‘जागृति’ (1952) फिल्म का एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। उसकी पहली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं

‘पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के
मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के
सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के।’
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। कवि प्रदीप के शब्दों में कहें तो ‘सदियों के बाद फिर उड़े बादल गुलाल के।’ इसका अर्थ यह है कि अंग्रेजों के भारत आने से पहले भी हम सैकड़ों वर्षों तक परतंत्रता की स्थिति में रहे। सैकड़ों वर्षों के बाद हमें राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई। 26 नवंबर 1949 को हमारी संविधान सभा ने संविधान को स्वीकार किया और 26 जनवरी 1950 से संविधान का कार्यान्वयन शुरू हुआ।
संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना भाषण दिया। इस भाषण में उन्होंने कहा था, “इस देश ने पहले भी कई बार अपनी स्वतंत्रता खोई है। आपसी फूट और विश्वासघात के कारण हमने स्वतंत्रता गंवाई। यदि राजनीतिक दल देशहित से अधिक अपनी पार्टी की विचारधारा को महत्व देने लगें, तो देश की स्वतंत्रता फिर से खतरे में पड़ सकती है और इस बार वह हमेशा के लिए चली जाए, ऐसी मुझे आशंका है।” बाबासाहेब की यह चिंता देशहित के प्रति उनकी गहरी भावना से उत्पन्न हुई थी।


कवि प्रदीप के शब्दों में कहें तो ‘सदियों के बाद’ हमें स्वतंत्रता मिली है। अब इस स्वतंत्रता को सार्थक करना हमारा दायित्व है। स्वतंत्रता का आनंद लेने वाली यह चौथी पीढ़ी है। पिछली तीन पीढ़ियों ने देश के औद्योगिक विकास में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारतीय किसानों ने हरित क्रांति के माध्यम से देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। ऊर्जा के क्षेत्र में भी हमने परमाणु ऊर्जा से लेकर सौर ऊर्जा तक लंबी यात्रा तय की है। सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर युग, डिजिटल युग और अब एआई के युग को हमारी पीढ़ी ने तेजी से अपनाया है।
देश रक्षा के क्षेत्र में भी सक्षम हुआ है। हम परमाणु बम बना सकते हैं और उन्हें लक्ष्य तक पहुंचाने वाली मिसाइलें भी विकसित कर चुके हैं। अंतरिक्ष में हमारे उपग्रह कार्यरत हैं। अत्याधुनिक युद्धपोत और पनडुब्बियां बनाने की तकनीक हमारे पास है। हमारी तीनों सेनाएं अत्यंत सक्षम हैं। हमारी खुफिया एजेंसियां भी सक्षम और सक्रिय हैं। वैश्विक स्तर पर भारत एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। तकनीक और आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में सरकार अपनी क्षमता के अनुसार निरंतर काम कर रही है।

पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक हमारे शासनकर्ताओं की यह यात्रा रही है। देश के विकास और समृद्धि में इन सभी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसलिए 15 अगस्त के दिन राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर हमें इन सभी का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करना चाहिए।
प्राप्त स्वतंत्रता को सार्थक करने की तीन पूर्वशर्तें हैं—
1) सामाजिक समरसता
2) आर्थिक समानता
3) संवैधानिक मूल्यों का कठोरता से पालन।
इन पूर्वशर्तों को पूरा करने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है, बल्कि पूरे समाज की है। समाज के सदस्य के रूप में इस दिशा में हम सभी की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है।
सामाजिक समरसता
सामाजिक समरसता का अर्थ है कि किसी भी प्रकार का जातिभेद न रखा जाए और सभी के साथ समानता का व्यवहार किया जाए। अस्पृश्यता का किसी भी रूप में पालन न हो। प्रत्येक व्यक्ति के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाए। किसी व्यक्ति का दर्जा उसके काम के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए। कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। सफाई का काम प्रयोगशाला में काम करने वाले वैज्ञानिक के काम से किसी भी दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस प्रकार की मानसिकता समाज के प्रत्येक व्यक्ति में होनी चाहिए।

हमारा संविधान हमें बंधुता का आचरण करने की प्रेरणा देता है। बंधुता का अर्थ है कि हम सभी एक ही चेतना के विभिन्न रूप हैं। जो पिंड में है, वही ब्रह्मांड में है। सृष्टिकर्ता किसी के साथ भेदभाव नहीं करता। प्रत्येक जीव को अपनी प्रकृति और अपनी पद्धति के अनुसार जीवन जीने का अधिकार है और हमें उसका सम्मान करना चाहिए।
बंधुता की भावना का दूसरा नाम राष्ट्रीय भावना है। ‘हम सभी एक हैं, एकात्म हैं और एकरस हैं’— यह भावना ही किसी समाज को राष्ट्र बनाती है।
इस प्रकार भावनात्मक एकता से जुड़ा हुआ राष्ट्र सैकड़ों परमाणु बमों की शक्ति पैदा कर सकता है और फिर उसे पराजित करना अत्यंत कठिन हो जाता है। ब्रिटेन, जापान, जर्मनी और रूस इसके बड़े उदाहरण हैं। इसलिए हमें अपने संविधान में दिए गए बंधुता के सिद्धांत को अपने जीवन में उतारना चाहिए।
आर्थिक समानता
स्वतंत्रता को सार्थक करने की दूसरी पूर्वशर्त आर्थिक समानता है। आर्थिक समानता का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति इतनी आय अर्जित कर सके कि वह सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सके। यह कार्य केवल सरकार का नहीं है। इसमें उद्यमियों, व्यापारियों, सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों और सामाजिक संस्थाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

केवल सरकार इस कार्य को पूरा नहीं कर सकती। प्रत्येक उद्यमी की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपने कर्मचारियों को इतना वेतन दे, जिससे वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। व्यापारी को केवल अधिक से अधिक धन कमाने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए, बल्कि उसके साथ काम करने वाले लोगों के सर्वांगीण हित का भी ध्यान रखना चाहिए।
सेवाभावी संस्थाओं को भी यह विचार करना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को किस प्रकार सक्षम बनाया जा सकता है। महाराष्ट्र में इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। भालिवली स्थित सेवा विवेक केंद्र वनवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के कार्य में लगा हुआ है।

छत्रपति संभाजीनगर का सावित्रीबाई फुले प्रकल्प भी इसी दिशा में कार्य कर रहा है। पोपटराव पवार और अण्णा हजारे जैसे अनेक लोग अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी क्षमता के अनुसार यही कार्य कर रहे हैं। ऐसे प्रयासों की संख्या और अधिक बढ़नी चाहिए।
संवैधानिक नैतिकता का पालन
स्वतंत्रता को सार्थक करने के लिए हमें संवैधानिक नैतिकता का भी कठोरता से पालन करना चाहिए। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है—
1. कानून का पालन करना।
2. संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करना।
3. नागरिक कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना।
4. हिंसक मार्ग का त्याग करना।
5. शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना या आन्दोलन करना।
6. सत्याग्रह, बंद आदि के नाम पर अराजकता फैलाने वाले मार्गों से दूर रहना।
संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि अब यदि कुछ गलत होता है, तो उसकी जिम्मेदारी हमारी ही होगी। इसलिए हमें व्यक्तिपूजा का त्याग करना चाहिए। जातियां राष्ट्र के लिए विघटनकारी हैं, इसलिए हमें उनसे ऊपर उठना चाहिए। धरने, हिंसक आंदोलन और अन्य अराजक तरीके लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं हैं; इनका त्याग किया जाना चाहिए।
समाज में संवैधानिक नैतिकता को विकसित करना आवश्यक है। इसमें राजनीतिक नेताओं की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं या असंवैधानिक मार्ग अपनाते हैं, इसकी समीक्षा हमें स्वयं करनी चाहिए। किसी भी नेता के पीछे आंखें बंद करके चलने की प्रवृत्ति हमें छोड़नी चाहिए।
कवि प्रदीप के गीत से हमने इस लेख की शुरुआत की है। उसी गीत की कुछ पंक्तियां आज की जेन-ज़ी पीढ़ी के लिए विशेष रूप से समझने योग्य हैं—
‘दुनिया के दांव-पेंच से रखना न वास्ता
मंजिल तुम्हारी दूर है, लंबा है रास्ता
भटका न दे कोई तुम्हें धोखे में डाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के…’
स्वतंत्रता को सार्थक करने के लिए आज की पीढ़ी को अपने पूर्वजों से प्राप्त इस विरासत को अपने कंधों पर उठाकर जागरूक होना होगा। देश की स्वतंत्रता, एकता और समृद्धि की रक्षा करने का संकल्प लेना होगा।
और इसी भावना के साथ
‘उठो, छलांग मार के आकाश को छू लो,
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के।’
– रमेश पतंगे
