लाल किले की प्राचीर से प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को जैसे ही ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग क्या किया, मानों उन्होंने किसी मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मार दिया हो। इसके बाद जिस प्रकार से प्रतिक्रियाएं आईं वो मधुमक्खियों की भिनभिनाहट से कम नहीं थीं। ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर विपक्ष की प्रतिक्रिया तीखी रही। कुछ नेताओं ने इसे सरकार की आलोचना करने वालों को बदनाम करने का प्रयास बताया तो कुछ ने व्यंग्य करते हुए स्वयं को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताया।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। सरकार की आलोचना करना नक्सलवाद नहीं है। लोकतंत्र में असहमति हो सकती है। प्रश्न पूछना, नीतियों की आलोचना करना और सत्ता को कठघरे में खड़ा करना नागरिक अधिकार है, परंतु यदि कोई व्यक्ति हिंसक माओवादी विचारधारा को वैचारिक समर्थन देता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करता है और हिंसा को परिवर्तन का वैध रास्ता बताता है तो उसे केवल ‘असहमति’ कहकर बच निकलना भी उचित नहीं।
नक्सलवाद के विरुद्ध सुरक्षा बलों की कार्रवाई और उसके घटते प्रभाव की चर्चा के बीच प्रधान मंत्री ने उस संकट की ओर संकेत किया, जिसका चेहरा दिखाई नहीं देता। जंगल में बंदूक लेकर घूमता नक्सली पहचान में आ जाता है, किंतु वही विचार यदि शहरों, संस्थानों, सोशल मीडिया और बौद्धिक विमर्श के रास्ते समाज में प्रवेश करे तो उसे पहचानना कठिन हो जाता है।
असल में नक्सलवाद की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बंदूक नहीं, उसका विचार है। बंदूक हाथ में आने से पहले विचार दिमाग में आता है। पहले यह समझाया जाता है कि व्यवस्था पूरी तरह अन्यायपूर्ण है, संविधान शोषण का उपकरण है, लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता की शत्रु हैं और हिंसक क्रांति ही परिवर्तन का रास्ता है। जब यह मानसिकता तैयार हो जाती है, तब जंगल में हथियार उठाने वालों को वैचारिक आधार मिलता है। लोकतांत्रिक व्यक्ति कहता है- व्यवस्था में कमी है, उसे सुधारो। नक्सली मानसिकता कहती है- व्यवस्था ही समाप्त करो।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए यह मानसिकता अत्यंत घातक है। यहां भाषा, जाति, क्षेत्र, धर्म, गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसी वास्तविक समस्याएं उपस्थित हैं। इन समस्याओं का समाधान विकास, न्याय, संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होना चाहिए, परंतु यदि इन्हीं समस्याओं को लगातार इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि पूरा राष्ट्र शोषक और नागरिक केवल पीड़ित दिखाई देने लगे तो असंतोष धीरे-धीरे राष्ट्र-विरोधी मानसिकता में बदल सकता है।
सोशल मीडिया ने इस संकट को और गम्भीर बना दिया है। पहले विचार फैलाने के लिए संगठन, पर्चे और मंच चाहिए थे, आज एक मोबाइल फोन और कुछ उत्तेजक पोस्ट काफी हैं। आधा सच, संदर्भ से काटा गया वीडियो, भावनात्मक नारा और लगातार दोहराया गया झूठ- ये सब मिलकर युवा मन को प्रभावित कर सकते हैं। बंदूकधारी नक्सली कदाचित् कुछ लोगों को हानि पहुचाएं, परंतु गलत विचार से प्रभावित हजारों युवा अपने ही देश और संस्थाओं से घृणा करने लगें तो हानि कहीं अधिक व्यापक होगा।
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इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ की बहस को केवल प्रधान मंत्री बनाम विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई बनाना असली संकट से आंखें मूंदना है। सरकार को सावधान रहना होगा कि हर आलोचक को नक्सली न कहा जाए। साथ ही विपक्ष और बौद्धिक वर्ग को भी उतनी ही स्पष्टता से कहना होगा कि लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा का समर्थन एक चीज नहीं है।
नक्सलवाद से लड़ाई केवल जंगल में नहीं, शिक्षा और विचार के क्षेत्र में भी लड़नी होगी। युवाओं को संविधान, लोकतंत्र, भारत के इतिहास और राष्ट्रीय दायित्व की समझ देनी होगी। उन्हें यह सिखाना होगा कि व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाना उनका अधिकार है, पर हिंसा को समाधान मानना नहीं।
साथ ही सरकार को उन वास्तविक समस्याओं को दूर करना होगा जिनसे असंतोष पैदा होता है। आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और न्याय सुनिश्चित होंगे तो उग्र विचारधाराओं के लिए जमीन भी कमजोर होगी। राष्ट्रवाद का अर्थ अपनी कमियों को छिपाना नहीं बल्कि उन्हें स्वीकार कर दूर करने का संकल्प है।
‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर राजनीति होती रहेगी। कोई इसे चेतावनी मानेगा, कोई राजनीतिक आक्रमण, परंतु भारत को शब्दों की इस बहस से ऊपर उठना होगा क्योंकि बंदूक से लड़ना आसान है, विचार से लड़ना कठिन।
इसलिए नक्सलवाद की लड़ाई का अंतिम चरण जंगल की सफाई नहीं, दिमाग की स्वतंत्रता है- ऐसी स्वतंत्रता जिसमें प्रश्न हों, असहमति हो, पर हिंसा का महिमामंडन न हो। आलोचना हो, परंतु राष्ट्र के विखंडन का स्वप्न न हो। परिवर्तन की आकांक्षा हो, पर विनाश को क्रांति का नाम न दिया जाए।
बंदूकें शांत हो रही हैं, ऐसे में अब उन विचारों को भी परास्त करना होगा, जो फिर किसी हाथ में बंदूक थमाने की तैयारी कर रहे हों।
