दशहरे पर भारत में सभी जगह रावण दहन का कार्यक्रम होता है। रामायण की कथा के अनुसार, रावण के 10 सिर थे। शरीर विज्ञान के अनुसार, एक धड़ पर एक ही सिर होता है। फिर रावण के 10 सिर कैसे थे? ये 10 सिर राक्षसी प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। ये प्रवृत्तियाँ हैं— दंभ, घमंड, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, झूठ बोलना, अहंकार, दूसरों की वस्तु बलपूर्वक प्राप्त करने की इच्छा, सज्जन लोगों को सताने की प्रवृत्ति और अत्यधिक लालच। रावण इन सभी प्रवृत्तियों का प्रतीक था। इसलिए उसे 10 सिरों वाला कहा जाता था।
जब तक मनुष्य समाज अस्तित्व में रहेगा, तब तक इन प्रवृत्तियों का 100 प्रतिशत समाप्त हो जाना संभव नहीं लगता। महर्षि वाल्मीकि की रामायण में रामराज्य क्या है, इसका बहुत अच्छी तरह वर्णन किया गया है। रामराज्य एक आदर्श राज्य है। लेकिन क्या आज के युग में और निकट भविष्य में इस आदर्श को वास्तव में साकार करना संभव है? मनुष्य की प्रवृत्तियों को देखते हुए ऐसा संभव नहीं लगता।
आदर्श राज्य की संकल्पना को सामने रखकर हमारे संविधान निर्माताओं ने उदात्त विचारों वाला संविधान बनाया। सभी को न्याय, कानून के सामने समानता, सभी को कानून का संरक्षण, सभी को अपने उपासना-पंथ का पालन करने की स्वतंत्रता, भारत में कहीं भी जाकर रहने की स्वतंत्रता, अपनी पसंद का व्यवसाय करने की स्वतंत्रता, सभी को शिक्षा, प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष समानता— ये सभी उदात्त मूल्य हमारे संविधान में कानूनी प्रावधानों के रूप में शामिल किए गए हैं। यदि सभी लोग इन मूल्यों का पूरी तरह पालन करने का निश्चय कर लें, तो दो-चार वर्षों में रामराज्य स्थापित हो जाएगा।
लेकिन समाज में मौजूद रावण इन मूल्यों के अनुसार व्यवहार नहीं करते। वे अपने 10 मुँहों से इन सभी मूल्यों के विरुद्ध संघर्ष करते रहते हैं। पिछले लगभग एक महीने से दिल्ली में जो हंगामा चल रहा है और हंगामा करने वाले दशानन रावण कौन हैं, यह हम सभी जानते हैं। वे Regime Change यानी सत्ता परिवर्तन की भाषा बोलते हैं। वे कहते हैं कि लड़ाई संसद में नहीं होगी, बल्कि सड़कों पर लड़नी पड़ेगी। वे कहते हैं कि हमारी संसद और न्यायपालिका निष्क्रिय हो गई हैं। न्यायपालिका न्याय नहीं देती और संसद अन्याय का समर्थन करती है।

रावण के चरित्र में हम पढ़ते हैं कि रावण और उसके साथी मायावी थे। मायावी अर्थात मनचाहा रूप धारण करने वाले। सीता को मोहित करने वाले सुनहरी कांति वाले हिरण का रूप रावण के मामा मारीच ने धारण किया था। रावण संन्यासी बनकर आया और उसने सीता का अपहरण कर लिया। रावण के सभी पुत्रों में आकाश में बहुत ऊँचा उड़ने और अपने शरीर को विशाल बनाने की शक्ति थी। इन सभी शक्तियों का उपयोग करके वे सीता को धमकाते रहते थे। यहाँ सीता धर्माचरण की साक्षात मूर्ति हैं। वे अपने पत्नीधर्म को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारी न्यायव्यवस्था का आदर्श वाक्य है—‘यतो धर्मस्ततो जयः’, अर्थात जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।

जंतर-मंतर पर हंगामा करने वाली दशानन सेना आसुरी सेना है और उसका समर्थन करने वाले महाराष्ट्र के राजनेता, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्य स्थानों के राजनेता— ये सभी असुरों के समर्थक हैं। हमारा पवित्र संविधान कहता है कि समय आने पर सत्ता परिवर्तन होना चाहिए, लेकिन यह परिवर्तन मतपेटी के माध्यम से होना चाहिए। संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सत्ता परिवर्तन किया जाना चाहिए। जो लोग सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले जनता का विश्वास जीतना चाहिए। बर्गर और बिरयानी खाकर तथा मनचाही गालियाँ देकर जनता का विश्वास प्राप्त नहीं किया जा सकता।
जनता का विश्वास जीतने के लिए लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े प्रश्नों को उठाना पड़ता है। समस्याएँ अनगिनत हैं। किसी भी समस्या को उठाकर आंदोलन नहीं किया जा सकता; ऐसा आंदोलन सफल नहीं होता। प्रतिभाशाली राजनेता किसी एक या दो विषयों पर अपनी सारी शक्ति केंद्रित करता है। जिस प्रकार उत्तल लेंस से केंद्रित होकर आने वाली सूर्य की किरणें जब कपास पर पड़ती हैं, तो कपास जलने लगती है, उसी प्रकार किसी एक विषय पर पूरी शक्ति केंद्रित करने से प्रभावशाली परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। ऐसी प्रतिभा न हो, तो आंदोलन में तिलचट्टों को साथ लेकर चलना पड़ता है या उन्हें अपने कंधों और शरीर पर उछल-कूद करने देना पड़ता है।

ऐसे आंदोलन की कोई निश्चित दिशा नहीं होती। सत्ता परिवर्तन करना है, यह घोषणा तो की जाती है। लेकिन जिस जनता के लिए सत्ता परिवर्तन करना है, यदि वही जनता कह रही हो कि हमें सत्ता परिवर्तन नहीं चाहिए, तो आप चाहे कितना भी सिर पटक लें, आपके सिर के नीचे कुछ तिलचट्टे ही मरेंगे, इसके अलावा कुछ नहीं होगा।
यह संघर्ष सर्वोच्च न्यायालय के आदर्श वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ के विरुद्ध है। सभी रावणाचार्य ‘यतो अधर्मस्ततो जयः’ अर्थात जहाँ अधर्म है, वहाँ विजय है— इस मानसिकता से ग्रस्त हैं। सनातन भारत के इतिहास में अधर्म की विजय होने का एक भी उदाहरण नहीं है। अधर्मी लोग कुछ समय के लिए सफल हो जाते हैं। ऐसी अनगिनत कथाएँ हैं। हिरण्यकश्यपु की कथा सभी जानते हैं। भगवान नरसिंह ने उसे अपनी जाँघों पर लिटाकर उसका पेट फाड़ दिया। कृष्ण ने कंस को यमलोक पहुँचा दिया। कुरुक्षेत्र में सभी अधर्मी राजाओं, महाराजाओं और उनके समर्थकों को कृष्ण ने पांडवों की सहायता से विकराल काल के पेट में डाल दिया।
इस असुर-संग्राम के संबंध में एक बहुत अच्छा गीत है—
‘अभी कुरुक्षेत्र में
पाञ्चजन्य बजाना बाकी है,
असुर निर्दलन बाकी है,
राष्ट्र का वैभव पाना बाकी है।
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर,
नव इतिहास बनाना बाकी है,
धर्म-ध्वजा को विश्व पटल पर,
फिर से आज फहराना बाकी है।
असुर निर्दलन बाकी है,
राष्ट्र का वैभव पाना बाकी है।’
अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय में आग लगा दी। ऐसा ही आग लगाने का सपना देखने वाले अनेक लोगों को इससे आनंद हुआ। उन्होंने सरकार को चेतावनियाँ देना शुरू कर दिया। वे दिवास्वप्न देखने लगे कि भारत में भी ऐसा हो सकता है। लेकिन भारतीय जनता तो भारतीय जनता है। आवश्यकता पड़ने पर वह नरसिंह का अवतार धारण कर सकती है। भगवान शंकर की तरह अपनी तीसरी आँख खोल सकती है और हनुमान की तरह विकराल रूप धारण करके गदा का जबरदस्त प्रहार कर सकती है। इन सभी आसुरी शक्तियों के लिए यह समझना आवश्यक है और उन्हें धर्म की शरण में आना चाहिए। अन्यथा उनका रावण बन जाना तय है।
कवि रामधारी सिंह दिनकर ने हम सभी को एक बहुत अच्छी चेतावनी दी है। उनकी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उन लोगों को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए, जो न इधर हैं, न उधर, बल्कि तटस्थ होकर बैठे रहते हैं। वे कहते हैं—
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध।
– रमेश पतंगे

