परिव्राजक अवस्था में पूरे भारत का परिभ्रमण करने के बाद स्वामी विवेकानंद कन्याकुमारी में माँ कन्याकुमारी की तपस्या से पावन उनके पदचिह्न से मंडित श्रीपाद शिला पर तीन दिन-तीन रात ध्यानस्थ रहे। जैसे माता पार्वती को कन्याकुमारी अवतार में अपने जीवन का लक्ष्य उस शिला पर प्राप्त हुआ, उसी प्रकार स्वामीजी को भी आगामी जीवन की कार्ययोजना उसी स्थान पर स्पष्ट हुई।

स्वामीजी की जन्मशताब्दी की पूर्वतैयारी के समय शिला पर स्वामीजी की मूर्ति बनाने का संकल्प स्थानीय प्रबुद्धजनों के मन में आया। शीघ्र ही यह विषय विवादित हो गया। स्थानीय मछुआरों में से कुछ ईसाई मिशनरियों ने प्रखर विरोध प्रारंभ किया। कुछ उत्पाती समाजद्रोहियों ने शिला को सैंट थॉमस के साथ जोड़कर वहाँ क्रॉस लगाने का प्रयास किया। ऐसे समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह रहे एकनाथ रानडे जी को इस कार्य का दायित्व दिया गया।
एकनाथ जी का स्वभाव ही समन्वय का था। मध्य भारत में प्रचारक का कार्य करते हुए भी उनका संपर्क समाज के सभी वर्गों से था। जबलपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन के समय जब कोई प्रवासी अधिकारी कार्यालय पहुँचे तो पता चला एकनाथ जी अधिवेशन स्थल पर ही संपर्क कर रहे हैं। कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में पूर्व क्षेत्र का कार्य करते समय उनका घनिष्ठ परिचय एक ओर जहाँ रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों से था, वैसे ही ज्योति बसु सहित अनेक वामपंथी नेताओं से भी था। आसाम में भी समाज के सभी वर्गों सहित स्वयं को विरोधी कहलानेवाले प्रभावी लोगों के साथ सहज संबंध, संवाद और सहयोग करने का अनुभव एकनाथ जी के पास था।
संघ पर प्रथम प्रतिबंध के समय संविधान निर्माण की प्रक्रिया में प. पू. गुरुजी, चेन्नई के विधिवेत्ता और केंद्र सरकार (मुख्यतः गृह मंत्री सरदार पटेल) से सतत संपर्क का काम भी एकनाथ जी ने सहजता से किया। एकनाथ जी के संग सरदार पटेल से कुछ अवसर पर मिलने गए कार्यकर्ता सुजीत धर ने एक घटना का वर्णन लिखा है।
गृह मंत्री एकनाथ जी से इतने प्रभावित थे कि अपने सहयोगी से कहते सुने गए- लोग मुझे लौह पुरुष कहते हैं, पर ये तो साक्षात फ़ौलाद हैं। वैचारिक मतभेद होने पर भी अपने व्यवहार से सबको अपना बनाना एकनाथ जी की विशेषता थी। विचारों के स्तर पर कोई भी समझौता किए बिना सहमति बनाने की कुशलता को ही सरदार पटेल इस्पात मान रहे हैं।
शिलास्मारक के निर्माण की पूरी गाथा ही एकनाथ जी के समन्वय कौशल की कथा है। शिला पर किसी भी निर्माण की अनुमति में सबसे पहली बाधा थे तत्कालीन केंद्रीय संस्कृति मंत्री हुमायूँ कबीर। उनका निर्वाचन क्षेत्र कोलकाता में था। एकनाथ जी ने वहाँ प्रेस वार्ता द्वारा वातावरण बनाया कि बंगाल के सपूत विवेकानंद का स्मारक तमिलनाडु के कन्याकुमारी में बन रहा है और अनुमति की कुंजी है आपके सांसद के हाथ। इस प्रश्न के समाधान में एकनाथ जी दोष देने के स्थान पर ज़िम्मेवारी का दबाव डालने की रणनीति अपनाते हैं। इस समाचार के पर्याप्त प्रसारण के बाद वे संस्कृति मंत्री से मिलते हैं। अब उनकी कोई आपत्ति नहीं है।

केवल प्रधानमंत्री नेहरू की सहमति अनिवार्य है। नागपुर के सांसद बापूजी अणे के साथ लाल बहादुर शास्त्री के माध्यम से नेहरू जी तक पहुँचने का नियोजन हुआ। शास्त्री जी ने कहा कुछ सांसदों का ज्ञापन हो तो लोकतांत्रिक दबाव प्रधानमंत्री को विवश करेगा। उनके मन में था 10-20 सांसदों के हस्ताक्षर ले लिए जाए। एकनाथ जी ने ज्ञापन बनाकर संसद के परिसर में सभी दलों के प्रभावी नेताओं से भेंट की। उनका संवाद कौशल ही था कि विभिन्न विपरीत विचारधाराओं के 323 सांसदों ने कन्याकुमारी में स्वामीजी के स्मारक हेतु ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।
उस समय जनसंघ के तो 4 ही सांसद थे। कांग्रेस, स्वतंत्र दल, समाजवादी के साथ हो साम्यवादी दलों के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किए। ऐसा बहु राजनैतिक एकमत युद्ध के सिवा किसी एक विषय पर विरला ही है।
एकनाथ जी का जनसंपर्क और निर्मल संवाद ही इस चमत्कार के मूल में है। कन्याकुमारी के विवेकानंदपुरम् स्थित गंगोत्री प्रदर्शनी में यह ज्ञापन सभी हस्ताक्षरों के साथ देखा जा सकता है। शास्त्री जी ने हस्ताक्षरों को कई बार ध्यान से परखा और उनकी सत्यता को देख अचंभित हो गए। उन्होंने कहा अब नेहरू को मनाना मेरा काम है। इतने सांसदों का अनुमोदन देखकर प्रधानमंत्री ने लोकसभा में ही घोषणा कर दी कि कन्याकुमारी की विवेकानंद शिला पर स्वामीजी का भव्य स्मारक बनाया जाएगा। इस सहमति में लोकतंत्र के आधार संख्याबल का प्रभाव काम आया।
तमिलनाडु में पूर्व में धर्मादा मंत्री रहते हुए शिला पर किसी भी प्रकार के निर्माण का प्रगट घोर विरोध कर चुके भक्तवत्सलम जी अब मुख्यमंत्री बन चुके थे। एकनाथ जी ने उनसे कई बार भेंट की। स्पष्ट नकार से धीरे-धीरे उन्हें स्मारक के पक्ष में ले आए। 15 फीट लंबे और उतने ही चौड़े मंदिर में छोटी सी मूर्ति के लिए मुख्यमंत्री सहमत हुए। एकनाथ जी ने संवाद को खुला रखते हुए कहा कि मंदिर का आकार, स्थापत्य आदि तो विशेषज्ञों के विषय हैं। मैं अब आपकी स्मारक हेतु अनुमति मानते हुए आपके नेतृत्व में ही इस कार्य को आगे बढ़ाता हूँ। कुछ कल्पनाचित्र (Design) बनाकर फिर आपसे मिलता हूँ। आप जिसे अंतिम करेंगे उसी के अनुसार निर्माण होगा। अनेक ख्यातनाम स्थापत्यविदों से रेखाचित्र बनवाये गये। रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष महाराज स्वामी माधवानंद और सरसंघचालक श्री गुरुजी द्वारा अनुमोदित चित्र पर भक्तवत्सलम के गुरु कांची परमाचार्य चन्द्रशेखरानंद सरस्वती जी का हस्ताक्षर प्राप्त किया।
तीन चित्र मुख्यमंत्री के सम्मुख रखे जिसमें से एक 125 वर्ग फीट का भी था जिस पर अनुमति प्राप्त करनी थी। उसे अंत में दिखाते हुए परमाचार्य के अनुमोदन का विषय सहज उच्चरित किया। अपने गुरु के हस्ताक्षर से अभिभूत भक्तवत्सलम ने उसी मानचित्र को अंतिम कर दिया। एकनाथ जी ने धीरे से कहा, पर यह तो आपके द्वारा गत बैठक में दी मर्यादा 15×15 से कई गुना बड़ा है। मुख्यमंत्री को कहना पड़ा कि कोई बात नहीं, यही बनेगा। यहाँ आध्यात्मिक प्रभाव का सदुपयोग अंतःस्थल से मित्रता द्वारा सहमति के लिए किया गया। भक्तवत्सलम द्वारा एकनाथ जी को दी श्रद्धांजलि में भी विचार भिन्नता के होते हुए मित्रता का उल्लेख मिलता है।
शिलास्मारक के निर्माण हेतु एक रुपये के कूपन द्वारा 35 लाख परिवारों से 84 लाख रुपये का एकत्रीकरण पूरे राष्ट्र के भावात्मक सहभाग का अनुपम उदाहरण है। सभी राज्य सरकारों द्वारा योगदान प्राप्त किया गया। ज्योति बसु की पत्नी श्रीमती कमला बसु विवेकानंद शिलास्मारक निधि संकलन समिति बंगाल की संरक्षक बनी। घोर साम्यवादी और संघ के प्रखर विरोधी नंबूद्रीपाद केरल के मुख्यमंत्री थे। उन्हें स्वामीजी की ‘दरिद्र देवो भव’ का संदेश देती पुस्तकें पढ़वाकर सहमत किया। नागालैंड और जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश के योगदान से शिलास्मारक का निर्माण हुआ है।
शत्रुता की सीमा तक कटुतापूर्ण विरोध के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में विवेकानंद शिलास्मारक समन्वय का अभूतपूर्व उदाहरण है। इस स्मारक के निर्माता थे समन्वय ऋषि एकनाथ रानडे।
– मुकुल कानिटकर

