहयुद्ध और आंतरिक विनाश की ओर धकेल सकता है।
वर्तमान आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति पर नजर डालें तो हमारी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से विनिर्माण आधारित होने के बजाय सेवा क्षेत्र पर आधारित है। श्रम मंत्रालय और आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों (जैसे आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण – PLFS) के अनुसार, सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र कुल श्रम बल को बमुश्किल दो से तीन प्रतिशत नौकरियां प्रदान करते हैं, इसके बावजूद समाज का हर व्यक्ति ‘सरकारी बाबू’ बनने की दौड़ में शामिल है क्योंकि इस क्षेत्र के साथ सामाजिक सुरक्षा और ऊपरी कमाई का आकर्षण जुड़ा हुआ है। आज स्थिति यह हो गई है कि राज्य से हर कोई अधिकार तो मांग रहा है, लेकिन कर्तव्य की भावना पूरी तरह गायब हो चुकी है। इस देश में संसाधन स्वाभाविक रूप से सीमित हैं, और नए संसाधनों का निर्माण या राष्ट्र की समृद्धि केवल और केवल ‘कर्तव्य भाव’ से संभव होती है। जब तक नागरिक इस मूल भाव को आत्मसात नहीं करेंगे कि देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें, तब तक कोई भी व्यवस्था दीर्घकालिक नहीं चल सकती।
न्याय का सिद्धांत यह कहता है कि सबको निष्पक्ष और समान न्याय मिलना चाहिए, लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि न्याय और संरक्षण उसी को मिलता है जिसके पास भीड़ का संख्याबल हो या जो राज्य व्यवस्था को प्रभावी ढंग से ब्लैकमेल कर सके। जो वर्ग इन राजनीतिक और संस्थागत संरक्षणों से बाहर है, उसे हर सामाजिक असंतोष और समस्या के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है, जिससे समाज के भीतर एक गहरी और सुलगती बेचैनी पैदा हो रही है। यही कर्तव्य-प्रधान दृष्टिकोण और संतुलन का भाव ही हमारा सनातन मध्यम मार्ग रहा है, जिसके बल पर हिंदू समाज हर कठिन दौर और आपदा से बाहर निकलता आया है। लेकिन विडंबना यह है कि पिछले कई दशकों से सुनियोजित तरीके से राज्यतंत्र, वामपंथी कम्युनिस्ट विचारधाराओं और ईसाई मिशनरियों के गठजोड़ द्वारा हिंदू समाज को इस स्वाभाविक मध्यम मार्ग से भटकाने और विमुख करने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
इन तमाम राजनीतिक और वैचारिक आघातों के बावजूद, हिंदू समाज दुनिया के सबसे जीवंत, संगठित और विचारवान समाजों में से एक है। यह वह समाज है जिसने ब्रेन-डेड जोंबी या आसमानी किताबों को अंतिम सत्य मानने वाले समाजों से अलग अपनी एक अनूठी वैचारिक ऊंचाई को जिया है। इस समाज ने इतिहास के हर दौर में इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और वामपंथ जैसे आक्रामक प्रभावों के सामने कभी घुटने नहीं टेके।
जिस समाज में हर गांव और हर शहर में धार्मिक अनुष्ठान और भंडारे निरंतर चलते हों, और जहाँ अभाव के बीच भी लोग दीवाली पर दीपक जलाना नहीं भूलते, उस जीवंत समाज को कागजी सिद्धांतों से नहीं बांधा जा सकता। हमारे दर्शन ने केवल देवताओं को ही नहीं, बल्कि चार्वाक जैसे भौतिकवादियों, दैत्यों, दानवों, भूत-प्रेत, पिशाच, गंधर्व और पितरों तक को अपनी स्मृति और परंपरा में स्थान दिया है। जो समाज अपने पूर्वजों और हर उस इकाई को नहीं भूलता जो इस सृष्टि का हिस्सा रही है, उसे असंगठित करार देना ऐतिहासिक भूल है।
यदि इस कृत्रिम अतिवाद, वोट-बैंक की राजनीति और समाज को टुकड़ों में बांटने वाले षड्यंत्रों को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसके परिणाम इस महान संस्कृति और राष्ट्र के लिए अत्यंत भयावह हो सकते हैं। समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम संकीर्ण स्वार्थों और तुष्टीकरण की राजनीति से ऊपर उठकर गुण, कर्म और योग्यता के आधार पर एक संतुलित व्यवस्था का निर्माण करें, ताकि इस महान राष्ट्र के विरुद्ध कोई भी शक्ति आंख उठाने का दुस्साहस न कर सके।
– दीपक कुमार द्विवेदी
