कोई भी फिल्म या वेब सीरीज देखने के बाद उसकी कहानी आपके मन में कुछ मंथन अथवा चिंतन निर्माण करें तो वह फिल्म या वेब सीरीज के निर्माण का उद्देश्य सफल हुआ है, ऐसी मेरी एक दर्शक के रूप में निरंतर भावना रही है। मैंने Made in India: A Titan Story को देखने के बाद यह वेब सीरीज ने मेरे मन में इसी प्रकार का मंथन और चिंतन का आंदोलन निर्माण किया है। यह वेब सीरीज मेरी दृष्टि में यह घड़ी बनाने वाली कंपनी की कहानी भर नहीं है। यह एक विचार के जन्म लेने, उसे आकार देने, बाजार में उतारने और अंततः लोगों के विश्वास का हिस्सा बनने की कहानी है। इसमें उद्योग है, व्यापार है, मार्केटिंग है, नेतृत्व है, टीम है, असफलताएं हैं और सबसे बढ़कर कुछ बड़ा करने का भारतीय आत्मविश्वास है।

छह एपिसोड की यह श्रृंखला विनय कामथ की पुस्तक Titan: Inside India’s Most Successful Consumer Brand से प्रेरित है। इसमें जे. आर. डी. टाटा, जेरक्सेस देसाई और उनकी टीम के माध्यम से टाइटन के निर्माण की यात्रा को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
लेकिन इस पूरी कहानी को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल बार-बार आता रहा, क्या यह वास्तव में घड़ी बनाने की कहानी है? मुझे लगता है, नहीं। इसका असली प्रश्न है, एक विचार को ब्रांड कैसे बनाया जाता है? यही इस सीरीज की सबसे बड़ी खूबी है। इस संपूर्ण सीरीज को देखते हुए सीरीज के प्रवाह में आए हुए संवाद मैंने मेरे नोटबुक पर उतार लिए थे। वही संवाद अब इस आलेख का माध्यम बन रहे हैं।
सीरीज में एक संवाद आता है, “प्रोडक्ट कितना भी अच्छा हो, मार्केटिंग उससे जादा अच्छी होनी चाहिए।” यह केवल व्यापार का सूत्र नहीं है। किसी भी संस्था के लिए यह एक महत्वपूर्ण सीख है। अच्छा उत्पाद बनाना पहला कदम है। उसके बाद उस उत्पाद को लोगों तक पहुंचाना, उनकी जरूरत समझना, उनके मन में विश्वास पैदा करना और उसे उनकी जीवनशैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है। टाइटन ने यही किया। एक समय भारत में घड़ी केवल समय देखने की वस्तु नहीं थी। विदेशी घड़ी प्रतिष्ठा और आधुनिकता का प्रतीक मानी जाती थी। इस कारण उस समय घड़ी की स्मगलिंग भी होती थी। ऐसे समय में टाइटन ने भारतीय उपभोक्ता के मन में यह विश्वास पैदा किया कि भारतीय कंपनी भी सुंदर, आधुनिक और विश्वस्तरीय उत्पाद बना सकती है। यहीं Made in India केवल एक शीर्षक नहीं रह जाता। वह एक मानसिकता बन जाता है।

मार्केटिंग मैनेजर के मुख से निकला हुआ एक संवाद है “डिस्कशन नहीं, डेमोंसट्रेशन”। मेरे लिए यह सीरीज का एक और महत्वपूर्ण संवाद है, “डिस्कशन नहीं, डेमोंसट्रेशन।” आज हम चर्चा बहुत करते हैं। बैठकें होती हैं, योजनाएं बनती हैं, प्रस्तुतियां होती हैं। लेकिन किसी विचार को जमीन पर उतारकर दिखाने की संस्कृति अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। टाइटन की यात्रा यह बताती है कि विचार तभी प्रभावशाली बनता है, जब वह प्रयोग में दिखाई दे और परिणाम में दिखाई दे। किसी भी संस्था के लिए इसका सरल अर्थ है , केवल बताइए मत, करके दिखाइए।
सीरीज में आया एक संवाद मन को छू जाता है। “अब तू ‘हम’ से ‘मैं’ तक कब पहुंच गया?” किसी भी संस्था के निर्माण में यह एक अत्यंत गंभीर प्रश्न है। शुरुआत में संस्था का उद्देश्य सबसे बड़ा होता है। व्यक्ति उस उद्देश्य का हिस्सा होता है। लेकिन धीरे-धीरे यदि व्यक्ति अपने पद,अधिकार या सफलता को संस्था से बड़ा समझने लगे, तो समस्या शुरू होती है।संस्था की शक्ति “मैं” में नहीं, “हम” में होती है।

इसी संदर्भ में एक और प्रसंग उल्लेखनीय है। जब पूछा जाता है कि आकाश की कंपनी में वास्तविक भूमिका क्या है, तब संस्थापक उस सदस्य के बारे में कहा जाता है, “फाउंडिंग मेंबर्स ऑफ द कंपनी… मां की तरह होते हैं।” यह बात केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्था निर्माण का गहरा सिद्धांत है। मां बच्चे को केवल जन्म नहीं देती, उसका संस्कार और व्यक्तित्व भी गढ़ती है। उसी तरह शुरुआती टीम किसी कंपनी को केवल चलाती नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, सोच और कार्यशैली को आकार देती है।कंपनी मशीनों से बन सकती है, लेकिन संस्था मनुष्यों से बनती है।
टाइटन के सामने एक बड़ी चुनौती थी, भारतीय बाजार को समझना। एक जगह दुकानदार ग्राहक के रूप में एक दुकान में गए तब दुकानदार ने जेरक्सेस देसाई से कहता है, “आपको खुद को नहीं पता आपको क्या लेना है?”
यह संवाद आज के मार्केटिंग जगत में भी बहुत प्रासंगिक है। कई बार ग्राहक को अपनी आवश्यकता का पूरा स्वरूप स्वयं भी मालूम नहीं होता। ऐसे में ब्रांड केवल मांग पूरी नहीं करता, बल्कि नई मांग और नई पसंद भी पैदा करता है। इसलिए जब सवाल आता है,
“टाइटन के पास कितनी वैराइटीज है?”
तो यह केवल उत्पादों की संख्या का प्रश्न नहीं है। भारत जैसे विशाल और विविध देश में अलग-अलग आयु, वर्ग, प्रदेश, जीवनशैली और आर्थिक क्षमता वाले लोगों की अलग-अलग जरूरतें हैं। अपने उत्पादकों का मार्केटिंग करते समय शहर और गांव, युवा और वरिष्ठ, पुरुष और महिला, सामान्य और प्रीमियम ग्राहक सभी को समझना पड़ता है। इसलिए ब्रांड का अर्थ केवल ज्यादा उत्पाद बनाना नहीं है। ब्रांड का अर्थ ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ना है।
“Freedom of Failures.” यह शब्द इस सीरीज में बार-बार आता है और दर्शकों को कमेंट में गहराई से बैठ जाता है। असफल होने की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि असफलता को महत्वहीन समझा जाए। इसका अर्थ है, प्रयोग करने की स्वतंत्रता, गलती से सीखने की अनुमति और दोबारा प्रयास करने का साहस।
एक और संवाद इस विचार को पूरा करता है, “दुनिया में सबसे बड़ी गलती होती है, अपनी गलती से कुछ न सीखना।” यह बात केवल टाइटन पर लागू नहीं होती। किसी भी व्यक्ति, संस्था या उद्योग के लिए यह जीवन का महत्वपूर्ण सूत्र है। यदि किसी कहानी में केवल सफलता दिखाई जाए तो वह विज्ञापन बन जाती है। लेकिन जब सफलता के साथ संघर्ष और असफलताएं भी दिखाई जाती हैं, तब कहानी वास्तविक और मानवीय बनती है। इसी कारण Made in India: A Titan Story की औद्योगिक संस्था से जुड़ी कहानी दर्शकों के मन में स्थान बना लेती है।
टाइटन की यात्रा भी सीधी और आसान नहीं थी। उत्पादन, बाजार, तकनीक, वित्त और नेतृत्व हर स्तर पर चुनौतियां थीं। लेकिन हर चुनौती से सीखते हुए आगे बढ़ना ही उसकी ताकत बनी। इसीलिए एक संवाद मन में ठहर जाता है, “यह सक्सेस की प्यास बड़ी टेढ़ी होती है। यह इन्वेस्टमेंट मांगती है, लेकिन रिटर्न की गारंटी नहीं।” सफलता की कीमत होती है। और कई बार उस कीमत का भुगतान सफलता मिलने से पहले करना पड़ता है।
“मैं हर घर में टाइटन को पहुंचाना चाहता हूं” यह संवाद केवल मार्केटिंग का लक्ष्य नहीं है। यह एक दृष्टि है, “मैं हर घर में टाइटन को पहुंचाना चाहता हूं।” एक सफल ब्रांड केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं रहता। वह समाज के विभिन्न वर्गों के जीवन में अपनी जगह बनाता है। इसी कारण “मार्केट” का अर्थ बदलकर “ संपूर्ण समाज” हो जाता है। किसी भी संस्था के लिए यह सोच महत्वपूर्ण है, हम कितने लोगों तक पहुंचना चाहते हैं? केवल अपने वर्तमान ग्राहक तक या उन लोगों तक भी, जो अभी हमारे ग्राहक नहीं हैं? इस संपूर्ण सीरीज में पुराना फिल्मों के संगीत की भरमार है। वह संगीत भी कहानी कहता है। इस सीरीज में पुराने फिल्मी गीतों का सुंदर प्रयोग किया है, यह इस सीरीज की विशेषता है। ये गीत केवल मनोरंजन के लिए नहीं आते। वे उस समय को फिर से जीवित करते हैं। वे घटनाओं को भावनाओं से जोड़ते हैं और दर्शक को उस दौर की स्मृतियों में ले जाते हैं।

टाइटन की वास्तविक विज्ञापन यात्रा में भी संगीत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। टाइटन की पहचान से जुड़ी धुन भारतीय विज्ञापन जगत की सबसे यादगार ब्रांड धुनों में गिनी जाती है। इसलिए सीरीज में संगीत केवल पृष्ठभूमि नहीं है। वह टाइटन की सामूहिक स्मृति को जगाने का माध्यम बन जाता है। विशेष रूप से Mozart आधारित Titan advertising tune को भारतीय विज्ञापन इतिहास की सबसे पहचानने योग्य brand में माना गया है।
अभिनय इस सीरीज की एक और मजबूत विशेषता है। नसीरुद्दीन शाह ने जे. आर. डी. टाटा और जिम सरभ ने जेरक्सेस देसाई की भूमिकाओं को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। खास बात यह है कि इन भूमिकाओं में अनावश्यक नाटकीयता नहीं दिखाई देती। जे. आर. डी. टाटा की शांति और जेरक्सेस देसाई की ऊर्जा के बीच का अंतर कहानी को गहराई देता है। सबसे अच्छी बात यह है कि सीरीज यह संदेश नहीं देती कि टाइटन यह उत्पादन किसी एक व्यक्ति ने बनाया। इसके बजाय वह धीरे-धीरे बताती है कि, एक दृष्टि को, विचार को संस्था में बदलने के लिए पूरी टीम चाहिए। यही किसी भी बड़े संस्थान की वास्तविक शक्ति है।
यह हम जैसे मीडिया और मार्केटिंग में कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए भी एक बड़ा पाठ है। मेरी दृष्टि से इस सीरीज का एक महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया और संचार से जुड़ा है। टाइटन ने केवल घड़ी नहीं बेची। उसने एक कहानी बेची है। भारतीय क्षमता की कहानी। आज जब कोई व्यक्ति टाइटन पहनता है, तो वह केवल घड़ी नहीं पहनता। उसके साथ एक विचार, एक पहचान और एक धारणा भी जुड़ी होती है।
यही ब्रांड कम्युनिकेशन की शक्ति है। और यह सीरीज स्वयं भी यही करती है। वह टाइटन का सीधा विज्ञापन नहीं करती। वह टाइटन की कहानी सुनाती है। यही कारण है कि दर्शक कंपनी के उत्पाद से आगे बढ़कर उसके संघर्ष, लोगों और विचारों से जुड़ने लगता है।
एक मीडिया से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में इस सिरीज़ को देखते हुए मेरे मन में एक सवाल उठा, क्या हम भी अपने संस्थान, अपने विचार और अपने उद्देश्य को ऐसी कहानी में बदल सकते हैं, जिससे लोग केवल जानकारी न लें, बल्कि उससे भावनात्मक रूप से जुड़ें? मेरी दृष्टि में टाइटन की सबसे बड़ी उपलब्धि घड़ी नहीं, विश्वास है। टाइटन ने भारतीय ग्राहक को यह भरोसा दिया कि भारतीय उत्पाद भी विश्वस्तरीय हो सकता है। यही भरोसा धीरे-धीरे ब्रांड की सबसे बड़ी पूंजी बन गया। किसी भी संस्था के लिए यही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। लोग हमारे उत्पाद को केवल खरीदें नहीं, बल्कि उस पर विश्वास करें। क्योंकि उत्पाद बाजार में बेचा जा सकता है, लेकिन विश्वास अर्जित करना पड़ता है।

मेरे लिए किसी भी फिल्म या सीरीज की सफलता की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि उसके समाप्त होने के बाद वह दर्शकों के मन में कितनी देर तक बनी रहती है? या वर्तमान परिप्रेक्षा को लेकर चिंतन निर्माण करती है? इस कसौटी पर Made in India: A Titan Story सफल होती है। सीरीज समाप्त होने के बाद एक मीडिया व्यक्तित्व के रूप में हमारे मन में कई तरंगे निर्माण करते हैं, हम क्या बना रहे हैं? हमारे काम का उद्देश्य क्या है? क्या हमारी संस्था व्यक्ति पर टिकी है या विचार पर? क्या हमारी टीम को प्रयोग करने की स्वतंत्रता है? क्या हम असफलताओं से सीखते हैं? क्या हम केवल उत्पाद बना रहे हैं या ब्रांड? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या हम “मैं” से “हम” की ओर बढ़ रहे हैं या “हम” से “मैं” की ओर? यहीं मनोरंजन समाप्त होता है और मंथन शुरू होता है। यह मेरी अनुभूति है, शायद अन्य दर्शकों के मन में भी अलग रूप में अनुभूति निर्माण होती होगी।
मेरी दृष्टि में, यह केवल टाइटन की कहानी नहीं Made in India: A Titan Story को केवल “टाइटन की कहानी” कहना उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह एक विचार की यात्रा है। एक उद्योग की यात्रा है। एक ब्रांड की यात्रा है। एक टीम की यात्रा है। असफलताओं से सीखने की यात्रा है। और सबसे बढ़कर, भारतीय आत्मविश्वास की यात्रा है। यह “भारत में बनी घड़ी” की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास के निर्माण की कहानी है कि, “भारत में भी विश्वस्तरीय चीज बनाई जा सकती है।” और शायद यही इस सीरीज का सबसे बड़ा संदेश है।
मेरी अपनी मीडिया यात्रा की दृष्टि से भी यह सीरीज कई सवाल छोड़ जाती है। विचार क्या है? उद्देश्य क्या है? टीम कौन है? पाठक कौन है? उसकी जरूरत क्या है? हमारी पहचान क्या है? और आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या छोड़कर जाना चाहते हैं? इसलिए मेरे लिए Made in India: A Titan Story एक बिजनेस सीरीज से कहीं अधिक है। यह संस्था निर्माण का पाठ है। इसका सबसे बड़ा संदेश शायद यही है, “संस्था केवल बनाई नहीं जाती; उसे लगातार गढ़ना पड़ता है।”
और शायद इसी कारण इस सीरीज को देखने के बाद मुझे केवल घड़ी का समय याद नहीं रहता। याद रहती है, समय के साथ कुछ बड़ा बनाने की कीमत।
:- अमोल पेडणेकर

