केसरिया झंडे को ही संघ ने सर्वोच्च स्थान क्यों दिया?

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भगवा ध्वज हिंदुओं को त्याग, बलिदान, शौर्य, देशभक्ति आदि की प्रेरणा देने में सदैव सक्षम रहा है। यह ध्वज हिंदू समाज के सतत संघर्षों और विजयश्री का साक्षी रहा है। ‘भगवा ध्वज’ के बिना हम हिंदू संस्कृति, हिंदू राष्ट्र और हिंदू धर्म की कल्पना नहीं कर सकते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के…

राष्ट्रीय एकात्मता की सिंधु दर्शन यात्रा

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सिंधु नदी के तट पर सिंधु उत्सव मनाने और सिंधु दर्शन यात्रा करने वाले भारतीय भी अपने मूल से परिचित हों और लेह में दर्शन के लिए आएं जिससे वे अपने समृद्ध, अमूल्य एंव गौरवशाली प्राचीन धरोहर का सम्मान करें तथा गर्व से विश्व में अपना शीश ऊंचा रख सकें।

समन्वय व समरसता का महाकुंभ

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सिंधु दर्शन यात्रा इस वर्ष अपने 25 वर्ष पूर्ण कर रही है। अतः इसे सिंधु कुंभ के रूप में आयोजित किया जा रहा है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए इस बार सिंधु कुंभ में कुछ विशेष व्यवस्थाएं भी होंगी। इन्हीं मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की है मु. रा. मं. के मार्गदर्शक तथा सिंधु दर्शन यात्रा के संस्थापक सदस्यों में से एक इन्द्रेश कुमार जी से। प्रस्तुत हैं उस चर्चा के प्रमुख अंश-

मूल संस्कृति से जोड़नेवाली – सिंधु दर्शन यात्रा

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अपनी पारमार्थिक उन्नति के लिए आध्यात्मिक यात्राएं करना जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है अपने देश की भौगोलिक संरचना, उसका इतिहास और अपनी संस्कृति को जानने के लिए यात्रा करना। सिंधु दर्शन यात्रा की गिनती इसी यात्रा के रूप में की जानी चाहिए और प्रत्येक भारतीय को इसका अंग बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

होली के रंग बापू के संग

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‘मुझे अपने आप पर  गुस्सा आने लगा कि मैंने गांधीजी को भारत की वास्तविकता बता दी। वे होली के रंग देखना चाहते थे, मैंने बदरंग दिखा दिए परन्तु मैं भी क्या करता?”

नेताजी की होली..

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होली तो नेताओं का प्रिय त्योहार होता है जैसे गब्बर का हुआ करता था। नेताजी बोले, देखिए! हमारी यह पॉलिसी है कि हम किसी बाहरी आदमी के समक्ष अपने सीनियर का नाम अपनी ज़ुबान पर नहीं लाते। अतः गब्बर की बात मत करिए।

महाकाल की महाशिवरात्रि

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महाशिवरात्रि को पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध कुछ ऐसी स्थिति में होता है कि मानव में आध्यात्मिक ऊर्जा सहज ही ऊपर की ओर उठती है इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने पूरी रात जागरण कर उत्सव मनाने की प्रथा-परंपरा स्थापित की।

आस्था व भक्ति का कुंभ हरिद्वार

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हरिद्वार में आयोजित होने वाला कुंभ का मेला उत्तराखंड राज्य का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है। जो कि यहां के गंगा घाट पर 14 जनवरी मकर संक्रांति से चल रहा है। हरिद्वार कुंभ इतना अधिक प्राचीन है कि उसका सर्वप्रथम वर्णन सन 1850 के इंपीरियल गजैटियर में मिलता है। इस मेले में इस समय न केवल अपने देश के अपितु विदेशों तक के हर एक कोने से विभिन्न धर्म-जाति व संप्रदाय के असंख्य संत-महात्माओं, धर्मगुरुओं एवं भक्तों-श्रद्धालुओं का रेला उमड़ा हुआ है।

कश्मीरी पंडितों का पलायन : आखिर पंडितों को ही क्यों बनाया गया निशाना

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आज से करीब तीन दशक पहले कश्मीरी पंडितों ने अपनी इज़्ज़त और सम्मान को बचाने के लिए कश्मीर छोड़ दिया था। इन तीन दशकों में वैसे तो बहुत कुछ बदल गया। यह बदलाव ना सिर्फ देश में आया बल्कि कश्मीर में भी देखने को मिला। जम्मू कश्मीर से लद्धाख को…

भारतीय परंपरा में वस्त्र वैशिष्ट्य

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भारतीय परिवेश और परंपरा में वस्त्रों के रंग और पहनावे की विभिन्न शैलियां ही नहीं है अपितु वस्त्रों के धागे, वह किस तंतु से निर्मित हैं, और किस अवस्था में किस ऋतु में कौन से धागे या तंतु के कपड़े पहने हैं यह भी एक महत्वपूर्ण विषय है। जैसे गर्मी के समय में रेशमी वस्त्रों को धारण नहीं किया जाता। कपास से निर्मित वस्त्रों और ऊनी वस्त्रों को प्रयोग में नहीं लाते, वहीं सर्दियों में नेट के वस्त्र नहीं पहने जा सकते।

मैं हूं भारत का ‘परिधान’

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मेरे विविध प्रकारों के बारे में मैं जितना बताऊं उतना कम है, लेकिन एक बात का आनंद अवश्य है, कि जब भी कोई भारत के बाहर से भारत आता है, तो मेरे विविध प्रकारों को देखकर खुश हो जाता है। भारत के बाहर कपड़े और हैंडलूम के इतने प्रकार कहीं भी आपको देखने को नहीं मिलेंगे। ये यहां के कलाकारों की मेहनत, बुनकरों की लगन और कपास उगाने वाले किसानों की दृढ़ इच्छा ही है, जो आज भारत में हर एक गांव हर एक क्षेत्र में पहनावे की विविधता मिलती है।

स्वातंत्र्योत्तर काल का फैशन

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भारतीय पोशाक अपने पारंपरिक तरीके और धरोहर से जुड़ाव के लिए जाने जाते है। पारंपरिक भारतीय डिज़ाइन अधिकतर प्रकृति से जुडे होते हैं। भारतीय पोशाक आरामदायक होने के साथ ही देखने में सुंदर और राजसी होते है।

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