| गरबा की घूमती हुई लय हो या डांडिया की थाप, मंदिर की आरती हो या जगराते का भजन, हर स्वर हमें एक ही दिशा में ले जा सकता है- बाहर के उत्सव से भीतर के जागरण की ओर। यही नवरात्रि की वास्तविक सुंदरता है। |
भारत के पर्व केवल उत्सव मनाने की परम्परा नहीं हैं बल्कि वे जीवन को प्रकृति, समाज और आत्मचिंतन से जोड़ने वाली एक सुंदर व्यवस्था भी हैं। नवरात्रि इसका सबसे जीवंत उदाहरण है।
नौ रातों तक चलने वाला यह पर्व कहीं गरबा और डांडिया की थाप में दिखाई देता है, कहीं भक्ति संगीत और जगराते में तो कहीं देवी आराधना और ध्यान में। बाहर से देखने पर यह रंग, संगीत और उत्साह का पर्व है, परंतु इसके भीतर प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, भारतीय कालगणना और आध्यात्मिक साधना की एक गहरी परम्परा छिपी हुई है।
भारतीय संस्कृति में ‘रात्रि’ को केवल अंधकार का समय नहीं माना गया बल्कि उसे अंतर्मुखी होने का अवसर समझा गया है। नवरात्रि की रातें इसी भाव को जगाती हैं। कुछ समय के लिए बाहरी भागदौड़ से हटकर अपने भीतर झांकने का अवसर।
नवरात्रि और खगोलीय चक्र
नवरात्रि की तिथियां भारतीय चंद्र सौर पंचांग से निर्धारित होती हैं। अर्थात इसकी गणना केवल सूर्य की गति पर नहीं बल्कि चंद्रमा की कलाओं और सूर्य की स्थिति से सम्बंधित पारम्परिक गणनाओं पर भी आधारित है। वर्ष में आने वाली नवरात्रियां ऋतु संधि के आसपास पड़ती हैं। यह वह समय होता है जब प्रकृति स्वयं एक परिवर्तन से गुजर रही होती है। शारदीय नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के आगमन का संकेत देती है। वातावरण, तापमान, दिन की लम्बाई और हमारी दैनिक गतिविधियों में परिवर्तन आने लगता है। प्राचीन समाज में ऐसे संक्रमण काल को विशेष महत्व दिया गया। उपवास, संयमित आहार, प्रार्थना और नियमित दिनचर्या जैसी परम्पराएं सम्भवतः इसी व्यापक जीवन दृष्टि का हिस्सा रही होंगी।
चंद्रमा के चक्र का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रहा है। हालांकि आधुनिक विज्ञान इस बात को प्रमाणित नहीं करता कि नवरात्रि के दौरान कोई विशेष ‘दैवी ऊर्जा’ सीधे मानव शरीर में प्रवेश करती है, परंतु चंद्र सौर कैलेंडर और प्रकृति के चक्रों के साथ मानव जीवन के पारम्परिक सम्बंध को समझना निश्चित रूप से रोचक है। यही कारण है कि भारतीय पर्वों में खगोलीय गणना और सामाजिक जीवन का इतना सुंदर मेल दिखाई देता है।
ऋतु परिवर्तन और हमारी जैविक घड़ी
हमारे शरीर में एक प्राकृतिक समय व्यवस्था होती है, जिसे सर्केडियन रिदम या जैविक घड़ी कहा जाता है। प्रकाश और अंधकार का चक्र हमारी नींद जागने की लय सहित शरीर की कई प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। ऋतु बदलने पर दिन के प्रकाश, तापमान और हमारी दिनचर्या में बदलाव आता है, जिसका प्रभाव हमारी नींद और दैनिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। नवरात्रि जैसी परम्पराएं हमें इसी अवसर पर अपनी दिनचर्या को थोड़ा संयमित करने की प्रेरणा देती हैं। उपवास या सात्विक आहार, नियमित प्रार्थना, सामूहिक गतिविधियां और आत्मचिंतन, इन सबका उद्देश्य शरीर और मन को अनुशासन में लाना भी माना जा सकता है। यहां एक सुंदर बात ध्यान देने योग्य है। विज्ञान शरीर की प्रक्रियाओं को समझाता है और परम्परा जीवन को उनके साथ संतुलित करने का मार्ग दिखाती है।
रात्रि जागरण: केवल जागना नहीं, जागृत होना
नवरात्रि में जगराता और रात्रि जागरण की परम्परा अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है। भजन, कीर्तन, देवी के गीत और सामूहिक प्रार्थना के बीच पूरी रात जागना भक्तिभाव से जुड़ा हुआ है, परंतु ‘जागरण’ का अर्थ केवल रातभर जागते रहना नहीं होना चाहिए, इसका एक आध्यात्मिक अर्थ भी है। अज्ञान से ज्ञान की ओर जागना, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर जागना और अपने भीतर की चेतना को पहचानना। आज की तेज जीवनशैली में जब हमारा मन लगातार सूचनाओं और तनाव से घिरा रहता है, तब कुछ समय सामूहिक भक्ति, संगीत और ध्यान में बिताना मानसिक रूप से परम शांति देने वाला अनुभव हो सकता है।
डांडिया और गरबा: उत्सव में छिपी सामूहिकता
नवरात्रि का सबसे आकर्षक रूप गरबा और डांडिया है। गोल घेरे में घूमते लोग, ताल से ताल मिलाते कदम और संगीत की लय। यह केवल मनोरंजन नहीं, सामूहिक सहभागिता का उत्सव भी है। लयबद्ध नृत्य शरीर को सक्रिय करता है और शारीरिक गतिविधि का एक आनंददायक माध्यम बनता है, उससे भी महत्वपूर्ण है उसका सामाजिक पक्ष। अलग-अलग आयु और पृष्ठभूमि के लोग एक साथ नृत्य करते हैं, मुस्कुराते हैं और उत्सव साझा करते हैं। इससे समुदाय और अपनत्व की भावना मजबूत होती है। डांडिया की दो लकड़ियों का एक दूसरे से मिलना मानो यह संदेश देता है कि जीवन की सुंदरता अकेले चलने में नहीं बल्कि तालमेल में चलने में है।

संगीत और भक्ति की शक्ति
नवरात्रि में संगीत का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भजन, आरती, गरबा, डांडिया गीत और जगराते की धुनें वातावरण को ऊर्जा और उत्साह से भर देती हैं। संगीत मनोदशा को प्रभावित कर सकता है और सामूहिक गायन लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ सकता है।
भारतीय परम्परा में मंत्र और भक्ति संगीत को मन को एकाग्र करने का माध्यम माना गया है। ‘सूक्ष्म ऊर्जा’ की आध्यात्मिक अवधारणा को विज्ञान की स्थापित भाषा में सीधे मापना कठिन है, परंतु ध्यान, प्रार्थना, संगीत और सकारात्मक सामूहिक अनुभव से व्यक्ति को शांति, भावनात्मक जुड़ाव और मानसिक प्रसन्नता का अनुभव होता है। कदाचित् यही वह अनुभव है जिसे हमारी परम्परा ने ‘भीतर की शक्ति का जागरण’ कहा।
नौ रातें, नौ अवसर
नवरात्रि हमें केवल देवी की आराधना नहीं सिखाती बल्कि अपने भीतर की शक्तियों को पहचानने का अवसर देती है। शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं है। धैर्य, करुणा, विवेक, साहस और आत्मविश्वास भी शक्ति ही हैं। इन 9 दिनों में प्रतिदिन यदि हम अपने जीवन से कोई एक नकारात्मक आदत कम करें, किसी सकारात्मक आदत को अपनाएं, परिवार के साथ समय बिताएं, प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनें और कुछ क्षण शांत होकर स्वयं से संवाद करें तो नवरात्रि का अर्थ और भी गहरा हो जाता है। नवरात्रि इसलिए विशेष नहीं कि इन नौ रातों में कोई चमत्कार होता है। वह इसलिए विशेष है क्योंकि ये नौ रातें हमें स्वयं में परिवर्तन का अवसर देती हैं।
निहारिका पोल सर्वटे
