संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इसी उद्देश्य से हुई थी कि विश्व युद्ध जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके और अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा तथा सहयोग को संस्थागत आधार मिले। उस समय की वैश्विक शक्ति संरचना के अनुरूप सुरक्षा परिषद का गठन हुआ, जिसमें पाँच देशों को स्थायी सदस्य और वीटो अधिकार प्रदान किया गया। परंतु आठ दशकों बाद विश्व की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, सामरिक संतुलन और राजनीतिक वास्तविकताएँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की बढ़ती भूमिका के बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी संरचना लगभग वैसी ही बनी हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। 23 सितंबर 2026 को भारत की इस दावेदारी को एक नया कूटनीतिक बल मिला, जब यूरोप के विसेग्राद समूह के चार देशों पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य ने संयुक्त रूप से भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इसे ऐतिहासिक बैठक बताते हुए वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कहा।
यह समर्थन केवल औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि बदलती अंतरराष्ट्रीय राजनीति का संकेत भी है। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अवसर पर पहली बार भारत और विसेग्राद समूह के विदेश मंत्रियों की संयुक्त बैठक आयोजित हुई। इस बैठक में केवल सुरक्षा परिषद सुधार ही नहीं, बल्कि रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, शिक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और राजनीतिक सहयोग जैसे अनेक विषयों पर भी सहमति बनी। वार्षिक विदेश मंत्री बैठक और व्यापार मंच स्थापित करने का निर्णय दोनों पक्षों के संबंधों को दीर्घकालिक संस्थागत आधार प्रदान करता है।
विसेग्राद समूह यूरोप के मध्य भाग के चार प्रभावशाली देशों का क्षेत्रीय सहयोग मंच है। पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य यूरोपीय संघ तथा उत्तर अटलांटिक संधि संगठन दोनों के सदस्य हैं। यद्यपि इन देशों की जनसंख्या बहुत बड़ी नहीं है, फिर भी यूरोप की सुरक्षा, ऊर्जा नीति और क्षेत्रीय राजनीति में इनका पर्याप्त प्रभाव माना जाता है। ऐसे में इन चार देशों का एक साथ भारत के पक्ष में खड़ा होना यूरोप के भीतर भारत के लिए एक संगठित समर्थन का निर्माण करता है।
भारत की स्थायी सदस्यता की मांग कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद से भारत संयुक्त राष्ट्र का सक्रिय सदस्य रहा है और उसने शांति अभियानों में हजारों सैनिकों का योगदान दिया है। कोरिया, कांगो, लेबनान, दक्षिण सूडान, सोमालिया और अनेक संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में भारतीय शांति सैनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत 8 बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य भी रह चुका है और कुल मिलाकर लगभग 16 वर्षों तक परिषद में प्रतिनिधित्व कर चुका है। यह अनुभव भारत को वैश्विक सुरक्षा मामलों में एक जिम्मेदार सहभागी के रूप में स्थापित करता है।
भारत की दावेदारी के पीछे केवल जनसंख्या का तर्क नहीं है। आज भारत विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र है और विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास जैसे विषयों पर भारत लगातार रचनात्मक भूमिका निभा रहा है। वैश्विक दक्षिण के अनेक विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने में भी भारत सक्रिय रहा है। इसी कारण कई देश मानते हैं कि वर्तमान सुरक्षा परिषद विश्व की वास्तविक शक्ति संरचना का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती।
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सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना 15 सदस्यों वाली है, जिनमें 5 स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार है, जिसके कारण वे किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को रोक सकते हैं। यही व्यवस्था सबसे अधिक विवाद का विषय रही है। आलोचकों का मत है कि 1945 की परिस्थितियों में बनी यह संरचना आज के बहुध्रुवीय विश्व के अनुरूप नहीं रह गई है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे महाद्वीपों का कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं है, जबकि एशिया में केवल चीन स्थायी सदस्य है। इसलिए भारत सहित अनेक देशों ने परिषद के विस्तार की मांग की है।
भारत इस उद्देश्य से जर्मनी, जापान और ब्राजील के साथ जी4 समूह का सदस्य है। यह समूह परस्पर एक दूसरे की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है और संयुक्त राष्ट्र सुधार के पक्ष में अभियान चलाता है। इसके अतिरिक्त फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और रूस जैसे प्रभावशाली देशों ने भी विभिन्न अवसरों पर भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। यूरोप के चार नए समर्थकों के जुड़ने से भारत की कूटनीतिक स्थिति और अधिक मजबूत दिखाई देती है, क्योंकि अब यूरोप के भीतर भी समर्थन का दायरा व्यापक हो रहा है।
फिर भी यह समझना आवश्यक है कि समर्थन मिल जाना और स्थायी सदस्य बन जाना दोनों अलग बातें हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन किए बिना सुरक्षा परिषद का विस्तार संभव नहीं है। इसके लिए महासभा के दो तिहाई सदस्य देशों का समर्थन आवश्यक है और उसके बाद सभी पाँच वर्तमान स्थायी सदस्यों द्वारा संशोधन का अनुमोदन भी अनिवार्य है। यही वह सबसे कठिन चरण है जिसने पिछले कई दशकों से सुधार प्रक्रिया को धीमा बनाए रखा है।
सुधार प्रक्रिया में एक अन्य चुनौती क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा भी है। कुछ देशों का समूह परिषद में नए स्थायी सदस्यों के बजाय केवल अस्थायी सीटों के विस्तार का समर्थन करता है। पाकिस्तान भारत की दावेदारी का विरोध करता है, जबकि इटली और स्पेन जर्मनी के संबंध में अलग दृष्टिकोण रखते हैं। इसी प्रकार ब्राजील और जापान को लेकर भी क्षेत्रीय मतभेद मौजूद हैं। इन कारणों से व्यापक सहमति बनाना आसान नहीं रहा है।
यूरोप के चार देशों के समर्थन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे परिवर्तन को दर्शाता है। रूस और यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व में अस्थिरता, हिंद महासागर की सामरिक प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखलाओं की नई चुनौतियों ने विश्व राजनीति को बहुध्रुवीय दिशा दी है। ऐसे समय में यूरोप के अनेक देश भारत को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। विसेग्राद समूह के देशों ने भी भारत को हिंद प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक दक्षिण का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बताया है।
भारत की विदेश नीति में भी पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। पहले जहाँ भारत मुख्य रूप से गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण पर बल देता था, वहीं अब वह बहुस्तरीय साझेदारियों की नीति अपनाता है। अमेरिका, फ्रांस, जापान, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के देशों के साथ समानांतर संबंध विकसित करते हुए भारत ने अपने कूटनीतिक विकल्पों का विस्तार किया है। विसेग्राद समूह के साथ पहली औपचारिक विदेश मंत्री बैठक इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
इस समर्थन का आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत और मध्य यूरोप के देशों के बीच व्यापार, हरित ऊर्जा, विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की योजना बनी है। वार्षिक व्यापार मंच स्थापित होने से निवेश और औद्योगिक साझेदारी को नई गति मिल सकती है। इससे भारत की आर्थिक कूटनीति और राजनीतिक कूटनीति एक दूसरे की पूरक बनती दिखाई देती है।
सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का प्रश्न केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं है, बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी है। परिषद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, शांति अभियान, सैन्य हस्तक्षेप और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। ऐसे निर्णयों का प्रभाव विश्व के लगभग सभी देशों पर पड़ता है। यदि विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक आबादी और प्रमुख अर्थव्यवस्था को स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तो प्रतिनिधिक वैश्विक शासन की अवधारणा अधूरी प्रतीत होती है। यही तर्क भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रखता आया है।
हालाँकि यथार्थ यह भी है कि सुधार की राह अभी लंबी है। समर्थन बढ़ना सकारात्मक संकेत है, लेकिन अंतिम सफलता व्यापक वैश्विक सहमति, चार्टर संशोधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी। फिर भी यूरोप के चार देशों की यह संयुक्त घोषणा भारत की कूटनीतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।
इससे यह संदेश स्पष्ट होता है कि विश्व व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण, प्रतिनिधिक और संतुलित बनाने की मांग अब केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यूरोप के भीतर भी उसे नया समर्थन मिलने लगा है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, शांतिपूर्ण दृष्टिकोण और वैश्विक सहयोग की नीति के माध्यम से इस विश्वास को और मजबूत करे तथा भविष्य की विश्व व्यवस्था में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़े।
– महेन्द्र तिवारी

