अभी इसी माह 22 अगस्त को पुणे, महाराष्ट्र में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी द्वारा जनरेशन-जेड की छात्राओं और युवतियों के बीच जिस आक्रामक शैली में “पितृसत्ता को ध्वस्त करने” और महिलाओं को “किसी की संपत्ति न होने” का आह्वान किया, वह पहली नजर में महिलाओं के अधिकारों के प्रति एक प्रगतिशील झुकाव लगता है, परंतु, यदि इस भाषण की वैचारिक परतों, प्रयुक्त शब्दावलियों और इसके पीछे छिपे आर्थिक-सांस्कृतिक दर्शन का गहनता से अध्ययन किया जाए, तो इसमें एक गहरा अंतर्विरोध और खतरनाक प्रतिमान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिसका उद्देश्य भारत की समाज व्यवस्था को तोड़ना है।

इसे लेकर आप यह भी कह सकते हैं कि राहुल गांधी का यह भाषण वास्तव में भारत की गौरवशाली और सुरक्षात्मक परिवार व्यवस्था पर पाश्चात्य ‘हाइपर-इंडिविजुअलिज्म’ (अति-व्यक्तिवाद) और ‘बाजारवादी नारीवाद’ को थोपने का एक सुनियोजित प्रयास है। यह विचारधारा स्त्री को उसकी सांस्कृतिक जड़ों, पारिवारिक बंधनों और सामूहिक मर्यादाओं से पूरी तरह काटकर उसे बाजार के लिए एक स्वतंत्र, अकेली और असुरक्षित आर्थिक इकाई में तब्दील करना चाहती है। इसलिए वे भारतीय परिवारों के परस्पर पूरकता के सिद्धांत को ‘शोषक व्यवस्था’ बता रहे हैं।
पुणे में राहुल गांधी ने छात्राओं से कहा कि वे समाज द्वारा तय किए गए बंधनों के खिलाफ “मुखर और निडर” बनें। इस बयान की अंतर्निहित भावना सीधे तौर पर पश्चिमी ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ से प्रेरित है। पारंपरिक मार्क्सवादी दर्शन जहाँ समाज को अमीर और गरीब के आर्थिक संघर्ष में बांटता था, वहीं ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ इसी वर्ग-संघर्ष को परिवार के भीतर पति-पत्नी, पिता-पुत्री और भाई-बहन के पवित्र संबंधों पर लागू कर देता है।
राहुल गांधी ने अपने भाषण में इसी सिद्धांत को हवा दी है, जहाँ उन्होंने परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा दिए जाने वाले पारंपरिक स्नेह और ‘संरक्षण’ को एक ‘दमनकारी सत्ता’ या ‘अधीनता’ के रूप में चित्रित किया। जबकि भारतीय दर्शन के अनुसार, परिवार एक ऐसी जैविक इकाई है जहाँ पुरुष और महिला एक-दूसरे के ‘पूरक’ हैं। पुणे का भाषण इस पूरकता के सिद्धांत पर आघात करता है और युवतियों के मन में यह धारणा पैदा करने की कोशिश करता है कि उनके अपने माता-पिता या परिवार द्वारा लगाई गई नैतिक मर्यादाएं उनके विकास में बाधा हैं। यह सोच अंततः परिवार के भीतर अविश्वास और विखंडन का बीज बोती है।
वस्तुत: जब पाश्चात्य ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ के चश्मे से परिवार के स्नेहपूर्ण संरक्षण और नैतिक सीमाओं को ‘बंधक’ या ‘शोषण’ मान लिया जाता है, तो परिवार के भीतर अविश्वास जन्म लेता है। स्वतंत्रता की इस अति-आक्रामक परिभाषा से प्रेरित होकर युवतियां अनजाने में अपने ही माता-पिता, पति या पारिवारिक मूल्यों से विच्छेद (अलग) होने लगती है। इसका तात्कालिक परिणाम यह होता है कि महिलाओं को समाज में सुरक्षा देने वाला सदियों पुराना पारिवारिक ढांचा कमजोर हो जाता है।
भारतीय संस्कृति का विकृतिकरण और बाजार का एजेंडा
राहुल गांधी ने पुणे में जोर देकर कहा, “आप अपने अलावा किसी और की नहीं हैं। आप किसी की संपत्ति नहीं हैं।” यह वाक्य सुनने में आकर्षक लगता है, परंतु यह भारतीय सामाजिक परंपराओं का एक घोर विकृतिकरण है। क्योंकि पारंपरिक बंधन में स्त्री को परिवार की धुरी माना गया है। लेकिन जब कोई स्त्री परिवार के संबंधों को बंधन मान कर तोड़ देती है ओर अपने परिवार से विच्छेद करती है तब वह फिर बाजार के हाथों में खेलने लगती है।
बाजार चाहता है कि स्त्री परिवार की धुरी न रहे, वह बच्चों की परवरिश और घर के बुजुर्गों की देखभाल जैसी “बिना भुगतान वाली” भूमिकाओं को छोड़कर 12 घंटे कॉर्पोरेट दफ्तरों में श्रम करे। इस प्रकार, परिवार से कटी हुई महिला बाजार के लिए एक ‘सस्ती श्रमिक’ और कॉस्मेटिक्स, फैशन व उपभोक्ता वस्तुओं की एक ‘बड़ी खरीदार’ बन जाती है। यह स्त्री की मुक्ति कैसे हो सकती है, यह तो उसका बाजारवादी कहीं दोहन तो कहीं शोषण है!
दूसरी ओर भारतीय संस्कृति है, जिसमें कभी भी स्त्री को ‘पुरुष की कानूनी संपत्ति’ नहीं माना गया। सनातन परंपरा में स्त्री को ‘गृहलक्ष्मी’, ‘अर्धांगिनी’ और ‘शक्ति’ का सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जब राहुल गांधी इस व्यवस्था को ‘संपत्ति की मानसिकता’ कहते हैं, तो वे वास्तव में पाश्चात्य और मध्यकालीन यूरोपीय इतिहास की बुराइयों को भारतीय समाज पर थोप रहे होते हैं, क्योंकि यूरोप के रोमन कानून में महिलाओं को सचमुच पुरुष की कानूनी संपत्ति माना जाता था और बहुत हद तक आज भी माना जाता है, (कैथोलिक इटली, जहां से इनकी मां हैं आज भी आसानी से देखा जा सकता है)
सोनिया गांधी की इतालवी विरासत: ‘माचिस्मो’ का अहंकार और दोहरा मापदंड
यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि राहुल गांधी भारत की जिस पितृसत्ता को ध्वस्त करने की बात पुणे के मंच से कर रहे थे, उसका वास्तविक और कठोर रूप उनकी अपनी माता सोनिया गांधी के मूल देश इटली में आज भी सांख्यिकीय रूप से मौजूद है। परंतु, राहुल गांधी ने कभी भी इतालवी समाज या कैथोलिक ईसाई पंथ के भीतर मौजूद महिला दमन पर कोई टिप्पणी नहीं की, जो उनके पुरुष अहंकार और राजनीतिक चयनात्मकता को उजागर करता है।
इतालवी सांख्यिकी संस्थान (आईएसटीएटी) और यूरोपीय संघ के वर्ष 2025-2026 के आंकड़ों के अनुसार, इटली में आज भी 43 फीसद महिलाएँ कार्यबल से पूरी तरह बाहर हैं, इटली में जेंडर पे गैप 17.4 प्रतिशत तक है, जहाँ एक ही पद पर काम करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों से कम वेतन मिलता है। इटली में तलाक की दर लगभग 48.3 फीसद है, जो यह दर्शाती है कि जिस पाश्चात्य ‘बाजारवादी मुक्ति’ और अति-व्यक्तिवाद का मॉडल राहुल गांधी भारत में लाना चाहते हैं, उसने इटली के पारिवारिक ताने-बाने को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। क्या राहुल गांधी पुणे की युवतियों को ऐसा समाज देना चाहते हैं जहाँ हर दूसरा परिवार टूटा हुआ हो और महिलाएँ अकेलेपन व मानसिक तनाव से जूझ रही हों?
भारत बनाम इटली में महिला सुरक्षा का यथार्थ
पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को महिलाओं के लिए एक दमनकारी संरचना के रूप में पेश किया। परंतु, यदि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनसंख्या के अनुपात (प्रति लाख आबादी पर दर) के आधार पर भारत और इटली की तुलना करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिमी देशों का सामाजिक ढांचा महिलाओं के लिए कहीं अधिक असुरक्षित और हिंसक है।

विश्व सांख्यिकी (जैसे संयुक्त राष्ट्र यूएनओडीसी, यूरोपीय संघ की एफआरए 2026 रिपोर्ट और भारत की एनसीआरबी 2024–2026 रिपोर्ट) के अनुसार भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर 64.6 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्या पर हैं। दूसरी ओर यूरोपीय संघ (ईयू) के देशों में जनसंख्या के अनुपात में वार्षिक दर्ज अपराधों की औसत दर लगभग 125 मामले प्रति एक लाख महिला जनसंख्या है। यह दर भारत से कहीं अधिक है। यानी यौन हिंसा, अन्य जितने भी महिला उत्पीड़न एवं हिंसा के प्रकार हो सकते हैं, युरोप उन सभी अपराध मामलों में भारत से कई गुना आगे है। पाश्चात्य समाज में महिलाओं के खिलाफ घरेलू और यौन हिंसा का प्रतिशत अधिक है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत की पारंपरिक परिवार व्यवस्था, जिसे राहुल गांधी पुणे में कोस रहे थे, वास्तव में महिलाओं को एक अत्यंत मजबूत सुरक्षात्मक कवच प्रदान करती है।
राहुल गांधी का वैचारिक खोखलापन
पुणे के भाषण में राहुल गांधी ने एक बार फिर पारंपरिक हिंदू व्यवस्था और प्राचीन ग्रंथों को निशाने पर लिया, परन्तु वे भारत और दुनिया भर में इस्लाम और ईसाइयत के भीतर मौजूद संस्थागत महिला दमन पर पूरी तरह मौन रहे। यह चुप्पी सिद्ध करती है कि उनका यह विमर्श सिर्फ राजनैतिक ध्रुवीकरण के लिए था।
यदि राहुल गांधी महिलाओं की पूर्ण स्वतंत्रता के इतने ही बड़े पक्षधर हैं, तो वे मुस्लिम महिलाओं को शरिया कानून के तहत पैतृक संपत्ति में मिलने वाले असमान अधिकारों और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं पर पुणे में क्यों नहीं बोले? जब भारत की संसद ने मुस्लिम महिलाओं को नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाने के लिए ‘तीन तलाक’ के खिलाफ कानून बनाया, तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने उसके खिलाफ मतदान क्यों किया । अरे, इतिहास में जाएं तो उनके पिता राजीव गांधी ने भी शाहबानों प्रकरण में यही किया था!
इसी तरह, वेटिकन और कैथोलिक चर्च के वे नियम जो महिलाओं को आज भी पादरी बनने के अधिकार से वंचित करते हैं और गर्भपात जैसी आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों पर पूर्ण रिलीजियस प्रतिबंध लगाते हैं, सच कहें तो उन पर राहुल गांधी की चुप्पी उनके वैचारिक दोहरे मापदंड को उजागर करती है। यह चयनात्मकता दर्शाती है कि वे सिर्फ और सिर्फ हिंदू महिलाओं को उनकी सामाजिक परंपराओं से अलग करना चाहते हैं।
ऐसे में कहना यही होगा कि पुणे में राहुल गांधी द्वारा दिया गया भाषण भारतीय सामाजिक मूल्यों को नष्ट करके एक विघटनकारी पाश्चात्य बाजारवादी मॉडल को स्थापित करने का प्रयास है। स्त्री को उसके परिवार से पूरी तरह मुक्त कर देने का नारा सुनने में तो आकर्षक हो सकता है, पर इसका अंतिम परिणाम समाज का विखंडन, अकेलेपन का संकट और महिलाओं की सुरक्षात्मक प्रणाली का ध्वस्त होना है, जैसा कि इटली और अन्य यूरोपीय देशों के आंकड़े साबित करते हैं। लगता भी यही है कि राहुल गांधी भारत को भी अपनी मां के देश इटली जैसा बना देना चाहते हैं, जिसमें स्त्री हिंसा और दमन अपने चरम पर है।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

