नवरात्र जिसे 9 दिनों का अनुष्ठान कहा जाता है। इस दौरान शक्ति की भक्ति की जाती है। 9 रातों का पर्व, जिसमें भक्ति, शक्ति, परिवार और लोकसंस्कृति एक साथ दिखाई देती है। यह पर्व पारिवारिक आस्था से सामूहिक संस्कृति तक जुड़ी है।
भारत में नवरात्र केवल देवी-पूजा का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज की पारिवारिक स्मृतियों, लोकपरम्पराओं और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उत्सव है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इसके रूप भले ही अलग हों, लेकिन इसके केंद्र में शक्ति, श्रद्धा और अच्छाई की बुराई पर विजय का भाव समान रूप से दिखाई देता है। शारदीय नवरात्र आश्विन मास में मनाई जाने वाली सबसे प्रमुख नवरात्र मानी जाती है।

पारम्परिक या पारिवारिक नवरात्र क्या है
नवरात्र का सबसे पुराना और आत्मीय रूप परिवार के भीतर दिखाई देता है। घर में घट या कलश की स्थापना, अखंड ज्योति, देवी की पूजा, व्रत, कन्या पूजन और परिवार के सदस्यों द्वारा मिलकर आराधना-ये सभी पारिवारिक नवरात्र की प्रमुख विशेषताएं हैं। कई पारम्परिक परिवारों में घट को शक्ति और सृजन का प्रतीक माना जाता है। उसके चारों ओर महिलाएं गोल घेरा बनाकर पारम्परिक गीत गाती हैं और नृत्य करती हैं। गुजरात और पश्चिम भारत की गरबा परम्परा में भी दीप या घट के चारों ओर वृत्ताकार नृत्य इसी सांस्कृतिक प्रतीकवाद से जुड़ा दिखाई देता है। यहां ‘गरबा’ शब्द का सम्बंध गर्भ या जीवन के स्रोत के प्रतीक से भी जोड़ा जाता है।
पारिवारिक नवरात्र का मूल उद्देश्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि परिवार के भीतर आस्था और पीढ़ियों के बीच परम्परा का हस्तांतरण है। दादी-नानी से सीखे गए देवी गीत, पूजा की विधियां, व्रत की परम्पराएं और परिवार की अपनी मान्यताएं बच्चों तक इसी अवसर पर पहुंचती हैं। इसलिए इसे केवल धार्मिक अनुष्ठान कहना पर्याप्त नहीं होगा, यह परिवार की सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखने की प्रक्रिया भी है।

सामूहिक नवरात्र : जब परिवार से समाज तक पहुंचती है आस्था
समय के साथ नवरात्र घर की चारदीवारी से निकलकर मोहल्लों, गांवों, शहरों और बड़े सार्वजनिक मैदानों तक पहुंची। यही सामूहिक नवरात्र है। इसमें विभिन्न परिवार एक स्थान पर एकत्र होकर देवी की स्थापना, आरती, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन, गरबा, डांडिया और अन्य लोककलाओं के माध्यम से उत्सव मनाते हैं।
सामूहिक नवरात्र का सबसे बड़ा गुण है-साझी भागीदारी। यहां रिश्तेदारी से आगे बढ़कर पड़ोसी, मित्र और समुदाय के विभिन्न वर्ग एक साथ आते हैं। आधुनिक शहरों में सामूहिक नवरात्र सामाजिक मेल-मिलाप, सांस्कृतिक प्रस्तुति और स्थानीय सामुदायिक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है।
पौराणिक आधार : महिषासुर पर शक्ति की विजय
नवरात्र की सबसे व्यापक पौराणिक मान्यता देवी दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से जुड़ी है। कथा के अनुसार महिषासुर को ऐसा वर प्राप्त था जिसके कारण देवता और पुरुष उसे पराजित नहीं कर सकते थे। तब देवताओं की सामूहिक शक्ति से आदिशक्ति का प्राकट्य हुआ। देवी दुर्गा ने महिषासुर से नौ रातों तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसी कारण 9 रातें नवरात्र और दसवां दिन विजयदशमी कहलाया। नवरात्र से रामायण की परम्परा भी जुड़ी है। उत्तर भारतीय मान्यताओं में विजयदशमी भगवान राम की रावण पर विजय का प्रतीक है। इस प्रकार एक ही पर्व में देवी शक्ति और राम की धर्म-विजय की दो महत्वपूर्ण पौराणिक धाराएं मिलती हैं।
बदलते समय में नवरात्र का अर्थ
आज नवरात्र घर की पूजा से लेकर विशाल सार्वजनिक आयोजनों तक विस्तृत हो चुका है। लेकिन दोनों रूपों का मूल भाव एक ही है-शक्ति की आराधना, परिवार का जुड़ाव और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार।
पारिवारिक नवरात्र जहां व्यक्ति को अपनी जड़ों और पारिवारिक परंपराओं से जोड़ता है, वहीं सामूहिक नवरात्र विभिन्न परिवारों और समुदायों को एक साझा सांस्कृतिक मंच देता है। गुजरात का गरबा, बंगाल की दुर्गापूजा, उत्तर भारत की रामलीला, दक्षिण भारत का कोलु, कर्नाटक का मैसूर दशहरा और तेलंगाना का बथुकम्मा-ये सभी अलग-अलग रूप होते हुए भी भारत की उस सांस्कृतिक विशेषता को प्रमाणित करते हैं, जिसमें एक ही आध्यात्मिक भावना अनेक स्थानीय भाषाओं, कलाओं और परंपराओं में अभिव्यक्त होती है।
यही नवरात्र की वास्तविक शक्ति है-यह केवल नौ रातों का पर्व नहीं, बल्कि भारत की विविधता में एकता का नौ रातों तक दिखाई देने वाला जीवंत उत्सव है।
लवकुश तिवारी

