इक्कीसवीं सदी का भारत एक अभूतपूर्व तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक रूपांतरण के दौर से गुज़र रहा है, जहाँ ऊर्जा सुरक्षा देश के सर्वांगीण विकास, औद्योगिक प्रगति और राष्ट्रीय संप्रभुता का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरी है। वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियाँ, अंतर्राष्ट्रीय तेल बाज़ारों में तेज़ी से होते उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच प्रत्येक संप्रभु राष्ट्र के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को आत्मनिर्भर बनाना प्राथमिक आवश्यकता बन गया है।
इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा अपनाई गई एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल नीति और विशेष रूप से ई 20 ईंधन यानी पेट्रोल में बीस प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का राष्ट्रव्यापी क्रियान्वयन एक ऐतिहासिक, साहसिक और युगांतरकारी कदम है। यह नीति केवल ईंधन के संयोजन में एक सामान्य बदलाव मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के आर्थिक स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, कृषि सुदृढ़ीकरण और ग्रामीण समृद्धि का एक सुविचारित और दूरदर्शी रोडमैप है।
प्रधानमंत्री के “आत्मनिर्भर भारत” और “स्वच्छ भारत” के राष्ट्रीय संकल्पों को सिद्ध करने की दिशा में यह कार्यक्रम देश को विदेशी जीवाश्म ईंधनों की भारी निर्भरता से मुक्त कराने का एक सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। इतने विशाल, व्यापक और विविधतापूर्ण राष्ट्र में जब इतना बड़ा नीतिगत अभियान चलाया जाता है, तो जहाँ एक ओर इसके आर्थिक व पर्यावरणीय लाभ स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं, वहीं दूसरी ओर एक गतिशील लोकतंत्र में किसी भी युगांतरकारी सुधार के साथ आरंभिक चरण में जन-जागरूकता, तकनीकी समन्वय, उद्योग तत्परता और व्यवस्थागत समायोजन की प्रक्रिया का चलना अत्यंत स्वाभाविक और स्वास्थ्यवर्धक है।
भारत में एथेनॉल सम्मिश्रण की यात्रा दूरदर्शिता, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और वैज्ञानिक नवाचारों के निरंतर प्रयासों की एक मिसाल है। एक समय था जब भारत में पेट्रोल में एथेनॉल की सम्मिश्रण दर नगण्य यानी लगभग डेढ़ प्रतिशत हुआ करती थी। किंतु, पिछले एक दशक में सरकार के सुदृढ़ नीतिगत समर्थन, पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और दूरदर्शी विज़न के कारण इस क्षेत्र में एक संरचनात्मक क्रांति आई है।

राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के अंतर्गत बीस प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को वर्ष 2030 से घटाकर वर्ष 2025-26 तक प्राप्त करने का साहसिक और आक्रामक निर्णय इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अपनी ऊर्जा चुनौतियों से निपटने के लिए कितनी तत्परता और इच्छाशक्ति के साथ कार्य कर रहा है।
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने देश भर में एथेनॉल के सुरक्षित भंडारण, वैज्ञानिक सम्मिश्रण और कुशल वितरण बुनियादी ढाँचे का रिकॉर्ड समय में विस्तार किया है। निजी और सार्वजनिक उत्पादकों को प्रोत्साहित करने के लिए एथेनॉल डिस्टिलरीज़ स्थापित करने हेतु ब्याज छूट योजनाएँ, सुगम वित्तीय सहायता और नीतिगत सहूलियतें उपलब्ध कराई गईं। सम्मिश्रण के आधार को केवल गन्ने के सीरे तक सीमित न रखकर इसे गन्ने के रस, मक्के, चावल और क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों से भी उत्पादित करने की अनुमति दी गई, जिससे एथेनॉल की राष्ट्रीय आपूर्ति में अभूतपूर्व स्थिरता और विविधता आई है।
ई 20 नीति का बहुआयामी प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है; इसका सीधा, सकारात्मक और दीर्घकालिक असर भारत के राजकोषीय स्वास्थ्य, सामाजिक ताने-बाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग पच्चीस-पचासी प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे देश के मुद्रा भंडार और राजकोषीय घाटे पर भारी दबाव पड़ता है।
ई 20 नीति के पूर्ण क्रियान्वयन से प्रतिवर्ष हज़ारों करोड़ रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा देश के भीतर बचेगी। इस बचाई गई पूँजी का उपयोग भारत के आंतरिक बुनियादी ढाँचे, जैसे— राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण, रेलवे के तीव्र विद्युतीकरण, नए एम्स जैसे चिकित्सा संस्थानों, आधुनिक विद्यालयों और अनुसंधान प्रयोगशालाओं की स्थापना में किया जा रहा है। इसके साथ ही, इस नीति का सबसे मानवीय और जन-कल्याणकारी पक्ष यह है कि यह सीधे तौर पर भारत के अन्नदाता यानी किसान से गहराई से जुड़ी हुई है। गन्ने, मक्के और अन्य अनाजों का एथेनॉल निर्माण में बड़े पैमाने पर उपयोग होने से देश की चीनी मिलों और कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय मजबूती मिली है।

इसके परिणामस्वरूप किसानों के गन्ने और कृषि उत्पादों के बकाए का भुगतान अब रिकॉर्ड समय में सीधे उनके बैंक खातों में हो रहा है। देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सैकड़ों नई एथेनॉल उत्पादन इकाइयों की स्थापना से स्थानीय युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोज़गार के लाखों अवसर पैदा हुए हैं, जिसने ‘बायो-इकोनॉमी’ यानी जैव-अर्थव्यवस्था के एक नए युग का सूत्रपात किया है।
पर्यावरण और वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं के मोर्चे पर भी अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत द्वारा व्यक्त किए गए हरित संकल्पों को पूरा करने में ई 20 ईंधन एक क्रांतिकारी आधारशिला साबित हो रहा है। एथेनॉल एक नवीकरणीय और स्वच्छ ईंधन है, जिसमें प्राकृतिक रूप से ऑक्सीजन का अंश अधिक होता है। जब इसे पेट्रोल में बीस प्रतिशत की मात्रा में मिलाया जाता है, तो वाहन के इंजन में ईंधन का अधिक पूर्ण दहन होता है।
वैज्ञानिक अध्ययनों और प्रयोगशाला परीक्षणों से यह सिद्ध हुआ है कि ई 20 ईंधन के उपयोग से वाहनों के साइलेंसर से निकलने वाले ज़हरीले कार्बन मोनोऑक्साइड, अनजले हाइड्रोकार्बन और ठोस कणों के उत्सर्जन में भारी गिरावट आती है।
बड़े महानगरों, औद्योगिक गलियारों और सघन आबादी वाले शहरों में वाहनों से होने वाले धुएँ और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में यह नीति अत्यंत सहायक सिद्ध हो रही है। यह पहल भारत के “नेट ज़ीरो” यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन के दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में एक ठोस और परिणामी कदम है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, सुरक्षित और हरित पर्यावरण सुनिश्चित कर रही है।
इतने विशाल स्तर पर नए ईंधन को अपनाने के लिए भारत के ऑटोमोबाइल और ऊर्जा क्षेत्र ने भी अभूतपूर्व औद्योगिक तत्परता और सजगता का परिचय दिया है। सरकार के सुस्पष्ट नीतिगत दिशा-निर्देशों के अनुरूप, भारतीय वाहन निर्माताओं ने रिकॉर्ड समय में अपनी निर्माण प्रणालियों को अद्यतन किया है।
अप्रैल 2023 के बाद से भारत में निर्मित होने वाली सभी नई कारें, दोपहिया और तिपहिया वाहन पूरी तरह से ई 20-अनुकूल सामग्रियों से बनाए जा रहे हैं। इनके इंजनों, ईंधन पाइपलाइनों और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट्स को इस प्रकार डिज़ाइन और ट्यून किया गया है कि वे ई 20 ईंधन से अधिकतम कार्यकुशलता और सुरक्षा प्रदान कर सकें।
इसके अतिरिक्त, भारत अब सौ प्रतिशत एथेनॉल से चलने वाले ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ इंजनों के विकास और व्यावसायिक उत्पादन की ओर भी तेज़ी से कदम बढ़ा रहा है, जो देश को भविष्य में हरित ऑटोमोबाइल विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की क्षमता रखता है।
किसी भी बड़े और ऐतिहासिक सार्वजनिक बदलाव की अंतिम सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश का आम नागरिक उस नीति के दूरगामी लक्ष्यों को कितनी आत्मीयता और विश्वास के साथ स्वीकार करता है। सड़कों पर चल रहे पूर्व निर्मित यानी पुराने वाहनों के संदर्भ में सरकार, तेल विपणन कंपनियाँ और वाहन निर्माता पूरी तरह संवेदनशील, सजग और तत्पर हैं। डिपो और रिफाइनरी स्तर पर आधुनिक स्वचालित प्रणालियों द्वारा सम्मिश्रण का कड़ा और वैज्ञानिक गुणवत्ता नियंत्रण किया जा रहा है ताकि ईंधन में नमी का प्रवेश न हो सके।
देश की शीर्ष अनुसंधान संस्थाएं ऐसे रासायनिक एडिटिव्स और सुलभ तकनीकों पर काम कर रही हैं जो पुराने वाहनों के इंजन पुर्जों को लंबे समय तक सुरक्षित और कार्यक्षम रख सकें। ईंधन आउटलेट्स और पेट्रोल पंपों पर पारदर्शी सूचना पट्टों और स्पष्ट लेबलिंग के माध्यम से उपभोक्ताओं को शिक्षित किया जा रहा है, जिससे आम जनता के मन में ईंधन की गुणवत्ता को लेकर भरोसा और मजबूत हो रहा है।
इसके साथ ही, प्रथम पीढ़ी यानी 1 जी एथेनॉल के सफल क्रियान्वयन के बाद भारत अब एथेनॉल उत्पादन की अगली पीढ़ियों की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। धान की पराली, गन्ने की खोई और कृषि अवशेषों से निर्मित होने वाले द्वितीय पीढ़ी यानी 2 जी एथेनॉल संयंत्रों की स्थापना देश के विभिन्न हिस्सों में की जा रही है।
यह नवाचार दोहरी समस्याओं का एक साथ समाधान कर रहा है— एक तरफ जहाँ किसानों को पराली या कृषि कचरे का आर्थिक मूल्य मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान पराली जलाने से होने वाले भीषण वायु प्रदूषण पर स्थायी रूप से रोक लग रही है। भविष्य में शैवाल और अन्य अपशिष्टों से बनने वाले 3G एथेनॉल तथा ग्रीन हाइड्रोजन जैसी तकनीकों का एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हो रहा है, जो भारत को वैश्विक हरित ऊर्जा क्रांति का अगुवा बना रहा है।
निष्कर्षतः, भारत का हरित ऊर्जा परिवर्तन केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर, सशक्त और विश्व-वंदनीय भारत के निर्माण की दिशा में उठाया गया एक विजयी संकल्प है। ई 20 नीति ने देश को ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी बनाने, विदेशी मुद्रा की बचत करने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई संजीवनी देने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नीले व स्वच्छ आसमान का निर्माण करने का जो मार्ग प्रशस्त किया है, वह वास्तव में अतुलनीय है।
जन-जागरूकता, उद्योग के तकनीकी नवाचार, वैज्ञानिक अनुसंधान और नीतिगत दूरदर्शिता के इस अभूतपूर्व संगम से यह अभियान सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। सरकार के इस महत्वाकांक्षी विज़न के साथ जन-आकांक्षाओं, जन-भागीदारी और जन-सहयोग का यह सकारात्मक तालमेल भारत को एक टिकाऊ, समृद्ध, ऊर्जा-सुरक्षित और आत्मनिर्भर भविष्य की ओर अभूतपूर्व गति से ले जा रहा है।
– डॉ. दीपक कोहली

