•आज जब 9 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय मूल निवासी दिवस के नाम पर वैश्विक विमर्श गढ़ा जाता है, तो इसके पीछे छिपे वैचारिक षड्यंत्र और भारत के वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप को आमने-सामने रखकर देखने की अत्यंत आवश्यकता है। पश्चिमी देशों और नई दुनिया यानी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तथा लातीनी अमेरिका के इतिहास को यदि देखा जाए, तो वहाँ जो हुआ वह किसी से छिपा नहीं है।
वहाँ यूरोपीय औपनिवेशिक ताकतों और उनकी एकाधिकारवादी ‘आसमानी किताबों’ पर आधारित मजहबी प्रणालियों ने वहाँ की स्थानीय प्रकृति-पूजक सभ्यताओं का सुनियोजित और क्रूर नरसंहार किया, उनकी भाषाएँ मिटा दीं, उनके बच्चों को उनकी माँओं की गोद से छीनकर संस्थानों में कैदी बनाया और आज दुनिया के बड़े भूभाग को पूरी तरह क्रिश्चियन या अन्य एकल मजहबी बहुल बना दिया।
दुनिया के इन हिस्सों में जिन लोगों ने अपनी प्रकृति-पूजक परंपराओं को छोड़ने से मना कर दिया, उन्हें तलवार, भूख और भय के बल पर या तो समाप्त कर दिया गया या हाशिए पर धकेल दिया गया। इन आक्रांताओं और मिशनरियों ने दुनिया भर की प्राचीन संस्कृतियों को जो अपूरणीय क्षति पहुँचाई, उसके लिए आज तक न तो कोई सच्ची माफी मांगी गई और न ही किसी प्रकार का हर्जाना दिया गया। लेकिन विडंबना यह है कि उसी पश्चिमी और औपनिवेशिक सांचे में ढले “मूल निवासी” के एजेंडे को आज भारत जैसे महान देश पर भी जबरन थोपने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है, जो भारत के मूल चरित्र और उसकी हजारों साल पुरानी सभ्यतागत निरंतरता के साथ सीधा छल है।

भारत की स्थिति दुनिया के किसी भी पश्चिमी देश से बुनियादी तौर पर अलग है और इस सच्चाई को धुंधला करना देश की अखंडता के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा। भारत कभी भी किसी बाहरी औपनिवेशिक शक्ति द्वारा बसाई गई या जीती गई भूमि नहीं रहा, बल्कि यह एक निरंतर, जीवंत और सनातन सभ्यता का आदिकाल से केंद्र रहा है।
यहाँ कभी भी ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता जहाँ नस्ल के नाम पर, भाषा के नाम पर या मूल निवासियों को खत्म करने के लिए कोई हिंसक युद्ध लड़ा गया हो। इसके विपरीत, भारत की मूल चेतना हमेशा से “वसुधैव कुटुंबकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के शाश्वत मंत्र पर टिकी रही है, जहाँ पूरी दुनिया को एक परिवार माना गया है।
यहाँ की संस्कृति मूलतः प्रकृति-पूजक रही है, जहाँ पहाड़ों, नदियों, वृक्षों, सूर्य, चंद्रमा और पशु-पक्षियों को भगवान का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ वे वनों में रहने वाले समाज के बीच पूरी आत्मीयता से रहे, निषादराज से गले मिले, केवट को प्रेम दिया और शबरी के जूठे बैर खाकर यह साबित कर दिया कि भारतीय समाज में नगर और वन, या तथाकथित उच्च और निम्न के बीच कोई कृत्रिम दीवार कभी नहीं रही। यहाँ सब एक ही साझी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धारा के अटूट हिस्से हैं।
किंतु आज एक सुनियोजित एजेंडे के तहत ‘आइडेंटिटी पॉलिटिक्स’, ‘क्रिटिकल कास्ट थ्योरी’ और तथाकथित ‘मूल निवासी दिवस’ के नाम पर भारत के सनातन वैदिक धर्म के विरुद्ध घृणा की आग फैलाई जा रही है। एक झूठा नैरेटिव गढ़ा जाता है कि भारत के आदिवासी या जनजाति समाज के लोग हिंदू नहीं हैं और उन्हें मुख्य समाज से अलग करने के लिए वर्ग संघर्ष पैदा किया जाता है। यह सब कुछ उसी औपनिवेशिक मानसिकता का विस्तार है जो भारत को अंदर से तोड़ना चाहती है।
अंग्रेजों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा गढ़ा गया वह बदनाम “आर्य आक्रमण सिद्धांत” इसका सबसे बड़ा हथियार रहा है, जिसके जरिए यह झूठ फैलाया गया कि भारत के सवर्ण बाहर से आए आक्रांता हैं और यहाँ के मूल निवासी कोई और हैं।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्रास?’ में ही इस नस्लवादी और झूठे सिद्धांत को अपनी गहरी विद्वत्ता के आधार पर सिरे से नकार दिया था और यह स्पष्ट किया था कि वेदों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों ने किसी मूल निवासी आबादी पर आक्रमण किया हो।
आधुनिक विज्ञान और डीएनए शोध, जैसे राखीगढ़ी के कंकालों का ऐतिहासिक विश्लेषण, ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि हड़प्पा सभ्यता और भारतीय जनमानस की जड़ें इसी मिट्टी में रची-बसी हैं, न कि किसी बाहरी स्टेप-पशुपालकों के आक्रमण से। इसके बावजूद, आज भी केवल राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए उसी झूठे आर्य आक्रमण के सिद्धांत को पुनर्जीवित किया जाता है और मूल निवासी दिवस के नाम पर सवर्णों और जनजातियों के बीच नफरत की खाई खोदी जाती है।
वास्तविकता यह है कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति चाहे वह ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, वैश्य हो, शूद्र हो या किसी भी जनजाति से ताल्लुक रखता हो, इस महान भूमि का समान रूप से मूल निवासी है।
भारत के संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए “आदिवासी” की जगह “अनुसूचित जनजाति” शब्द को अपनाया था, ताकि इतिहास के कुछ भौगोलिक या आर्थिक कारणों से जो भाई विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं, उन्हें विशेष सुरक्षा, सम्मान और आरक्षण का अधिकार मिल सके। लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि जनजाति समाज और हिंदू समाज अलग-अलग हैं।
भारत के वनों और गाँवों में रहने वाले वनवासी और जनजाति समाज के लोग सांस्कृतिक रूप से उसी सनातन परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं, जो प्रकृति की पूजा करती है, पेड़ों में देवत्व देखती है और नदियों को माँ मानती है। यह वही प्रकृति-पूजक सनातन धर्म है जिसे दुनिया भर में आक्रांताओं ने मिटाने की कोशिश की, लेकिन भारत की धरती ने इसे अपनी रग-रग में बचाकर रखा।
पूर्वोत्तर राज्यों या देश के अन्य हिस्सों में जो जनसांख्यिकीय बदलाव लाए गए और भोले-भाले जनजाति समाज के लोगों को प्रलोभन या भय के बल पर क्रिश्चियन या अन्य मतों में परिवर्तित किया गया, वह उसी अंतरराष्ट्रीय मिशनरी षड्यंत्र का हिस्सा है जो भारत की सांस्कृतिक विविधता को निगल जाना चाहता है।
आज मूल निवासी दिवस के नाम पर जो लोग यह प्रोपोगंडा चलाते हैं, वे असल में उसी विदेशी ताकतों के वैचारिक मोहरे हैं जिन्होंने दुनिया भर की मूल संस्कृतियों का कत्लेआम किया है। भारत का सेक्युलरिज्म किसी एक मजहब के तुष्टीकरण या अपनी ही संस्कृति को गाली देने पर आधारित नहीं है, बल्कि यह “सर्वधर्म समभाव” और सबको एक परिवार मानने वाले उस उदार दर्शन पर टिका है जो विश्व कल्याण की बात करता है।
अब समय आ गया है कि हम पश्चिमी चश्मे से अपने इतिहास को देखना बंद करें, मूल निवासी दिवस के नाम पर फैलाए जा रहे इस वैचारिक छल और वर्ग संघर्ष के षड्यंत्र को समझें और अपनी साझी संस्कृति, सनातन मूल्यों तथा अटूट राष्ट्रीय एकता को बचाने के लिए पूरी दृढ़ता से खड़े हों।
मानव सभ्यता के इतिहास का पन्ना-पन्ना इस बात की गवाही देता है कि किस प्रकार एकाधिकारवादी विचारों, आसमानी किताबों पर आधारित मजहबों और कम्युनिस्ट विचारधारा ने दुनिया भर की प्राचीन, प्रकृति-पूजक और उन्नत सभ्यताओं को रक्त से सींचकर मिटा दिया। जब हम दुनिया के इतिहास को देखते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि यूरोप से लेकर अमेरिका, एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक, जहाँ-जहाँ भी इन हिंसक मजहबों और राजनीतिक दर्शनों के पाँव पड़े, वहाँ मूल निवासियों और उनकी प्रकृति-पूजक संस्कृतियों का क्रूरता से नरसंहार किया गया।
प्राचीन यूरोप में भी जब रोमन साम्राज्य के भीतर और बाहर प्रकृति-पूजक बहुदेववादी परंपराएँ थीं, तो ईसाई मज़हब के प्रसार के साथ उन्हें जड़ से उखाड़ फेंका गया। रोम की प्राचीन बहुदेववादी संस्कृति, यूनान के प्रकृति-पूजक दर्शन और यूरोप के विभिन्न कबीलों (जैसे सैक्सन और वाइकिंग्स) की प्राचीन परंपराओं को तलवार के बल पर कुचला गया।
782 ईस्वी में फ्रेंकिश राजा शारलेमेन ने ‘वर्डेन के नरसंहार’ (Massacre of Verden) में केवल एक ही दिन में 4,500 सैक्सन कैदियों का सिर इसलिए कटवा दिया क्योंकि उन्होंने ईसाई मज़हब अपनाने से इनकार कर दिया था। यूरोप के प्राचीन मंदिरों को तोड़ा गया, उनकी पवित्र मूर्तियों को खंडित किया गया और प्रकृति की पूजा करने वाले उन समाजों को या तो नष्ट कर दिया गया या बलपूर्वक अपने पाले में मिला लिया गया।
यही खूनी इतिहास वैश्विक स्तर पर उपनिवेशवाद के नाम पर दोहराया गया। 12 अक्टूबर 1492 को जब क्रिस्टोफर कोलंबस कैरेबियन के तट पर पहुँचा, तो वहाँ ‘ताइनो’ जैसी शांतिप्रिय सभ्यता रहती थी।
इतिहासकार डेविड ई. स्टैनार्ड की पुस्तक ‘अमेरिकन होलोकॉस्ट’ के अनुसार, यूरोपीय आक्रांताओं और ईसाई मज़हब के पैरोकारों ने कुछ ही दशकों में ताइनो, माया, एज़्टेक और इंका जैसी महान सभ्यताओं के करोड़ों मूल निवासियों को चेचक जैसी महामारियों, जबरन श्रम और तलवार के बल पर मौत के घाट उतार दिया।
उत्तर अमेरिका में चेरोकी और सिओक्स जैसी जातियों को उनकी ही भूमि से खदेड़ दिया गया, जिसे 1838-39 के ‘ट्रेल ऑफ टीयर्स’ के रूप में आज भी याद किया जाता है। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और ईसाई मिशनरियों ने ‘टेरा नुलिस’ का सिद्धांत देकर मूल निवासी एबोरिजिनल समुदायों के नरसंहार किए और ‘स्टोलन पीढ़ियों’ के तहत उनके बच्चों को उनकी माँओं की गोद से छीनकर उनकी संस्कृति और भाषा को हमेशा के लिए मिटाने का कुत्सित प्रयास किया।
अफ्रीका महाद्वीप पर भी जर्मनी, बेल्जियम, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे औपनिवेशिक देशों ने हेरेरो और नामा समुदायों के खिलाफ बर्बर अभियान चलाए, जहाँ रेगिस्तान में पानी के स्रोत बंद करके और कॉन्संट्रेशन कैंपों में रखकर लाखों मूल निवासियों को मार डाला गया। कांगो में बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय के शासनकाल (1885-1908) में रबर का कोटा पूरा न करने पर मूल निवासियों के हाथ-पैर काट दिए जाते थे, जिससे कांगो की आधी आबादी यानी लगभग एक करोड़ लोग समाप्त हो गए।
यह रक्तरंजित सिलसिला केवल पश्चिमी दुनिया तक सीमित नहीं था, बल्कि एशिया, विशेषकर भारत में इसका सबसे भीषण और लंबा रूप देखने को मिला। भारत में इस्लामिक आक्रमण कालखंड के दौरान मंदिरों को तोड़ा गया, विश्वविद्यालयों को जलाया गया और सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले समाज पर भारी अत्याचार किए गए।
इतिहासकार के.एस. लाल जैसे विद्वानों के शोध और ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, मध्यकालीन इस्लामिक आक्रमणों और सल्तनत-मुगल काल के दौरान भारत में लगभग 10 करोड़ हिंदुओं और मूल निवासियों को मौत के घाट उतारा गया। इसके बाद ब्रिटिश, पुर्तगाली और फ्रांसीसी औपनिवेशिक ताकतों ने भारत पर जो हमले किए, उनमें लूटपाट, सुनियोजित महामारियाँ और मानव-निर्मित भुखमरी (जैसे बंगाल का अकाल) के कारण 4 से 5 करोड़ लोग और मारे गए। इस प्रकार, अकेले भारत की धरती पर पिछले एक हजार वर्षों के विदेशी हमलों में लगभग 15 करोड़ लोग मारे गए।
यही नहीं, ब्रिटिश शासनकाल के दौरान भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति लूटकर ब्रिटेन ले जाई गई, जिससे यहाँ की अर्थव्यवस्था को रीढ़विहीन कर दिया गया। भारत में पुर्तगालियों द्वारा ‘गोवा इनक्विजिशन’ के माध्यम से सनातन संस्कृति को कुचलने और बलपूर्वक लोगों के मजहब बदलने के जो कारनामे किए गए, वे भी इसी अमानवीयता के जीवंत उदाहरण हैं।
इस विनाश लीला में बीसवीं शताब्दी में कम्युनिस्ट विचारधारा का आगमन एक और बड़े अभिशाप के रूप में हुआ। सोवियत संघ, चीन और कंबोडिया जैसे देशों में कम्युनिज्म ने मूल निवासी संस्कृतियों, प्राचीन धर्मों और पारंपरिक जीवन-मूल्यों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।
चीन में माओ त्से-तुंग के शासनकाल में ‘सांस्कृतिक क्रांति’ (Cultural Revolution) के दौरान तिब्बत की प्राचीन बौद्ध संस्कृति, मंगोलिया की मूल परंपराओं और चीन के अपने पारंपरिक दर्शन को कुचल दिया गया। हजारों मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया, भिक्षुओं और पारंपरिक पुरोहितों को यातनाएँ दी गईं और लाखों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
कंबोडिया में पोल पोट के नेतृत्व वाले खमेर रूज शासन (1975-1979) के दौरान देश की प्राचीन संस्कृति, बौद्ध परंपराओं और शिक्षित वर्ग को पूरी तरह से मिटाने के अभियान में लगभग 15 से 20 लाख लोग (कुल आबादी का एक चौथाई हिस्सा) मार डाले गए। कम्युनिस्ट ताकतों ने स्पष्ट कर दिया कि जो भी उनके वैचारिक और राजनीतिक दर्शन को नहीं मानेगा, उसे इस दुनिया से मिटा दिया जाएगा।
स्पष्ट है कि न्यूजीलैंड से लेकर अफ्रीका, यूरोप, उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और एशिया तक- दुनिया के हर कोने में आसमानी किताबों पर आधारित
मजहबों और कम्युनिस्ट ताकतों ने अपनी विचारधारा को न मानने वाले मूल निवासियों और उनकी प्रकृति-पूजक सभ्यताओं के खून से धरती को लाल कर दिया। उन्होंने सभ्य बनाने और मुख्यधारा में लाने के नाम पर करोड़ों बेकसूर इंसानों का नरसंहार किया और रक्त की नदियाँ बहा दीं।
इसके विपरीत, सनातन वैदिक हिन्दू धर्म ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि हमेशा “वसुधैव कुटुंबकम” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश देते हुए पूरी प्रकृति, जीव-जंतुओं और समूची मानवता को एक ही परिवार का हिस्सा माना। आज जब मूल निवासी दिवस के नाम पर वही लोग और उनके वैचारिक नुमाइंदे भारत को कटघरे में खड़ा करते हैं, जिनके पूर्वजों या वैचारिक आकाओं ने दुनिया भर में नरसंहार की नदियाँ बहाईं, तो यह इतिहास के साथ सबसे बड़ा छल और ऐतिहासिक सत्य का अपमान बन जाता है।
– दीपक कुमार द्विवेदी

