भारत में दुर्गा (शक्ति) पूजा के विविध स्वरूप

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शाक्त परम्पराओं के लिए देवी की शक्ति के रूप में उपासना एक आम पद्धति थी। शक्ति का अर्थ किसी का बल हो सकता है, किसी कार्य को करने की क्षमता भी हो सकती है। ये प्रकृति की सृजन और विनाश के रूप में स्वयं को जब दर्शाती है, तब ये शक्ति केवल शब्द नहीं देवी है। सामान्यतः दक्षिण भारत में ये श्री (लक्ष्मी) के रूप में और उत्तर भारत में चंडी (काली) के रूप में पूजित हैं। अपने अपने क्षेत्र की परम्पराओं के अनुसार इनकी उपासना के दो मुख्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं। ललिता सहस्त्रनाम जहाँ दक्षिण में अधिक पाया जाता है, उतर में दुर्गा सप्तशती (या चंडी पाठ) ज्यादा दिखता है।

विश्वकर्मा: अखिल विश्व के कर्ताधर्ता

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हे सुव्रत ! सुनिए, शिल्पकर्म (इसमें हजार से अधिक प्रकार के अभियांत्रिकी और उत्पादन कर्म आएंगे) निश्चित ही लोकों का उपकार करने वाला है। शारीरिक श्रमपूर्वक धनार्जन करना पुण्य कहा जाता है। उसका उल्लंघन करना ही पाप है, अर्थात् बिना परिश्रम किये भोजन करना ही पाप है। यह व्यवस्था सामान्य है, विशेष में यही है कि धर्मशास्त्र की आज्ञानुसार किये गए कर्म का फल पुण्य है और इसके विपरीत किये गए कर्म का फल पाप है। यही कारण है कि संत रैदास को नानाविध भय और प्रलोभन दिए जाने पर भी उन्होंने धर्मपरायणता नहीं छोड़ी, अपितु धर्मनिष्ठ बने रहे। लेखक ने जो पुस्तक की समीक्षा लिखी है वह अत्यंत तार्किक और गहन तुलनात्मक शोध का परिणाम है जिसका दूरगामी प्रभाव होगा। उचित मार्गदर्शन के अभाव में, धनलोलुपता में अथवा आर्ष ग्रंथों को न समझने के कारण आज के अभिनव नव बौद्ध और मूर्खजन की स्थिति और भी चिंतनीय है। वामपंथ और ईसाईयत में घोर शत्रुता रही, अंबेडकर इस्लाम के कटु आलोचक रहे और साथ इस इस्लाम और ईसाइयों के रक्तरंजित युद्ध अनेकों बार हुए हैं, किन्तु वामपंथ, ईसाईयत, इस्लाम एवं शास्त्रविषयक अज्ञानता, ये चारों आज एक साथ सनातनी सिद्धांतों के विरुद्ध खड़े हो गए हैं। 

विश्‍वकर्मा और उनके शास्‍त्र

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उत्तरबौद्धकाल से ही शिल्‍पकारों के लिए वर्धकी या वढ्ढकी संज्ञा का प्रयोग होता आया है। 'मिलिन्‍दपन्‍हो' में वर्णित शिल्‍पों में वढ्ढकी के योगदान और कामकाज की सुंदर चर्चा आई है जो नक्‍शा बनाकर नगर नियोजन का कार्य करते थे। यह बहुत प्रामाणिक संदर्भ है, इसी के आसपास सौंदरानंद महाकाव्य, हरिवंश (महाभारत खिल) आदि में भी अष्‍टाष्‍टपद यानी चौंसठपद वास्‍तु पूर्वक कपिलवस्‍तु और द्वारका के न्‍यास का संदर्भ आया है। हरिवंश, ब्रह्मवैवर्त, मत्स्य आदि पुराणों में वास्‍तु के देवता के रूप में विश्‍वकर्मा का स्‍मरण किया गया है...।

निर्माण एवं सृजन के देवता भगवान विश्वकर्मा

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विश्वकर्मा एक आदर्श  एवं उच्चकोटि के शिल्पी ही नहीं वरन आदि अभियंता हैं। वास्तु तथा स्थापत्य शास्त्र गुणी हैं तथा वास्तुशास्त्र ग्रन्थ के रचयिता  माने जाते हैं। वास्तुकला को एक शास्त्र के रूप में प्रस्तुत करने वाला यह विश्व का पहला ग्रंथ है। उनका नवनिर्माण कार्य एवं सशोधन  केवल वास्तुकला या शिल्प शास्त्र तक ही सीमित नहीं था वे  शस्त्र शास़्त्र तथा विमानन के भी जनक थे।उनके द्वारा निर्मित  प्रसिद्ध पुष्पक विमान की विशेषता थी कि वह भूतल पर जल में और आकाश  मार्ग से सामान रूप से भ्रमण कर सकता था। विश्व  इतिहास में भगवान विश्वकर्मा ही एकमात्र ऐसे महापुरूष हैं जो ललित एवं सांस्कृतिक कलाओं के ज्ञाता एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सृजनकर्ता दोनों हैं । कहा गया है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही माँ लक्ष्मी जी को अलंकारों से विभूषित है । त्रेता युग से महाभारत काल तक जितने भी नवनिर्माण हुए सभी के सभी भगवान विश्वकर्मा के द्वारा ही सम्पन्न कराये गये। 

अमृत महोत्सव वर्ष में हिंदी का वैभव

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पिछले कुछ वर्षों में हिंदी ने अन्य बड़ी वैश्विक भाषाओं की तुलना में अधिक तीव्रता से अपना विस्तार किया है परंतु अभी भी मौलिक कार्यों की कमी है जिसे पूरा किया जाना अति आवश्यक हो जाता है। इसके लिए भारत सरकार को बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और शोध करवाना चाहिए ताकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं वैश्विक स्तर पर वह ऊंचाई छू सकें जो अंगे्रजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं को प्राप्त है।

क्या हो तकनीकी हिंदी का भविष्य

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हम खुशफहमी में जीने वाले लोग हैं इसलिए तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के बढ़ाव को लेकर अति प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन हमें पता होना चाहिए कि हिंदी और हिंदी भाषी अंतरराष्ट्रीय बाजार में केवल उपभोक्ता मात्र बनकर रह गए हैं जबकि हमें उत्पादक बनने की आवश्यकता है ताकि हमारी अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी वैश्विक स्तर पर रास्ता खुल सके।

सनातन धर्म का योद्धा और रक्षक “ब्राह्मण”

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क ब्राह्मण ही है जिस पर सारे हमले पहले हुए मुगलों ने पहला आक्रमण मंदिरों और पुजारियों पर किया अंग्रेजों ने पहला आक्रमण मंदिर और पुजारियों पर किया कांग्रेस वामपंथियों ने ब्राह्मणवाद के नाम पर पहला हमला ब्राह्मणों पर किया चर्च मिशनरियों ने पहला हमला ब्राह्मणों पर किया हजार साल के क्रूर इस्लामिक शासनकाल में भी ब्राह्मण ने अपनी सनातनी पोथी नहीं छोड़ी बल्कि तलवार की धार पर चलकर भी अपने हिंदू समाज को सनातन की जड़ों से जोड़े रखा,  हरगांव का पुजारी पूज्य है अनपढ़ पुजारी ने भी गांव के छोटे से मंदिर में सनातन की परंपराओं को जिंदा रखा और गांव को तीज त्योहारों के माध्यम से सनातन जीवन पद्धति से जोड़े रखा, यही कारण है कि यूनान रोम और मिश्र 100 साल के आक्रमण में ही अपनी सभ्यता खो बैठे लेकिन एक सनातन भारत है जो हजार साल के आक्रमण काल के बावजूद अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाने मैं सफल रहा क्योंकि उसके पास सनातन को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक उसी रूप में पहुंचाने वाले ब्राह्मण थे।

भारती पत्रिका के संस्थापक : दादा भाई

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आज सब ओर अंग्रेजीकरण का वातावरण है। संस्कृत को मृत भाषा माना जाता है। ऐसे में श्री गिरिराज शास्त्री (दादा भाई) ने संस्कृत की मासिक पत्रिका ‘भारती’ का कुशल संचालन कर लोगों को एक नयी राह दिखाई है। दादा भाई का जन्म नौ सितम्बर, 1919 (अनंत चतुर्दशी) को राजस्थान के भरतपुर जिले के कामां नगर में आचार्य आनंदीलाल और श्रीमती चंद्राबाई के घर में हुआ था। इनके पूर्वज राजवैद्य थे। कक्षा छह के बाद दादा भाई ने संस्कृत की प्रवेशिका, उपाध्याय तथा शास्त्री उपाधियां ली। यजुर्वेद का विशेष अध्ययन करते हुए उन्होंने इंटरमीडियेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। स्वस्थ व सुडौल शरीर होने के कारण लोग इन्हें पहलवान भी कहते थे। 13 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया था। शिक्षा पूर्णकर वे जयपुर के रथखाना विद्यालय में संस्कृत पढ़ाने लगे। 1942 में वे जयपुर में ही स्वयंसेवक बने। व्यायाम के शौकीन दादाभाई को शाखा के खेल, सूर्यनमस्कार आदि बहुत अच्छे लगे और वे संघ में ही रम गये। इसके बाद उन्होंने 1943, 44 तथा 45 में तीनों संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।

दुनिया में केवल एक ही धर्म है और वह है “सनातन”

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रिलीजन या पंथ मजहब धर्म नहीं हैं। वे विश्वास हैं। रिलीजन या मजहब के विश्वासों पर प्रश्न संभव नहीं है। धर्म सत्य है। सत्य धर्म है। प्रश्न और जिज्ञासा सत्य प्राप्ति के महत्वपूर्ण उपकरण हैं। धर्म पालन में विवेकपूर्ण स्वतंत्रता है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति का निजधर्म भी है। समूह का भी धर्म है। राजधर्म है। राष्ट्रधर्म भी है। इनका सम्बंध आचार व्यवहार व आस्तिकता से है। सभी तत्वों का भी धर्म है - सबको धारण करना। धर्म मधुमयता है। वैदिक ऋषियों की सृजनशीलता का आलम्बन है मधु। वृहदारण्यक उपनिषद् (2-5-11) में कहते हैं, ‘‘धर्म सभी भूतों का मधु (सार) है। समस्त भूत धर्म के मधु हैं।‘‘ धर्म में संसार है, संसार में धर्म है। धर्म सम्पूर्ण जगत का दिव्य तत्व है। यह हिन्दुत्व है। हिन्दुत्व लोकमंगल का ध्येयसेवी है।

हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा 

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उत्तम शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम में चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को विकसित करने के विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से केवल मनुष्य की भौतिक उन्नति होती है, किन्तु औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होने चाहिए, जिससे नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। वर्तमान युग में मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिक उन्नति कर रहा है, त्यों-त्यों वह जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आपसी पारिवारिक संबंध टूटते जा रहे हैं। किसी को किसी की तनिक भी चिंता नहीं है। परिवार के वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है तथा बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिए जाते हैं। ग्रामों की पैतृक संपत्ति को बेचकर महानगरों में छोटे-छोटे आवासों में भौतिक सुख-सुविधा में जीने को ही मनुष्य ने जीवन की सफलता मान लिया है। यदि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना है, तो सबसे पहले वर्मान शिक्षा पद्धति में सुधार करना होगा।   

स्त्री शक्ति की मिसाल

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सनातन संस्कृति में नारी का स्थान सर्वोच्च होता है इसीलिए यहां ज्यादातर शक्तियां देवियों के पास निहित हैं। नारी को अपनी क्षमता का भान होना चाहिए और वह अपने अधिकारों के प्रति सजग रहे, तथा राष्ट्र के विकास में उसका योगदान भी बढ़े। यही देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का भी विचार है, जिसे उन्होंने स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर लाल किले की प्राचीर से व्यक्त किया।

बाढ़ बन सकती है वरदान

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नदियों को जोड़ने की बात स्वतंत्रता के बाद से ही हो रही है पर देश के ज्यादातर पर्यावरणविद् उससे होने वाली समस्याओं के प्रति भी आगाह करते हैं। इसलिए व्यापक स्तर पर प्राचीन तरीकों से जल संरक्षण किए जाने की आवश्यकता है ताकि बड़े बांधों की वजह से होने वाला नुकसान भी न हो और तालाबों इत्यादि को पुनर्जीवित कर  उनके आसपास हरियाली करके जल संरक्षण किया जा सके।

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