विस्तृत बाँध, तालाब और 17,000 किलोमीटर से अधिक लंबी नदियों के माध्यम से महाराष्ट्र एक नया केंद्र बन रहा है, जहां मीठे पानी का मत्स्य-जल पर्यटन की संभावना विकसित हो रही है।
महाराष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मीठे पानी के मत्स्य व्यवसाय हमेशा से भोजन और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार रहा है। लेकिन केवल पारंपरिक मछली पकड़ने पर निर्भर रहने के बजाय यदि इसे मनोरंजक पर्यटन से जोड़ दिया जाए, तो सतत ग्रामीण उद्यमिता का नया रास्ता खुल सकता है। मत्स्य व्यवसाय और पर्यटन के इस संगम को ‘मत्स्य आधारित जल-पर्यटन’ के रूप में जाना जा रहा है।

केंद्रीय मत्स्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र के पास 17,861 किलोमीटर लंबी नदियों और नहरों का जाल है। इसके अलावा 3,487 छोटे जलाशय (1.68 लाख हेक्टेयर), 67 मध्यम और बड़े जलाशय (1.33 लाख हेक्टेयर) और 53,087 हेक्टेयर क्षेत्र तालाबों व पोखरों के रूप में उपलब्ध हैं। वर्ष 2019-20 से 2024-25 के दौरान राज्य के अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन ने 18.08% की उल्लेखनीय औसत वार्षिक वृद्धि दर्ज की है, और 2024-25 में मीठे पानी का मत्स्य उत्पादन 2.71 लाख टन तक पहुंच गया है।
अंतर्देशीय जल-पर्यटन के मुख्य पहलू
1. जलाशय में क्रीड़ा, मात्स्यिकी और नौका विहारः उजनी, कोयना, जायकवाड़ी और भातसा जैसे बड़े जलाशयों में कैच एंड रिलीज़ के सिद्धांत पर नियंत्रित एंगलिंग (कांटे से मछली पकड़ना) शुरू की जा सकती है। राज्य में पिंजरा पद्धति से मत्स्य पालन (केज कल्चर) की 5,440 से अधिक इकाईयाँ स्वीकृत की गई हैं। इन तैरते हुए पिंजरों पर पर्यटकों के लिए पर्यावरण-अनुकूल बोटिंग, हाउसबोट, फ्लोटिंग कॉटेज की योजना आसानी से बनाई जा सकती है।
2. ‘अपना मोती स्वयं बनाएं’ कार्यशालाः यह कार्यशाला मीठे पानी के सीपों से मोती बनाने की प्रक्रिया (पर्ल कल्चर) को दर्शाती है और अब कृषि-पर्यटन का आकर्षक हिस्सा बन गई है। फार्म तालाबों पर आने वाले पर्यटकों को यह प्रक्रिया दिखाना, ज्वलंत सर्जरी प्रदर्शन करना और खुद निकाले गए मोती को आभूषण के रूप में खरीदने का अवसर देना, स्थानीय स्तर पर एक बड़ा गृह-उद्योग स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
3. मत्स्यपालन थीम पार्क और प्रक्षेत्र भ्रमणः महाराष्ट्र में 508 स्वीकृत पुनर्चक्रीत प्रणाली इकाइयों और आधुनिक हैचरी केंद्रों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। इससे विद्यार्थियों और पर्यटकों को मछलियों को दाना खिलाने, बायोफ्लॉक तकनीक के बारे में जानकारी प्राप्त करने और खेत से सीधे ताजी मछली का स्वाद लेने (फार्म-टू-टेबल) जैसे कार्यक्रमों का आनंद शहरों में मिल सकता है।
4. नदी तट पर साहसिक पर्यटन केंद्र: पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ की नदियों के शांत क्षेत्रों में रिवर राफ्टिंग, कयाकिंग और प्रकृति भ्रमण का आयोजन करके नदी किनारे के मछुआरा समुदाय को सीधे गाइड के रूप में रोजगार प्रदान किया जा सकता है।
स्थानीय महिलाओं का सशक्तिकरण और उद्यमिता
अंतर्देशीय जल-पर्यटन का मुख्य लाभ स्थानीय समुदाय, विशेष रूप से महिलाओं को प्राप्त होता है। महाराष्ट्र में अंतर्देशीय मत्स्य व्यवसाय में महिलाओं का सशक्त योगदान है कुल 11.32 लाख अंतर्देशीय मछुआरों में से लगभग 46.8%, यानी 5.29 लाख महिलाएं, इसमें शामिल हैं। जल-पर्यटन के विकास से महिला बचत समूहों को अपने पारंपरिक व्यंजन, स्थानीय मछली के उत्पादों का विपणन, और ग्रामीण होम स्टे संचालित करने का सीधा लाभ मिलता है।
नीतिगत चुनौतियों और उनके समाधानों का अवलोकन
वर्तमान सर्वेक्षण के अनुसार, जल-पर्यटन के विकास में प्रमुख चुनौतियों में जन-जागरूकता की कमी (62%) और प्रभावी विपणन का अभाव है, साथ ही साथ अधूरी आधारभूत सुविधाएं (48%) भी बाधा बन रही हैं। इस क्षेत्र का सुनियोजित विकास सुनिश्चित करने के लिए, 75% हितधारकों ने एक समावेशी सरकारी नीति की जरूरत पर बल दिया है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत, जलाशयों पर सुरक्षित जेटी, पर्यटकों के लिए आरामदायक बैठने की व्यवस्था, स्वच्छता घर और लाइफ जैकेट जैसी सुरक्षा उपाय जोड़कर पर्यटकों का भरोसा बढ़ाया जा सकता है।
जल-पर्यटन न केवल मनोरंजन है, बल्कि ग्रामीण और किसान परिवारों को मौसमी अनिश्चितताओं से बाहर निकालने का एक स्थायी आर्थिक स्रोत भी है। महाराष्ट्र के विशाल जलाशयों और नदी प्रणाली की इस विरासत को पर्यटन से जोड़कर, राज्य सरकार ग्रामीण इलाकों में समृद्धि के लिए एक नई ‘नीली क्रांति’ ला सकती है।
