| जैसी करनी वैसी भरनी’ फिल्म में बुजुर्गों की अवस्था का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया गया है। पैसा बहुत कमा लिया और बहुत कमा भी लेंगे, परंतु यदि आज आपने बुजुर्गों के साथ मिलबैठकर बात करने का समय गंवा दिया तो फिर ये दिन वापस नहीं आएंगे। |
आज की भागदौड़ भरे जीवन में हम इतने उलझ गए हैं कि स्वयं के लिए दो पल निकालना भी कठिन हो गया है। इस अंधी दौड़ में हम धीरे-धीरे स्वयं को ही खो रहे हैं। हम और हमारे अपने कौन हैं, जिन रिश्तों को गढ़ा है उनका महत्व क्या है? रिश्ते और भावनाएं अब प्राथमिकता की सूची से बाहर हो चुके हैं।
इसी दौड़ में सबसे पहले हम उन्हें भूलते हैं, जिन्होंने हमें दौड़ना सिखाया था, हमारे माता-पिता। जिन हाथों ने कभी हमें चलना सिखाया, वो हाथ अब कांपने लगे हैं और वो अब हमारी बाट जोह रहे हैं। अब इन कांपने वाले हाथों को एक सहारा चाहिए एक बच्चे की तरह।
बूढ़े अब बच्चे बन गए हैं, उन्हें आवश्यकता है मजबूत हाथों की। एक बच्चा तभी अनाथ कहलाता था, जब उसके सिर से माता-पिता का साया उठ जाता था, पर आज परिस्थितियां इतने बदल गए हैं कि कई माता-पिता अपने जीते-जागते सुशिक्षित, कमाते-खाते बच्चों के होते हुए भी अनाथ जैसा जीवन जी रहे हैं। अंतर बस इतना है, पहले वाला अनाथपन नियति देती थी और यह वाला अनाथपन हम स्वयं अपने ही हाथों से गढ़ रहे हैं।
एक बूढ़ी मां हर शाम बेटे की भेजी वीडियो कॉल का स्क्रीनशॉट निकालकर देखती है, जैसे उसी धुंधली तस्वीर में उसका बेटा कैद हो। एक पिता पड़ोसी से मुस्कुराकर कहता है, बेटे ने पैसे भेज दिए हैं, पर आवाज की एक दरार से झलक जाता है कि बस दो घड़ी बैठकर बात करने वाला अब कोई नहीं है। यह वाक्य जितना सामान्य लगता है, उतना ही गहरा चुभता भी है। पैसा पहुंच रहा है, पर प्यार रास्ता भटक गया है। एक दादा हर शाम गेट की ओर टकटकी लगाए देखता है, इस आशा में कि कदाचित् आज पोता आ जाए। यह प्रतीक्षा कभी समाप्त नहीं होती, बस हर शाम फिर से टल जाती है।
यह अकेलापन सिर्फ महसूस करने भर की बात नहीं रह गई, अब यह आंकड़ों में भी साफ दिखने लगा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सामाजिक जुड़ाव आयोग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर छठा मानव किसी न किसी रूप में अकेलेपन से जूझ रहा है और यह अकेलापन हर वर्ष लाखों असमय मौतों से जुड़ा पाया गया है। बुजुर्गों की बात करें तो शोध बताते हैं कि दुनियाभर में करीब हर चौथा बुजुर्ग स्वयं को अकेला महसूस करता है और कुछ अध्ययनों के अनुसार 20 से 40 प्रतिशत तक बुजुर्ग गम्भीर अकेलेपन का सामना करते हैं, चाहे वे अमीर देशों में हों या विकासशील देशों में, भारत भी इससे अछूता नहीं। यहां बुजुर्गों की जनसंख्या पहले ही साढ़े तेरह करोड़ के आसपास है और आने वाले दशकों में यह लगभग दोगुनी होने वाली है। आकड़े बताते है कि शहरी क्षेत्रों में हर पांचवां और गांवों में हर दसवां बुजुर्ग अकेले रहते पाए गए हैं। यह सिर्फ आंकड़े नहीं, बदलते समाज की चेतावनी हैं और यह चेतावनी केवल हमारे घरों की नहीं है, दुनिया के हर कोने से आ रही है।
पश्चिम में जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जाती है, वहां बच्चों का माता-पिता से अलग बसना पहले से ही जीवनशैली का हिस्सा रहा है। भारत में यह बदलाव अपेक्षाकृत नया है, इसलिए इसकी चुभन भी नई और गहरी है, किंतु दोनों जगह परिणाम एक जैसा दिखता है, बुढ़ापे में अकेलापन। किसी एक संस्कृति को श्रेष्ठ या निम्न कहना उचित नहीं, पर इतना अवश्य है कि आर्थिक प्रगति चाहे कितनी भी हो जाए, बुजुर्गों का अकेलापन आज एक वैश्विक मानवीय संकट बनता जा रहा है। यही वह जगह है जहां हमें अपनी जड़ों की ओर, अपनी पारिवारिक व्यवस्था की ओर मुड़कर देखने की आवश्यकता महसूस होती है।
भारतीय परिवार व्यवस्था में बुजुर्ग कभी सिर्फ घर के बड़े सदस्य नहीं रहे, वे परिवार के वटवृक्ष रहे हैं, जिनकी छांव में कई पीढ़ियां एक साथ पनपती थीं। यदि संयुक्त परिवार एक बगिया है तो बुजुर्ग उस बगिया के माली रहे हैं, रिश्तों को सींचने वाले, परम्पराओं को आगे बढ़ाने वाले और संकट के समय परिवार को थामे रखने वाले। मातृ देवो भव, पितृ देवो भव जैसे मूल्य केवल धार्मिक उद्घोष नहीं थे, ये सेवा, सम्मान, त्याग और पारिवारिक कर्तव्य की एक पूरी व्यवस्था थे। एक ऐसी सामाजिक सुरक्षा जिसमें कोई बुजुर्ग अकेला नहीं पड़ता था क्योंकि परिवार ही उसका सबसे बड़ा सहारा होता था।

जिन बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी की गोद का सुख मिलता है, वे सच में भाग्यशाली होते हैं। यह सिर्फ लाड़-प्यार का रिश्ता नहीं बल्कि संस्कारों, कहानियों और अनुभवों की एक जीवंत पाठशाला है। दादी की लोरी में जो सुरक्षा का एहसास होता है, वह किसी पुस्तक में नहीं मिलता।
फिर प्रश्न उठता है, यह सब बदला कैसे? हर व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी चीज के पीछे भाग रहा है, पढ़ाई, नौकरी, बच्चो की देखभाल और बदलती जीवनशैली ने परिवार की बनावट बदल दी है। एकल परिवार अपने आप में गलत नहीं है, यह एक व्यावहारिक आवश्यकता भी हो सकती है, किंतु समस्या तब शुरू होती है जब सुविधा के साथ-साथ संवेदना भी सिकुड़ने लगती है और बुजुर्ग परिवार के केंद्र से हटकर हाशिए पर चले जाते हैं। दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं रह गई, अब वह भावनात्मक भी हो गई है। बच्चे शहर या विदेश में बस गए, फोन और वीडियो कॉल का दौर आया, परंतु क्या स्क्रीन पर दिखता चेहरा कभी सामने बैठकर की गई बात, एक हाथ का स्पर्श या साथ बैठकर खाई गई थाली की जगह ले सकता है?
एक चुनौती वह भी है जो प्राय: दिखती नहीं क्योंकि बुजुर्ग उसे बोलना नहीं सीखते। यह चुप्पी सबसे ज्यादा घातक होती है क्योंकि इसमें सहायता मांगने की सम्भावना ही नहीं बचती।
हाल में हुई एक घटना ने हमे अंदर तक झकझोर दिया है, एक पिता की अंतिम विदाई के समय उनकी तीन बेटियां स्वयं वहां उपस्थित नहीं थीं, उन्होंने वीडियो कॉल के द्वारा अंतिम संस्कार की प्रक्रिया देख ली, मानो इतने भर से अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली गई हो। यह किसी एक परिवार पर उंगली उठाने की बात नहीं बल्कि एक गम्भीर प्रश्न की ओर संकेत है। तकनीक ने दूरियां कम की हैं, यह सच है, पर क्या उसने भावनाओं की दूरी भी उतनी ही कम की है? आखिर वे संस्कार जाते कहां हैं, जो हमें सिखाए तो जाते हैं, पर निभाए नहीं जाते? यह कदाचित् अपवाद हो, पूरे समाज की तस्वीर नहीं, पर एक अपवाद भी जब इतना गहरा हो तो वह पूरे समाज के लिए एक असहनीय प्रश्न बन जाता है।
आज आवश्यकता है बच्चों को ये संस्कार सिखाना कि बुजुर्ग हमारे परिवार की नींव है, बुजुर्गों को घर के निर्णयों और दैनिक जीवन में शामिल करना, बच्चों को दादा-दादी के साथ समय बिताने की आदत डालना, दूर रहकर भी नियमित फोन के साथ-साथ मिलने को प्राथमिकता देना और सबसे आवश्यक बुजुर्गों को केवल दायित्व नहीं बल्कि विरासत मानना। पिता और दादाओं से भी सिर्फ हालचाल नहीं, दिल का हाल पूछना आवश्यक है क्योंकि जो स्वयं कभी नहीं कहते कि वे अकेले हैं, उन्हें सबसे पहले पूछे जाने की आवश्यकता होती है। बच्चों को सिर्फ सफल बनाना काफी नहीं, उन्हें संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ बनाना भी उतना ही आवश्यक है। उन्हें इस बात का एहसास कराए कि आप हमेशा उनके लिए, उनके साथ खड़े है ताकि बच्चों के होते हुए उन्हें अनाथ जैसा महसूस ना हो।
डॉ. सुनिधि मिश्रा
