भारतीय परंपरा में वस्त्र वैशिष्ट्य

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भारतीय परिवेश और परंपरा में वस्त्रों के रंग और पहनावे की विभिन्न शैलियां ही नहीं है अपितु वस्त्रों के धागे, वह किस तंतु से निर्मित हैं, और किस अवस्था में किस ऋतु में कौन से धागे या तंतु के कपड़े पहने हैं यह भी एक महत्वपूर्ण विषय है। जैसे गर्मी के समय में रेशमी वस्त्रों को धारण नहीं किया जाता। कपास से निर्मित वस्त्रों और ऊनी वस्त्रों को प्रयोग में नहीं लाते, वहीं सर्दियों में नेट के वस्त्र नहीं पहने जा सकते।

मैं हूं भारत का ‘परिधान’

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मेरे विविध प्रकारों के बारे में मैं जितना बताऊं उतना कम है, लेकिन एक बात का आनंद अवश्य है, कि जब भी कोई भारत के बाहर से भारत आता है, तो मेरे विविध प्रकारों को देखकर खुश हो जाता है। भारत के बाहर कपड़े और हैंडलूम के इतने प्रकार कहीं भी आपको देखने को नहीं मिलेंगे। ये यहां के कलाकारों की मेहनत, बुनकरों की लगन और कपास उगाने वाले किसानों की दृढ़ इच्छा ही है, जो आज भारत में हर एक गांव हर एक क्षेत्र में पहनावे की विविधता मिलती है।

स्वातंत्र्योत्तर काल का फैशन

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भारतीय पोशाक अपने पारंपरिक तरीके और धरोहर से जुड़ाव के लिए जाने जाते है। पारंपरिक भारतीय डिज़ाइन अधिकतर प्रकृति से जुडे होते हैं। भारतीय पोशाक आरामदायक होने के साथ ही देखने में सुंदर और राजसी होते है।

भारतीय संस्कृति में वेशभूषा का महत्व

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भारत संभवत: दुनिया के उन शुरुआती गिने-चुने देशों में से है, जहां कपास का उपयोग सबसे पहले किया गया था। कपास का नाम भी भारत से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ, जैसे- संस्कृत में ‘कर्पस’, हिन्दी में कपास’, हिब्रू में ‘कापस’, यूनानी तथा लैटिन भाषा में ‘कार्पोसस’ आदि। अत: यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि हर तरह के परिधानों का आविष्कार भारत में ही हुआ है।

दशहरा: क्षात्रतेज जागृत करने का पर्व

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दशहरे के दिन शस्त्र पूजन का एक और उद्देश्य है जनमानस में क्षात्रतेज को जागृत करना। यह क्षात्रतेज ही संकट की घडी में व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने का कार्य करता है।

सभी को साथ लेकर चलना है भारतीय संस्कृति- डॉ मनमोहन वैद्य

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हरियाणा के रोहतक में आयोजित एक वेबिनार को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह कार्यवाह डॉ मनमोहन वैद्य ने कहा कि हरियाणा के युवकों के लिए कृषि लघु प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए, जिससे कृषि के नचारी शोधों का उपयोग किसान के विकास के लिए किया…

श्रद्धा और भक्ति का त्यौहार ‘नवरात्र’

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भारतीय संस्कृति में तीन प्रकार की नवरात्रियाँ मनाई जाती हैं। चैत्र महीने में राम की, क्वार मास में देवी मां की और अगहन महीने में खंडोबा की नवरात्रि मनाई जाती है। आदिमाया ने दानवों की पीड़ा से मानव की मुक्ति कराने के लिए मां देवी ने नौ दिन सतत युद्ध किया था। सूर्यास्त…

पद्मनाभस्वामी मंदिर फैसले के दूरगामी परिणाम

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केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का स्वामित्व पूर्ववर्ती शाही परिवार को सौंपने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। इससे विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा हिन्दू मंदिरों और उनके मठों पर नियंत्रण को जो साजिश हो रही थी, उस पर अंकुश लगेगा।

बंदउ गुरु पद कंज

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गुरु वह प्रज्ञावान, ज्ञानवान महापुरुष और श्रेष्ठ मानव होता है जो अपने ज्ञान का अभीसिंचन करके व्यक्ति में जीवन जीने तथा अपने कर्तव्य को पूरा करने में उसकी सुप्त प्रतिभा और प्रज्ञा का जागरण करता है।

गुरु बिन भ्रम ना जासी

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गुरु के सत्संग के प्रहार से व्यक्ति के जीवन में प्रकाश आता है। लेकिन वर्तमान में शिक्षा और अध्यात्म व्यापार बन गया है, ऐसे में नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने वाले गुरुओं की तलाश करना हमारे लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। सच्चे गुरु की आज भी उतनी ही दरकार है, जितनी पहले थी।

बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता

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बुद्ध पूर्णिमा का महत्व महात्मा बुद्ध के जीवन की तीन महत्व पूर्ण घटनाओ के साथ जुड़ा हुआ हे, पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध के जन्म का होना, उनकाज्ञान प्राप्त करना और उनकीम्रत्यु का होना I बुद्ध कोएक ही दिन जन्म ,ज्ञानऔर म्रत्यु का होना बुद्ध पूर्णिमा के साथ जुडी हुई महत्व पूर्ण घटनाये है I

समृद्धि की लोकमाता हैं लक्ष्मी

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लक्ष्मी की पूजा में उस अनजानी स्त्री की महिमा और समन्वय का गुणगाण है, जो एक अज्ञात घर में आकर उसे अपने संस्कार और समर्पण से संवारती है। हम सब जानते हैं कि लक्ष्मी का प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ है। क्षीर-सागर के इस मंथन से जब समुद्र में पड़े अनेक तत्वों का आलोड़न और इस रस का संचार नाना रूपों में

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