लोकतंत्र में नागरिक सरकार से सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर हुए खर्च का हिसाब मांगता है। यह उसका अधिकार है। लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है, जिस पर सवाल उठाते समय हमारा सार्वजनिक विमर्श अचानक संकोची हो जाता है— न्याय व्यवस्था। पुलिस से लेकर अदालतों तक, जेलों से लेकर मुफ्त कानूनी सहायता तक, यह पूरा तंत्र जनता के धन से चलता है। इसलिए स्वाभाविक प्रश्न है— क्या नागरिक इस खर्च और उसके परिणाम का हिसाब नहीं मांग सकता?
सोशल माध्यमों पर न्याय व्यवस्था के खर्च को लेकर कुछ आंकड़े सामने आते रहते हैं— मसलन पुलिस पर प्रति नागरिक लगभग 1,500 रुपये, न्यायपालिका पर 450 रुपये, जेल पर 150 रुपये और मुफ्त कानूनी सहायता पर 9 रुपये का भार। इसी तरह कुल सार्वजनिक बजट में न्याय व्यवस्था पर 4.6 प्रतिशत खर्च होने का दावा भी किया जाता है। इन आंकड़ों को बिना स्रोत के अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। उपलब्ध सरकारी और संसदीय दस्तावेजों से इतना जरूर स्पष्ट है कि न्याय और कानून व्यवस्था पर सार्वजनिक धन का आकार छोटा नहीं है। राज्यों के बारे में उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार 2023-24 में राज्यों ने औसतन अपने बजट का लगभग 4.2 प्रतिशत पुलिस पर खर्च करने का अनुमान रखा था।
केंद्र के 2026-27 के बजट में विधि और न्याय की मांग के लिए 4,509.06 करोड़ रुपये का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय के लिए 622.11 करोड़ रुपये का प्रावधान है। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि 4,509.06 करोड़ रुपये केवल पूरे भारतीय न्याय तंत्र का खर्च नहीं है; राज्यों की पुलिस, अधीनस्थ न्यायालय, जेल और अन्य संस्थाओं का बड़ा हिस्सा अलग-अलग बजटों से आता है।
फिर भी असली सवाल आंकड़े का आकार नहीं, उस खर्च का परिणाम है।
राष्ट्रीय न्यायिक आंकड़ा ग्रिड पर इस समय अधीनस्थ अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित दिखाई देते हैं। इनमें लगभग 48 लाख मामले 10 वर्ष से भी पुराने हैं। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के संबंध में सरकार ने संसद को बताया था कि 16 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में 92,876 और उच्च न्यायालयों में 63,98,686 मामले लंबित थे। सरकार ने स्वयं माना है कि मुकदमों की लंबितता केवल न्यायाधीशों की संख्या से नहीं, बल्कि जटिल तथ्यों, साक्ष्यों, जांच, गवाहों, अधोसंरचना और न्यायालयीन कर्मचारियों सहित अनेक कारणों से जुड़ी है।
यहीं से जवाबदेही का प्रश्न उठता है।
क्या जनता यह पूछ सकती है कि न्याय व्यवस्था पर खर्च किए गए प्रत्येक सौ रुपये से नागरिक को क्या मिला? कितने मामले दाखिल हुए, कितने निपटे और कितने वर्षों से लंबित हैं? किन न्यायालयों में पद रिक्त हैं? किन जगहों पर भवन, कर्मचारी और तकनीकी सुविधाओं की कमी है? इन सवालों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं समझा जाना चाहिए। स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है।एक और संवेदनशील प्रश्न है— मामलों की प्राथमिकता कैसे तय होती है? किसी मामले को तत्काल सुनवाई क्यों मिलती है और किसी दूसरे मामले को वर्षों प्रतीक्षा करनी पड़ती है? यह पूछना किसी विशेष न्यायाधीश की नीयत पर संदेह करना नहीं, बल्कि प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग करना है।
इसी तरह न्यायाधीशों के प्रदर्शन का प्रश्न भी गंभीरता से उठना चाहिए। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि न्याय की गुणवत्ता को केवल निपटाए गए मामलों की संख्या से मापा जाए। जल्दबाजी में दिया गया गलत न्याय, देर से मिले न्याय से बेहतर नहीं। इसलिए न्यायाधीशों के मूल्यांकन में मामलों के निपटारे के साथ निर्णयों की गुणवत्ता, लंबित मामलों की अवधि, समयबद्धता, न्यायालयीन प्रशासन और नागरिकों के अनुभव जैसे संतुलित मानदंडों पर विचार किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय स्वयं वार्षिक न्यायिक प्रतिवेदन प्रकाशित करता है, जिसमें उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के कामकाज की जानकारी दी जाती है।
यहां एक बारीक रेखा है। न्यायपालिका को कार्यपालिका या राजनीतिक दबाव के अधीन नहीं किया जा सकता। लेकिन सार्वजनिक धन से चलने वाली किसी भी संस्था को जनता के प्रति संस्थागत उत्तरदायित्व से पूरी तरह अलग भी नहीं रखा जा सकता।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “जज साहब से हिसाब क्यों मांगा जाए?” सवाल यह होना चाहिए कि ऐसा कौन-सा पारदर्शी तंत्र बनाया जाए जिसमें न्यायिक स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे और नागरिकों को यह भी पता चले कि व्यवस्था कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रही है।
“हम भारत के लोग” संविधान के मूल स्रोत हैं। कर हम देते हैं, संस्थाएं हमारे नाम पर चलती हैं और न्याय भी अंततः हमारे लिए है। इसलिए खर्च का हिसाब मांगना अविश्वास नहीं, लोकतांत्रिक नागरिकता का स्वाभाविक अधिकार है।
न्यायपालिका की गरिमा बनी रहे, उसकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहे— लेकिन उसके साथ एक और चीज भी बनी रहनी चाहिए: जनता का यह अधिकार कि वह पूछ सके— न्याय के लिए हमने कितना खर्च किया और उसके बदले न्याय कितनी जल्दी, कितनी समानता और कितनी पारदर्शिता से मिला?
– डॉ. एस. के. द्विवेदी

