वैश्विक विकास का समकालीन मॉडल मुख्य रूप से पश्चिमी औद्योगिक क्रांति, भौतिकवाद और व्यक्तिवाद की नींव पर खड़ा है, हालांकि इक्कीसवीं सदी में यह मॉडल पर्यावरण संकट, मानसिक अवसाद और सामाजिक सुरक्षा के आर्थिक असंतुलन जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) के अध्यक्ष और वरिष्ठ विचारक स्वामीनाथन गुरुमूर्ति का हालिया प्रतिपादन एक वैकल्पिक और टिकाऊ वैश्विक मॉडल प्रस्तुत करता है।
वस्तुत: प्राचीन भारतीय ज्ञान को सिर्फ अतीत का अवशेष मानना भारी भूल होगी, यदि जो इसे इस प्रकार से मानकर नकारने का प्रयास करते हैं, सच कहा जाए तो वे अपनी जड़ों को ही कमजोर कर रहे हैं। वास्तव में तो भारतीय ज्ञान अधुनातन है, वह वर्तमान और भविष्य का ज्ञान है, जोकि विज्ञान और सामाजिक सुरक्षा के स्तर पर संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम है।
ज्ञान का समाजशास्त्रीय रूपांतरण और मौखिक परंपरा
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसने ज्ञान का सृजन कर उसे समाज के अंतिम छोर तक सुरक्षित रखने के लिए संस्थागत तरीके विकसित किए। ऋषियों और विचारकों ने अमूर्त वैज्ञानिक समझ को लोक-संस्कृति, मौखिक परंपराओं और दैनिक सामाजिक प्रथाओं में रूपांतरित कर दिया, जिससे विज्ञान समाज का स्वभाव बन गया।
इस संदर्भ में गुरुमूर्ति कहते हैं, वर्तमान समय में जब संपूर्ण विश्व पश्चिमी आधुनिकता, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोक्तावाद के दुष्प्रभावों से जूझ रहा है, तब भारत का पारंपरिक ज्ञान ही वास्तव में वैश्विक भविष्य का एकमात्र संधारणीय (Sustainable) मार्गदर्शक हो सकता है। इस वैचारिक अधिष्ठान की पहली और सबसे महत्वपूर्ण स्थापना ज्ञान के सृजन से अधिक उसके सामाजिक संरक्षण और व्यावहारिक अनुप्रयोग से जुड़ी है।
गुरुमूर्ति जी ने अत्यंत तार्किक ढंग से स्पष्ट किया कि प्राचीन भारतीय सभ्यता की महानता केवल इस बात में नहीं थी कि उसने दर्शन, गणित और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में उच्च स्तरीय ज्ञान का सृजन किया, बल्कि उसकी वास्तविक विलक्षणता इस बात में थी कि उसने उस अमूर्त ज्ञान को जन-सामान्य के दैनिक जीवन, लोक-संस्कृति, मौखिक परंपराओं और सामाजिक संस्थाओं में रूपांतरित कर दिया।
जब ज्ञान केवल अकादमिक ग्रंथों या बंद कमरों तक सीमित रहता है, तो वह कालक्रम में नष्ट हो जाता है। परंतु, भारत के ऋषियों ने वैज्ञानिक समझ को सामाजिक प्रथाओं का अभिन्न अंग बना दिया, जिससे वह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी औपचारिक राजकीय संरक्षण के भी समाज के रक्त प्रवाह में जीवित रहा। प्रथाएं जब परंपरा बन जाती हैं, तो वे समाज की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं और यही भारतीय ज्ञान प्रणाली की निरंतरता का सबसे बड़ा रहस्य है।
इस निरंतरता और वैज्ञानिकता का सबसे अकाट्य प्रमाण गुरुमूर्ति जी ने वेदों की मौखिक परंपरा और उनके भीतर निहित ध्वनि विज्ञान के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने आधुनिक भाषाविदों और विचारकों को चुनौती देते हुए कहा कि वैदिक पाठ कोई सामान्य लोक-साहित्य या कविता नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत परिष्कृत और व्यावहारिक गणितीय कोड है।
प्राचीन ऋषियों को इस मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक तथ्य का भली-भांति आभास था कि मानव की स्मृति समय के साथ क्षीण हो जाती है और लिखित भाषाएं भी सदियों के चक्र में रूपांतरित या विकृत हो जाती हैं। इसलिए, वेदों की शुद्धता और उनकी मूल चेतना को अक्षुण्ण रखने के लिए उन्होंने ध्वनि-सटीकता का एक ऐसा कठोर और अचूक ढांचा तैयार किया जो शत-प्रतिशत त्रुटिहीन था।
‘उदात्त, अनुदात्त और स्वरित’ जैसे स्वरों के उतार-चढ़ाव और उच्चारण के कड़े नियमों के कारण ही यह संभव हो सका कि सहस्राब्दियों तक बिना एक भी शब्द लिखे, वेदों को उनके मूल स्वर और प्रतिध्वनि के साथ जीवित रखा जा सका। इस तरह से वैदिक पाठ सटीक गणितीय कोड और ध्वनि विज्ञान है।
गुरुमूर्ति जी ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि यद्यपि भारत के कई हिस्सों में विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक उथल-पुथल के कारण इस परंपरा को क्षति पहुंची, परंतु दक्षिण भारत के आचार्यों और विद्वानों ने इस मौखिक गणितीय कोड को आज भी शत-प्रतिशत ध्वनि-सटीकता के साथ सुरक्षित रखा है, जो कि वैश्विक स्तर पर भाषाई संरक्षण का एक अद्वितीय उदाहरण है।
यहां गुरुमूर्ति जी ने पश्चिमी अवधारणों के भयावह सत्य को भी उजागर किया। उनके अनुसार पश्चिमी मॉडल पूरी तरह से ‘व्यक्तिवाद’ और राज्य-संचालित सामाजिक अनुबंध पर आधारित है, जहां बुढ़ापे में व्यक्ति की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होती है।
गुरुमूर्ति जी ने चेतावनी दी कि यह मॉडल अब आर्थिक रूप से ढहने की कगार पर है। वर्ष 2032 तक अमेरिका के सामाजिक सुरक्षा खाते में सीधे तौर पर 29 ट्रिलियन डॉलर का घाटा होने का अनुमान है, जिसके कारण अगले 75 वर्षों में यह पूरी व्यवस्था ही समाप्त हो जाएगी। यदि वर्तमान मूल्य के हिसाब से समग्र सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के दीर्घकालिक घाटे को देखा जाए, तो यह राशि लगभग 73 ट्रिलियन डॉलर बैठती है। गुरुमूर्ति जी ने इसे अत्यंत तार्किक रूप से “अमेरिका के नीचे टिक-टिक करता एक टाइम बम” करार दिया है, जो किसी भी समय वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को पंगु बना सकता है।
पश्चिमी देशों के इस आसन्न संकट के विपरीत, भारत के पारंपरिक पारिवारिक मॉडल को देखें तो दुनिया के सामने एक सशक्त विकल्प के रूप में यह मौजूद है। आज भी भारत में लगभग 84 फीसद माता-पिता की देखभाल उनके अपने बच्चों द्वारा की जाती है। ध्यान रहे, यह कोई कानूनी बाध्यता या राज्य द्वारा थोपा गया नियम नहीं है, प्राचीन काल से चली आ रही साझेदारी, सहजीवन और पारिवारिक उत्तरदायित्व की एक अनवरत परंपरा है। पश्चिमी अर्थशास्त्री जिसे जीडीपी और बाजार के चश्मे से देखते हैं, भारत उसे ‘धर्म’ और पारस्परिक कर्तव्य के रूप में जीता है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ यह है कि भारत सरकार को अपनी जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा और पेंशन पर खर्च नहीं करना पड़ता, क्योंकि समाज अपनी आंतरिक ‘सामाजिक पूंजी’ के माध्यम से इस जिम्मेदारी को स्वतः और अत्यंत गरिमापूर्ण तरीके से वहन करता है। मिल-बांटकर रहना और संकट के समय एक-दूसरे का संबल बनना ही भारतीय संस्कृति का मूल आधार है और गुरुमूर्ति जी के अनुसार, यही वास्तविक ‘धर्म’ है जो समाज को आर्थिक और मानसिक रूप से सुरक्षित रखता है।
इसके अतिरिक्त आधुनिक खगोल भौतिकी और प्राचीन वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के बीच के गहरे संबंधों को भी देखा जा सकता है। बिग बैंग सिद्धांत और नासा द्वारा हाल के वर्षों में किए गए वैज्ञानिक खुलासों में आधुनिक विज्ञान जिन निष्कर्षों पर आज पहुंच रहा है, वे सत्य हमारे शास्त्रों में हजारों साल पहले से ही पूरी स्पष्टता के साथ विद्यमान हैं। आधुनिक विज्ञान अब यह स्वीकार करने लगा है कि ब्रह्मांड की मूल प्रकृति पदार्थ नहीं, बल्कि ऊर्जा की तरंगें और कंपन हैं। वेदों में इसी परम सत्य को ‘शब्द ब्रह्म’ कहा गया है, जो एक संगीतमय देवत्व की तरह संपूर्ण सृष्टि में प्रवाहित हो रहा है।
गुरुमूर्ति जी ने स्पष्ट किया कि ‘ओम्’ की ध्वनि अकेले एक धार्मिक प्रतीक होने तक सीमित नहीं है, यह इस ब्रह्मांड की मूल आवृत्ति और उसका केंद्रक है। यह तथ्य यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि भारत की प्राचीन संस्कृति और उसकी आध्यात्मिक मान्यताएं आधुनिक दुनिया की नींव रखने वाले विज्ञानों में गहराई से निहित हैं। यही कारण भी है जोकि भारत का विकास मॉडल प्रकृति का दोहन करने वाला नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व बनाए रखने वाला मॉडल है। यही कारण है कि भारत की सभ्यतागत विचारधारा आज के वैश्विक पर्यावरण संकट का भी एकमात्र तार्किक समाधान प्रस्तुत करती है।
इस तरह से यदि हम देखें तो गुरुमूर्ति जी ने एक अत्यंत आत्मविश्वासी और दूरदर्शी निष्कर्ष प्रस्तुत किया है, जो यह कहता है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान दुनिया का भविष्य है और इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं होना चाहिए। यद्यपि आधुनिक दुनिया को इस सत्य को स्वीकार करने में कुछ समय लग सकता है, किंतु वह दिन दूर नहीं जब वैश्विक समुदाय यह समझेगा कि भारत का विचार कोई पिछड़ा या आदिम ज्ञान नहीं है, वस्तुत: यह भविष्य का ज्ञान है।
भारत यह सिद्ध कर चुका है कि एक छोटे से भूभाग पर इतनी विशाल और विविध जनसंख्या के साथ बिना किसी आंतरिक सामाजिक विखंडन के, मिल-जुलकर और शांतिपूर्वक कैसे रहा जा सकता है। भारत आधुनिक तकनीक और आर्थिक प्रगति को अपनाते हुए भी अपनी आत्म-चेतना को सुरक्षित रखना जानता है। गुरुमूर्ति जी के शब्दों में, “हम विकास करना जानते हैं और हम दुनिया को भी अपनी शर्तों पर, प्रकृति के अनुकूल विकास करना सिखाएंगे।”
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

