“जंगलों में नक्सलवाद भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन ‘दिमागी नक्सली’ अभी भी सक्रिय हैं। उन्हें पहचानना और अलग-थलग करना आवश्यक है।” प्रधानमंत्री जी ने ऐसा संकेत दिया और जिन लोगों को पर ये बात बिल्कुल फिट बैठी, उन्होंने हंगामा और शोर-शराबा शुरू कर दिया।
वे इस तरह का दुष्प्रचार कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री आंदोलनकारी विद्यार्थियों को ‘दिमागी नक्सली’ बता रहे हैं। यह पूरी तरह झूठ है। प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों का नहीं, बल्कि उनके विचारों और मानसिकता को प्रभावित करके उनके मन में अराजकतावादी और विध्वंसक विचारों के बीज बोने वालों को ‘दिमागी नक्सली’ कहा है।
“अगर कोई सवाल पूछे तो क्या आप उसे ‘दिमागी नक्सली’ कह देंगे?”—ऐसा मासूम-सा सवाल पूछने वाले राजदीप सरदेसाई जानते हैं कि सवाल अनेक लोग पूछते हैं और उनके उत्तर भी दिए जाते हैं। उन्हें कोई ‘दिमागी नक्सली’ नहीं कहता। बल्कि
“देश का भविष्य अब संसद में नहीं, बल्कि सड़कों पर तय किया जाएगा” कह कर अराजकता का खुला समर्थन करने वाले योगेंद्र यादव ‘दिमागी नक्सली’ हैं।
“कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था और न है” ये कहकर देश के टुकड़े करने की माँग करने वाली अरुंधति रॉय ‘दिमागी नक्सली’ हैं।
देश की न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से संसद पर हमले के गंभीर आरोपी सिद्ध हुए अफ़ज़ल गुरु के समर्थन में “अफ़ज़ल, हम शर्मिंदा हैं; तेरे कातिल ज़िंदा हैं” जैसे नारे लगाने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करने वाले जेएनयू के प्रोफेसर ‘दिमागी नक्सली’ हैं।
सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले कसाब और याकूब मेमन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार याचिकाएँ दायर करने वाले मानवतावाद का मुखौटा पहने जिहाद समर्थक ‘दिमागी नक्सली’ हैं।

छद्म-उदारवादी लॉबी ने एक और सुविधाजनक गलतफहमी पाल रखी है कि वे बुद्धिजीवी हैं, इसलिए उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ कहा जा रहा है। ये भी गलत है। ‘दिमागी नक्सली’ वे नहीं हैं जिनके पास बुद्धि है, बल्कि वे हैं जो दूसरों की बुद्धि को भ्रष्ट करके उसे विकृत करने का प्रयास करते हैं।
ये भी शोर मचाया जाता है कि संविधान ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार दिया है, फिर भी प्रधानमंत्री आंदोलनकारियों को ‘आंदोलनजीवी’ कहते हैं। एसटी कर्मचारी, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और ऐसे अनेक समूह आंदोलन करते हैं। उन्हें कोई ‘आंदोलनजीवी’ नहीं कहता। लेकिन आम जनता द्वारा अपनी उचित और न्यायसंगत माँगों के लिए शुरू किए गए हर आंदोलन में घुसपैठ करके, उसे अपने कब्ज़े में लेकर हिंसा और अराजकता के लिए उकसाने वालों को प्रधानमंत्री ने ‘आंदोलनजीवी’ नाम बिल्कुल सही दिया है।
इन लोगों का मूल आंदोलन या उसकी माँगों से कोई संबंध नहीं होता। इनके द्वारा भड़काई गई आग से आम आंदोलनकारियों को वर्षों तक नुकसान उठाना पड़ता है। जबकि ये आंदोलनजीवी पीछे मुड़कर भी नहीं देखते और अपनी जीभ लपलपाते हुए अगले आंदोलन की ओर बढ़ जाते हैं। ये फैशनेबल ‘लिमोज़ीन लिबरल’ ही प्रधानमंत्री द्वारा बताए गए ‘दिमागी नक्सली’ हैं।
वामपंथ ऐसी निरंकुश विचारधारा है, जो चाहती है कि पूरी दुनिया अपने विचारों को स्वीकार करे। इसे हासिल करने के लिए मार्क्स, लेनिन और माओ ने बंदूक की नली से निकलने वाली रक्तरंजित क्रांति का रास्ता बताया था। लेकिन जब उसमें सफलता नहीं मिली, तब विभिन्न देशों के लोगों की मानसिकता और विचारशक्ति पर नियंत्रण प्राप्त करके उन्हें आत्म-विनाश के लिए प्रेरित करने की योजना बनाई गई।
इस्लामी देशों या सैन्य तानाशाही वाले देशों में इस तरह घुसपैठ करना संभव नहीं है। इसलिए लोकतांत्रिक देशों में मिले संवैधानिक स्वतंत्रता का उपयोग उन्हीं देशों के विरुद्ध करके वहाँ के लोकतंत्र और संविधान को नष्ट करना तथा अराजकता के रास्ते हर देश को अपने प्रभाव में लाना ये रणनीति अपनाई गई है।
इसे सफल बनाने के लिए वे लोकतांत्रिक देशों में दो प्रकार की संस्थाओं पर प्रभुत्व स्थापित करते हैं। पहली वे संस्थाएँ हैं, जो लोगों के मन पर प्रभाव डालती हैं जैसे शिक्षा, मीडिया, फ़िल्म और साहित्य। अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और भारत में इन क्षेत्रों पर वामपंथियों का एकाधिकार कोई संयोग नहीं है, बल्कि दशकों से व्यवस्थित रूप से लागू की जा रही योजना है।
दूसरे प्रकार की संस्थाएँ वे हैं, जो नीतियों को प्रभावित करती हैं जैसे राजनीतिक दल, न्यायपालिका और नौकरशाही। जब ये समझ में आया कि लोगों का मार्क्सवादी दलों की ओर आकर्षित होना कठिन है, तब यह सुनिश्चित किया गया कि प्रत्येक लोकतांत्रिक देश में कम-से-कम एक प्रमुख राजनीतिक दल पूरी तरह उनके विचारों के प्रभाव में रहे।
इसके लिए शिक्षा और मीडिया जैसे क्षेत्रों पर नियंत्रण उपयोगी साबित होता है। आज अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी, भारत की कांग्रेस पार्टी और ब्रिटेन की लेबर पार्टी ‘लेफ्ट ऑफ सेंटर’ नहीं, बल्कि ‘एक्सट्रीम लेफ्ट’ पार्टियाँ बन गई हैं। यदि यूपीएससी की तैयारी कराने वाले संस्थानों का अध्ययन किया जाए, तो पता चलेगा कि इनमें से अधिकांश संस्थानों के माध्यम से विद्यार्थियों में वामपंथी विचारों का रोपण किया जा रहा है।
संस्थाओं में घुसपैठ करके उन्हें अपने नियंत्रण में लेने का काम अपने आप नहीं हुआ है। इसे एक घातक और दीर्घकालीन योजना के अंतर्गत अंजाम दिया गया है। इसे ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ कहकर खारिज करने का प्रयास किया जाएगा। इसलिए कुछ प्रमाण देखते हैं।
बंदूक की नली से आने वाली हिंसक क्रांति को छोड़कर लोगों की विवेक-बुद्धि को कमजोर करते हुए देश को आत्मविनाश की ओर ले जाने की योजना जिन सिद्धांतों पर आधारित है, उनमें इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष एंटोनियो ग्राम्शी और ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल’ के नाम से प्रसिद्ध जर्मनी के प्रोफेसरों का एक समूह प्रमुख है
ग्राम्शी का विचार था कि समाज की चेतना को बदलकर स्कूलों, विश्वविद्यालयों, चर्चों और मीडिया में घुसपैठ के माध्यम से संस्कृति पर पहले नियंत्रण स्थापित किया जाए, ताकि अंततः समाजवाद विजयी हो। फ्रैंकफर्ट स्कूल के एक प्रोफेसर मैक्स हॉर्कहाइमर ने कथित रूप से 1930 में ही इस कार्यपद्धति का उल्लेख किया था कि क्रांति बंदूकों से नहीं, बल्कि साल दर साल और पीढ़ी दर-पीढ़ी धीरे-धीरे होगी।
शैक्षणिक संस्थाओं और राजनीतिक कार्यालयों में घुसपैठ करके उन्हें धीरे-धीरे मार्क्सवादी संस्थाओं में बदलने की बात कही गई।
विली मुनज़ेनबर्ग ने इससे भी स्पष्ट शब्दों में कहा था कि बुद्धिजीवियों को संगठित करके उनका उपयोग पश्चिमी सभ्यता को बदनाम करने के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार सभ्यता और संस्कृति के प्रति घृणा पैदा करने के लिए समाज की बुद्धि को भ्रष्ट करने का प्रयास करने वालों को ‘दिमागी नक्सली’ कहा जाना चाहिए।
समाज को आत्म-विनाश के लिए तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका है उसकी स्मृतियों और उसकी पहचान को मिटा देना।
इसके लिए उसकी संस्कृति और इतिहास को नष्ट करना, उसके त्योहारों और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति अरुचि पैदा करना तथा भ्रम फैलाना आवश्यक है। फिर एक नई, खोखली और दिखावटी संस्कृति का निर्माण किया जाता है। बुज़ुर्गों के सम्मान, परिवार के प्रति प्रतिबद्धता, सांस्कृतिक मूल्यों और प्रतीकों के सम्मान तथा देशभक्ति जैसी बातों को हास्यास्पद बनाया जाता है।
मीडिया और मनोरंजन के माध्यम से एक सतही ‘मास कल्चर’ तैयार किया जाता है। यदि थोड़ा विचार किया जाए तो भारत में इन सब गतिविधियों में शामिल लोगों के नाम हमें तुरंत याद आ जाएँगे। यही ‘दिमागी नक्सली’ गिरोह है।
जंतर-मंतर के आंदोलन में इन लोगों की प्रमुख भागीदारी थी। वहाँ “कश्मीर कभी भारत का हिस्सा नहीं था” कहने वाली अरुंधति रॉय थीं; “हम अराजकतावादी हैं” कहने वाले केजरीवाल और सिसोदिया थे; “भारत तेरे टुकड़े होंगे” कहने वाले उमर खालिद तथा चिकन नेक के पास से पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग करने की भाषा बोलने वाले शरजील इमाम का समर्थन करने वाले जेएनयू के छात्र संगठनों जैसे आइसा और एसएफआई के प्रतिनिधि थे; “मेरा जेंडर, मेरी मर्ज़ी” जैसी वोक घोषणाएँ करने वाले लोग थे।
संक्षेप में, नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने से जिन विद्यार्थियों को नुकसान हुआ था, उन्हें छोड़कर बाकी पूरा ‘दिमागी नक्सली’ समूह वहाँ इकट्ठा था। इसलिए वहाँ सुरक्षा बलों के जवानों का उपहास और अपमान किया गया, भारतीय सशस्त्र बलों के बारे में अत्यंत घटिया टिप्पणियाँ और इशारे किए गए तथा अश्लील नृत्य किए गए।

याद कीजिए कि ऐसा करने के लिए किसने प्रोत्साहित किया और किसने उसका समर्थन किया। यही ‘दिमागी नक्सली’ हैं।
इसके बाद झारखंड में हुए विद्यार्थी आंदोलन में देश-विरोधी और अलगाववादी लोगों को कोई स्थान नहीं दिया गया। वहाँ देश-विरोधी नारे नहीं लगाए गए, सुरक्षा बलों का अपमान या उपहास नहीं किया गया और वोक विचारधारा से प्रेरित इस्लामो-लेफ्टिस्ट एजेंडा नहीं चलाया गया।
क्योंकि वह आंदोलन इन ‘दिमागी नक्सलियों’ द्वारा प्रायोजित नहीं था, बल्कि वास्तविक विद्यार्थी आंदोलन था। इन विद्यार्थियों को कोई ‘आंदोलनजीवी’ नहीं कहेगा।
ये विश्वास करना कठिन है कि कोई व्यक्ति इन ‘दिमागी नक्सली’ गतिविधियों को जान-बूझकर कर सकता है। हम सामान्यतः मानते हैं कि कोई व्यक्ति किसी विशेष परिस्थिति में बुरा व्यवहार करता है। ये स्वीकार करना कठिन होता है कि उसका मूल ध्येय और उद्देश्य ही समाज का विनाश हो सकता है।
लेकिन उपरोक्तानुसार मुनज़ेनबर्ग आदि ने ये बात लिखकर रखी है और कई अन्य लोगों ने भी इसे दोहराया है। इसके लिए झूठ बोलना, सत्य, तथ्य और तर्क की खुलेआम उपेक्षा करना तथा बिना पलक झपकाए अपने बोले हुए झूठ को सत्य बताते रहना आवश्यक है। इसके साथ जुड़ी अपराध-बोध की भावना को मिटाना पड़ता है।
एक बार यह हासिल हो जाए तो अंतरात्मा की चोट बंद हो जाती है। फिर सत्य-असत्य, उचित-अनुचित और नैतिक-अनैतिक का निर्णय किसी वस्तुनिष्ठ कसौटी पर नहीं, बल्कि अपनी विचारधारा के लिए क्या सुविधाजनक है, इस आधार पर किया जा सकता है। इसके बाद पूरे आत्मविश्वास से दूसरों को ये बताना संभव हो जाता है कि हम जो कहते हैं वही मानवतावाद और विवेकवाद है।
इसीलिए वामपंथी विचारधारा के सभी बड़े विचारकों ने जोर देकर कहा है कि क्रांति के हितों के सामने नैतिकता गौण है। लेनिन का कथन है कि हमारी नैतिकता पूरी तरह श्रमिक वर्ग के हितों के अधीन है यानि कामगारों के लाभ के सामने नैतिकता दोयम दर्जे की है।
ग्राम्शी और फ्रैंकफर्ट स्कूल के प्रोफेसरों द्वारा वैचारिक स्तर पर प्रस्तुत योजना को व्यावहारिक रणनीति में बदलने वाले सॉल अलिंस्की ने उग्र आंदोलनों के कार्यकर्ताओं की ‘रेड बुक’ मानी जाने वाली अपनी पुस्तक रूल्स फॉर रैडिकल्स में लिखा कि एक उग्रवादी को अपनी अंतरात्मा से समझौता करने या उसे भ्रष्ट करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
एक बार नैतिकता और अंतरात्मा को गौण मान लिया जाए तो सत्य-असत्य, उचित-अनुचित और नैतिक-अनैतिक की चिंता करने का कोई कारण नहीं बचता और किसी भी चीज़ का समर्थन किया जा सकता है।
वामपंथी लोग खुलेआम झूठ कैसे बोल सकते हैं और सैकड़ों प्रमाण दिए जाने के बाद भी अपने झूठे दावे पर कैसे अड़े रह सकते हैं इसका रहस्य इसी शिक्षा में छिपा है।
ये समझ में आने पर यह भी स्पष्ट होता है कि भीड़ द्वारा पुलिस पर पथराव करने के बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया, इस स्पष्ट सत्य की उपेक्षा करके “अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे गरीब, निर्दोष बच्चों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा” ये कहानी कैसे चलाई जाती है। साथ ही, झारखंड में पुलिस द्वारा बिना किसी उकसावे के किए गए लाठीचार्ज की अनदेखी कैसे की जाती है, ये भी समझ में आता है।
अलिंस्की के ‘रैडिकल्स के लिए तेरह नियमों’ में से दो उदाहरण देखते हैं। उसका पाँचवाँ नियम है उपहास सबसे प्रभावशाली हथियार है। ‘काकरोच पार्टी’ के वामपंथी युवाओं द्वारा मोदीजी के लिए अत्यंत गंदी भाषा का इस्तेमाल और राहुल गांधी द्वारा उसकी नकल करते हुए किया जाने वाला बचकाना व्यवहार इसी शिक्षा की जड़ में है। लेकिन जो लोग स्वयं हास्यास्पद हैं, उनका उपहास प्रभावी नहीं होता ये बात राहुल गांधी को किसी को बताने की आवश्यकता है।
उसका तेरहवाँ नियम कहता है कि अपने शत्रु के विचारों से लड़ने के बजाय किसी व्यक्ति को उन विचारों का चेहरा बना दो और उसे अमानवीय, अत्याचारी खलनायक बताकर समाज को उसके विरुद्ध ध्रुवीकृत कर दो। इस नियम का सबसे अच्छा उदाहरण नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अमानवीय तथा राक्षसी रूप में प्रस्तुत करने का चल रहा प्रयास है।
इन सभी उदाहरणों से पता चलता है कि लोकतांत्रिक राष्ट्रों को आत्म-विनाश के लिए प्रेरित करके उन पर अपने विचार थोपने के लिए इन लोगों ने कितना गहरा विचार और कितनी व्यापक तैयारी की है। इसलिए उदारवाद के उनके ओढ़े हुए मुखौटे से भ्रमित हुए बिना उनके असली वामपंथी और अराजकतावादी चेहरे को पहचानना जरूरी है।
‘अमेरिकन डीप स्टेट’ भी, जो ये सुनिश्चित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है कि दुनिया के सभी देश केवल अमेरिका के हितों वाली नीतियाँ अपनाएँ, अपने उद्देश्यों में बाधा डालने वाले देशों को आत्म-विनाश की ओर धकेलने का रास्ता अपना चुका है। इस तकनीक पर नियंत्रण रखने वाले वामपंथियों के साथ उसने गठबंधन किया है।
ये गठबंधन भारत में सत्ता परिवर्तन कराने के संकल्प के साथ काम में जुट गया है। इसलिए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस गठबंधन के विध्वंसकारी ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचानिए और अलग-थलग कीजिए।
क्योंकि ये पाकिस्तान-समर्थित आतंकवादियों, जंगलों में सक्रिय नक्सलवादियों और पूर्वोत्तर भारत के अलगाववादियों जैसे सभी देश-विरोधी समूहों को संवैधानिक स्वतंत्रताओं का दुरुपयोग करके बचाव-कवच प्रदान करने का काम करते हैं। ये देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नागरिकों की सुविधाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं में असीमित बाधाएँ उत्पन्न करते हैं
ये सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में हेरफेर करके अधिक-से-अधिक लोगों के मन में घृणा, पीड़ित मानसिकता और हर घटना के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा करके देश में अराजकता फैलाने की योजनाओं को बढ़ावा देते हैं।
भारत को देश के बाहर के शत्रुओं से जितना खतरा है, उससे भी अधिक खतरा उन आंतरिक शत्रुओं से है, जिनको जनरल बिपिन रावत ने ‘0.5 फ्रंट’ कहा था।
‘दिमागी नक्सली’ प्रधानमंत्री द्वारा कहा गया कोई सामान्य शब्द नहीं है, बल्कि अत्यंत सोच-समझकर दिया गया महत्वपूर्ण संकेत है।
– अभिजीत जोग
