भारत को बचना होगा तालिबानी सोच से

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अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ अफगानिस्तान के लोग शरणार्थी बनकर जा सकते हैं। क्योंकि पाकिस्तान की हालत किसी से छुपी नही है और चीन सांस्कृतिक दृष्टि से और सीमाओं की दूरी की दृष्टि से अफगानिस्तान से इतना दूर है कि वहां जाना अफगानिस्तान के लोगों को नहीं सुहाएगा। ऐसे में उन्हें भारत आना ही सबसे आसान लगेगा।

आत्मनिर्भर भारत का सपना होगा पूरा – स्मृति ईरानी-(केन्द्रीय कपड़ा मंत्री)

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हमारे पारंपरिक उत्पाद जो है इसे आज बहुत बड़ा घरेलु बाजार भी मिल सकता है। धीरे-धीरे यह संवेदनशीलता हमारे देश में विकसित हो रही है। मैं आशावादी हूं चाहे वह मैन मेड फाइबर से बना हुआ कपड़ा हो अथवा कॉटन या फिर सिल्क से बना हुआ कपड़ा हो, उपभोक्ताओं की संकल्पना जैसे-जैसे हमारे देश में बढ़ेगी इसका फायदा जरूर होगा। प्रधानमंत्री मोदी जी का आत्मनिर्भर भारत बनाने का जो सपना है उसे पूर्ण करने के लिए जनता जनार्दन पूर्ण रूप से सहयोग देगी तो हम घरेलु बाजार को भी हमारे उत्पादन के लिए बहुत ही सशक्त होते हुए देख रहे हैं।

परमाणु हथियारों का ‘नो फर्स्ट यूज’

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भारत के अमेरिका और इजराइल से घनिष्ठ होते सम्बंधों को देख कर पाकिस्तान और चीन भारत से खार खाए बैठे हैं। चूंकि वैश्विक दबाव के चलते खुले आम भारत पर हमला करना संभव नहीं होगा; अत: वे आत्मघाती मानवी परमाणु बम का उपयोग करने में भी नहीं हिचकिचाएंगे। ‘अ

विरासत के आधार पर स्वतंत्र भारत का विकास

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स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में अगर हर भारतीय यह निश्चय कर ले कि वह अपनी हर कृति के केंद्र में अपने राष्ट्र को रखेगा, उस कृति का परिणाम अगर राष्ट्रहित में नहीं है तो वह कृति नहीं करेगा तो भारत को विकसित और सुखी राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता।

समन्वय व समरसता का महाकुंभ

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सिंधु दर्शन यात्रा इस वर्ष अपने 25 वर्ष पूर्ण कर रही है। अतः इसे सिंधु कुंभ के रूप में आयोजित किया जा रहा है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए इस बार सिंधु कुंभ में कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी होंगी। इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की है मु. रा. मं. के मार्गदर्शक तथा सिंधु दर्शन यात्रा के संस्थापक सदस्यों में से एक इन्द्रेश कुमार जी से। प्रस्तुत हैं उस चर्चा के प्रमुख अंश-

मूल संस्कृति से जोड़नेवाली – सिंधु दर्शन यात्रा

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अपनी पारमार्थिक उन्नति के लिए आध्यात्मिक यात्राएं करना जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है अपने देश की भौगोलिक संरचना, उसका इतिहास और अपनी संस्कृति को जानने के लिए यात्रा करना। सिंधु दर्शन यात्रा की गिनती इसी यात्रा के रूप में की जानी चाहिए और प्रत्येक भारतीय को इसका अंग बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

परिवर्तन के शिल्पकार

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अब परिवर्तन की गति भी तेज हो गई है। पहले जहां 10-15-20 सालों में परिवर्तन होते थे, वहीं आज हर दिन कुछ न कुछ नया देखने को मिलता है और अच्छी बात यह है कि अब भारतीय समाज का मानस भी परिवर्तनों को सहज स्वीकार करने का आदी होने लगा है। भारत ने परिवर्तन को स्वीकार करके उसके अनुरूप ढलना तो सीख लिया है। अब इसके आगे उसे स्वयं को परिवर्तित करके दुनिया के परिवर्तन का शिल्पकार बनने की ओर बढ़ना होगा।

मन की वैक्सीन

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कोरोना, लॉकडाउन, पहली लहर, दूसरी लहर, तीसरी लहर... पिछले लगभग एक साल से बस यही शब्द सुनाई दे रहे हैं। कोरोना न हुआ मानो रक्तबीज राक्षस हो गया जिसका हर स्ट्रेन पहले से अधिक खतरनाक और संदिग्ध है। अब तो कोरोना के बाद होने वाले ब्लैक फंगस तथा व्हाइट फंगस ने सभी की नींद उडा रखी है। ब्लैक फंगस शरीर के सबसे कमजोर हिस्से पर वार करता है और उसे इतना प्रभावित कर देता है कि वह अंग ही शरीर से अलग करना पडता है।

नवोन्मेष की प्रत्यक्ष मिसाल आबा साहब पटवारी

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आबा साहब संघ स्वयंसेवक थे। समाज से हर वर्ग से जुड़े रहना ही उनके जीवन का सार था। ‘संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो, भला हो जिसमें देश का वो काम सब किए चलो।’ इस संघगीत को आबा साहब ने अपने जीवन में उतार लिया था। वे सदैव इसी मार्ग पर चले।

इतनी मौतों का दोषी कौन?

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देश में कोरोना पीड़ित लोगों के, संक्रमित लोगों के और मृत्यु के आंकड़े दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इन आंकड़ों के अलावा और भयावह स्थिति तो तब उत्पन्न होती है जब अपने आस-पास के लोगों की रोज मिलने वाली मृत्यु की खबरें सुनाई देती हैं। समाचारों में यह दिखाया जाता कि किस प्रकार एक ही चिता पर तीन-चार शवों का एक ही साथ अंतिम संस्कार किया जा रहा है। मरने वाले व्यक्ति के अंतिम दर्शन करना भी परिवार के सभी लोगों के लिए मुमकिन नहीं हो रहा है। दिल दहला देने वाली इतनी भयावह परिस्थिति उत्पन्न हुई कैसे? कोरोना पीड़ितों का और मृत्यु का आंकड़ा इतना बढ़ा कैसे? समाज के रूप में हमसे कहां चूक हो गई?

मानवीय असंवेदनाओं की होम डिलीवरी

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हाल ही में बंगलुरु में हुई घटना ने ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस पूरी प्रक्रिया में किसकी कितनी गलती थी, यह तो जांच के बाद पता चलेगा ही; परंतु दो अनजान व्यक्तियों के बीच कुछ ही पलों में हाथापाई की नौबत आ जाए यह समाज के किस पहलू की ओर इशारा कर रहा है? भारतीय समाज में यह किस प्रकार की संस्कृति शामिल होती दिखाई दे रही है?

हंसी को हंसी में मत टालिए

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क्या खूब लिखा है निदा फाजली ने इस शायरी में। वैसे बच्चों को हंसाना कोई बड़ी बात नहीं है। बच्चों का मन इतना साफ होता है कि वे पिछली सारी बातों को भूलकर तुरंत मुस्कुराने लगते हैं।

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