पति की लम्बी आयु की कामना को लेकर सुहागिन करवाचौथ का व्रत करती हैं। यह त्योहार देश के लगभग सभी राज्यों में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इन दिनों बाजारों में त्योहारों में विशेसकर करवाचौथ की खूब धूम है। यूं तो यह त्योहार मुख्यतः पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में मनाया जाता था, लेकिन प्रवास के कारण यह सुदूर क्षेत्रों में भी मनाया जा रहा है। वैसे एक सच यह भी है कि यह त्योहार फिल्मों के कारण ज्यादा प्रासंगिक हो गया। कुछ प्रचलित फिल्मों में इसे दिखाए जाने के बाद युवाओं में इसका प्रचलन बढ़ गया और युवक व युवतियां दोनों ने उपवास करना शुरू कर दिया। वैसे यह त्योहार दाम्पत्य जीवन की खुशहाली और पति के दीर्घायु जीवन की कामना के लिए रखा जाता था, लेकिन आधुनिक युग में यह ज्यादा रोमांचक और चकाचौंध वाला त्योहार बन गया। इस त्योहार ने वस्त्र और आभूषण के बाजार को तेजी दी और इन दिनों कारोबार में बड़ी वृद्धि दर्ज की गई। जो भी हो, इन दिनों घर और बाहर काफी रौनक दिखाई देती है और उल्लासमय वातावरण बन ही जाता है।
कहीं रंग-बिरंगी सुंदर नगों से सजी करवा बिक रही होती है तो कहीं सुंदर लेस से लिपटी चलनी सहज ही महिलाओं को आकर्षित कर रही है। पूरा बाजार श्रृंगार व रंग-बिरंगे परिधानों से पट गया है। करवाचौथ की विशिष्ट पूजन सामग्री भी जगह-जगह दिखाई देती है। करवाचौथ के अवसर पर महिलाओं को ब्यूटी पार्लर में विशेष व आकर्षक पैकेज भी मिलता है, जिसमें एक्स्ट्रा शिफ्ट में भी सर्विस दी जाती है। इस अवसर पर महिलाएं अपने लुक को और भी आकर्षक बनाने के लिए ब्यूटी पार्लर जाती हैं।

करवाचौथ की परंपरा काफी पुरानी है और इस व्रत की कथा यह है कि ईरावती नाम की एक विवाहित स्त्री थी जिसके सात भाई थे।
उसने पहली बार करवाचौथ का व्रत रखा था और वह भूख से परेशान हो रही थी, जिसे देखकर उसके भाइयों ने दूर दिया रखकर उस पर चलनी डालकर नकली चांद का बिम्ब दिखाकर अपनी बहन का व्रत खुलवा दिया। लेकिन इसके दुष्परिणाम के रूप में ईरावती के पति की मृत्यु हो गई और वह अपने पति के प्राण वापस लेने के लिए चौथ का व्रत रखने लगी, जिससे करवा माता प्रसन्न होकर उसके पति को जीवन प्रदान किया। यह व्रत विवाहित स्त्रियां रखती हैं जिसमें सूर्योदय के पहले वे सरगी करती हैं।
सरगी से तात्पर्य है वह फल, मिठाई और वस्त्र, आभूषण जो सास अपनी बहू को भेंटस्वरूप देती है और जिसमें प्रदान की गई मिठाई, फल व्रती व्रत के पूर्व ग्रहण करती है और पूरा दिन बिना जल व भोजन के रहती है। करवाचौथ में मेहंदी लगवाने की भी खूब परम्परा है और बाजार में लगाने और लगवाने वाले दोनों की लाइन लगी रहती है।
शाम होते ही महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और फिर चांद निकलने की प्रतीक्षा करने लगती हैं। चांद निकलते ही सभी सुहागिन स्त्रियां करवा (मिट्टी का छोटा कलश) में जल भरकर पहले चांद फिर पति को चलनी में देखते हुए अर्घ्य देती हैं। कई जगह महिलाएं पार्क या किसी हॉल में सामूहिक रूप से भी पूजा करती हैं जिसमें सभी अपनी पूजा की थाली को गोल समूह में एक-दूसरे को देकर पूरा चक्र घुमाती हैं। पूजन के पश्चात पति के हाथ से जल एवं भोजन ग्रहण कर वे व्रत खोलती हैं। इस प्रकार करवाचौथ एक सौभाग्य प्रदान करने वाला पवित्र व्रत है और इसकी महिमा वर्षों से चली आ रही है।
परिणीता सिन्हा ‘स्वयंसिद्धा’

