ये लेख उन लोगों के लिए ख़ासतौर से है, जो हर सही बात को विपरीत विचारधारा मान लेते हैं और फ़ेसबुक पर ब्लॉक किए जाने के बाद, कभी मोबाइल, तो कभी इंस्टाग्राम पर अपनी भड़ास निकालने पहुँच जाते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक मोहन भागवत ने मुंबई में जेन ज़ी को पिछली पीढ़ियों से अधिक ईमानदार बताया। यदि उनके इस कथन को गंभीरता से पढ़ा जाए, तो भारतीय राजनीति के सामने यहीं एक नया सवाल खड़ा होता है, क्या 2029 का चुनाव विश्वसनीयता और ईमानदारी की भी परीक्षा बनने जा रहा है?

यही एक बात देश की सियासी बहस से बीते कुछ साल से गायब हो चली थी। मुझे ये कहने में कोई दिक्कत नहीं कि हमारी पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा पत्रकारिता में सवाल पूछने की अपनी पुरानी परंपरा से दूर जाता दिखाई दिया। सत्ता कोई भी रही हो, डर और सुविधा दोनों ने पत्रकारिता की रीढ़ पर असर डाला। शुक्रिया, इन सबका क्योंकि अब भारत की राजनीति उनसे ईमानदार पीढ़ी के सामने खड़ी है।
कुछ दिन पहले मैंने ‘ताकि सनद रहे’ की एक कड़ी में लिखा था कि 2029 का लोकसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होगा। वह भारत की सबसे बड़ी युवा आबादी का पहला निर्णायक चुनाव होगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुमान बताते हैं कि तब तक 18 से 32 वर्ष आयु वर्ग देश का सबसे बड़ा वयस्क जनसमूह होगा। इसलिए हर राजनीतिक दल जेन ज़ी तक पहुँचने की कोशिश करेगा। लेकिन, शायद हम सब एक बात भूल रहे हैं।
यहां ध्यान ये रखना होगा कि चुनाव केवल मतदाताओं की संख्या से नहीं बदलते। चुनाव मतदाताओं के स्वभाव से बदलते हैं और भारत की राजनीति में कई बार बड़े बदलाव किसी चुनाव परिणाम से नहीं, बल्कि एक वाक्य से शुरू होते हैं।
मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक मोहन भागवत ने जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा के साथ संवाद करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक ईमानदार है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि युवा अपनी बात कहने के लिए आंदोलन करते हैं, तो उन्हें राष्ट्रविरोधी नहीं माना जाना चाहिए। वे हमारे ही लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं। संवाद सम्मान से होगा, तभी दोनों पक्ष एक-दूसरे को समझ पाएँगे।
पहली नज़र में यह एक सामान्य टिप्पणी लग सकती है। लेकिन, मुझे लगता है कि भारतीय राजनीति के भविष्य को समझने के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण वाक्य है और यही वह जगह है जहाँ डॉ. मोहन भागवत जी की टिप्पणी एक नई बहस शुरू करती है।
उन्होंने जेन ज़ी को सबसे ईमानदार पीढ़ी कहा, यह कोई छोटा विशेषण नहीं है। उन्होंने नई पीढ़ी को सबसे राष्ट्रवादी, सबसे अनुशासित या सबसे प्रतिभाशाली नहीं कहा। उन्होंने कहा कि ये मौजूदा पीढ़ी से बेहतर ईमानदार पीढ़ी है। यहीं से असली सवाल शुरू होता है!
अगर भारत के सबसे प्रभावशाली वैचारिक नेताओं में से एक यह मानते हैं कि जेन ज़ी पिछली पीढ़ियों से अधिक ईमानदार है, तो फिर उस ईमानदारी का अर्थ क्या है? क्या ईमानदारी का अर्थ यह है कि यह पीढ़ी कभी गलती नहीं करती? नहीं।
ईमानदार पीढ़ी का सबसे बड़ा गुण यह नहीं कि वह कभी गलती नहीं करती। उसका सबसे बड़ा गुण यह है कि वह हर सत्ता से एक ही सवाल पूछती है, “क्या आप वही कर रहे हैं जो आप कहते हैं?” यही प्रश्न इस पीढ़ी को अलग बनाता है। जब किसी नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो यह पीढ़ी पहले उसकी पार्टी नहीं देखती। वह पूछती है कि जाँच निष्पक्ष होगी या नहीं।
जब अरबों रुपये खर्च करके बनाए गए किसी नए एक्सप्रेसवे पर उद्घाटन के कुछ समय बाद ही सड़क धँसने, पुल में दरार आने या निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं, तो यह पीढ़ी सरकारी विज्ञापन से पहले अपने मोबाइल का कैमरा खोलती है, मौक़े से इनके वीडियो बनाती है और सोशल मीडिया पेजों पर सवाल तैरने लगते हैं..! यहीं से नागरिक पत्रकारिता (सिटीज़न ज़र्नलिज़्म) की वह ताक़त जन्म लेती है जिसे कोई न्यूज़ रूम नियंत्रित नहीं कर सकता।!
जब ई-20 ईंधन को लेकर वाहन मालिकों, विशेषज्ञों और कंपनियों के बीच अलग-अलग दावे सामने आते हैं, तो यह पीढ़ी प्रेस विज्ञप्ति से संतुष्ट नहीं होती। वह तकनीकी रिपोर्ट पढ़ती है, यूट्यूब पर विशेषज्ञों को सुनती है और अपनी राय बनाती है। ज़रूरी नहीं कि हर बार उसके निष्कर्ष सही हों या कि हर आंदोलन शांतिपूर्ण हो। लेकिन, यह पीढ़ी किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले प्रश्न पूछना अपना अधिकार मानती है।
आपने आख़िरी सवाल सत्ता या सिस्टम से कब पूछा था?
डॉ. मोहन भागवत जी ने यह भी कहा कि आंदोलन करने वाला हर युवा राष्ट्रविरोधी नहीं होता। संवाद का रास्ता सम्मान से होकर जाता है। यह युवाओं की प्रशंसा नहीं है। यह राजनीति के सामने रखी गई एक कसौटी भी है। दिल्ली के छात्र आंदोलन को लेकर बनी तमाम धारणाओं के बीच डॉ. मोहन भागवत जी का यह कथन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने असहमति और राष्ट्रविरोध को एक ही चीज़ मानने से इंकार किया।
युवाओं की बात करने वालों या लिखने वालों को विरोधी और न जाने क्या क्या कहने वाले पीछा भी नहीं छोड़ते। फ़ेसबुक पर ब्लॉक करो, तो इंस्टाग्राम पर आ जाएंगे, वहां किसी दूसरे के कमेंट पर किसी तीसरे का हवाला देकर बात वहीं ले आएंगे कि युवा नाकारा है, इनको बस पब्लिसिटी चाहिए।
ज़रा एक पल ठहरिए। अपने फ़ोन की स्क्रीन बंद कीजिए और ख़ुद से पूछिए, आख़िरी बार आपने सत्ता या सिस्टम से कोई असुविधाजनक सवाल कब पूछा था?
मुझे ये विश्वास हो चला है कि यह पीढ़ी अब घर वालों से ही नहीं बाहर वालों से भी सीधे सवाल पूछेगी कि राष्ट्रवाद केवल नारा है या नागरिकों के प्रति जवाबदेही भी उसका हिस्सा है? और यह प्रश्न केवल भारतीय जनता पार्टी से नहीं पूछे जाएँगे। कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों और संघ से भी पूछे जाएँगे। अख़बारों, न्यूज़ चैनलों, विश्वविद्यालयों और कॉरपोरेट जगत से भी पूछे जाएँगे।
यही कारण है कि मैं बार-बार कहता हूँ, 2029 का चुनाव जाति, धर्म और गठबंधनों से आगे निकलकर विश्वसनीयता का चुनाव भी होगा। जिस पीढ़ी ने दुनिया को इतिहास की किताबों से पहले मोबाइल की स्क्रीन पर पढ़ा है, वह किसी भी संस्था पर विश्वास करने से पहले उसके दावों और उसके आचरण का मिलान करेगी।
संभव है कि वह कभी-कभी गलत निष्कर्ष निकाल दे। लेकिन, उससे भी बड़ा ख़तरा उन लोगों के लिए होगा, जो यह मानकर चल रहे हैं कि पुरानी राजनीतिक भाषा आज भी उतनी ही प्रभावी है। मुझे लगता है कि भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ भाषणों से ज़्यादा व्यवहार का महत्व होगा, नारों से ज़्यादा विश्वसनीयता का और प्रचार से ज़्यादा पारदर्शिता का।
अगर डॉ. मोहन भागवत जी का आकलन सही है कि जेन ज़ी अधिक ईमानदार है, तो 2029 का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि किसकी सरकार बनेगी। सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या भारत की राजनीति उस ईमानदार पीढ़ी के सामने स्वयं उतनी ही ईमानदार होकर खड़ी हो पाई? क्योंकि इतिहास गवाह है, लोकतंत्र केवल मतपत्रों से नहीं बदलते, वे तब बदलते हैं जब नई पीढ़ियाँ सत्ता से प्रश्न पूछना सीख जाती हैं।
मुझे लगता है कि 2029 का चुनाव इस बात का फ़ैसला नहीं करेगा कि भारत पर कौन शासन करेगा। वह इस बात का फ़ैसला करेगा कि भारत की राजनीति को अब सवालों से डरना पड़ेगा या सवालों के साथ चलना सीखना पड़ेगा। क्योंकि इतिहास बताता है कि लोकतंत्र तब परिपक्व होता है, जब नई पीढ़ियाँ सत्ता बदलने से पहले सत्ता से जवाब माँगना शुरू कर देती हैं।
– पंकज शुक्ला
