अमेरिकी न्यूज़ चैनल फॉक्स न्यूज की एक खोजी रिपोर्ट के खुलासे ने भारत में चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी, विपक्ष और प्रशान्त भूषण जैसे अराजकतावादी जमात के तख्ता पलट अभियान पर नया खुलासा किया है। फॉक्स न्यूज की पत्रकार हैं असरा क्यू नोमानी। उन्होंने फ्रांस, डेनमार्क, स्पेन, इटली, भारत और अल्बानिया आदि में चल रहे जनांदोलनों को लेकर एक खोजी रिपोर्ट तैयार की है।

“ग्लोबल केओस इंक ग्रोज़ टू 101 ग्रुप्स” (वैश्विक अराजकता का तंत्र 101 समूहों तक फैला) नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप में मौजूदा दौर में चल रहे जनांदोलनों के पीछे निश्चित तौर पर कुछ स्थानीय कारण मसलन शिक्षा के बजट की कटौती और महंगाई आदि है। लेकिन इसकी आड़ में 13 देशों के 101 संगठनों का एक समूह दंगों और अराजकता को भड़काने की सफल कोशिश कर रहा है। असरा नोमानी की रिपोर्ट के तथ्य भारत में चल रहे छात्र व राजनीतिक प्रदर्शनों के पीछे भी इसी संगठन का हाथ होने की तसदीक करते हैं। इन संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय ‘सीक्रेट नेटवर्क’ तैयार किया है। जो ग्लोबल प्रोटेस्ट इको-सिस्टम के तौर पर काम कर रहा है। असरा क्यू नोमानी की इस पड़ताल के अनुसार, यह नेटवर्क बेहद शातिर ढंग से काम कर रहा है। यह स्थानीय स्तर की समस्याओं को चिन्हित कर रहा है, फिर उसके खिलाफ उठी आवाजों की पहचान करके उनके साथ अपने नेटवर्क के लोगों को जोड़कर दंगों, आगजनी और हंगामे को हवा दे रहा है।

असरा क्यू नोमानी की खोज रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल प्रोटेस्ट इको-सिस्टम में दुनियाभर के 101 संगठनों का सिंडिकेट काम कर रहा है। इस तंत्र में वामपंथी संगठन, छात्र गुट, ट्रेड यूनियनें और एडवोकेसी नेटवर्क और एनजीओ शामिल हैं।
दिलचस्प यह है कि इनमें उन सभी देशों के स्थानीय संगठनों को भी जोड़ा गया है, जिनकी सोच वामपंथी हैं, जो एलजीबीटीक्यू और समलैंगिकता आदि के नाम पर कथित आजादी के समर्थक है। फिर इन सबका सिरा हर उस देश के आंदोलनकारी तत्वों के पीछे की ताकतों से जुड़ता है।
असरा तो दावे के साथ कहती हैं कि फ्रांस और भारत के आंदोलनों का सिरा आपस में इस नेटवर्क के जरिए जुड़ा हुआ है। असरा ने अपनी खोजी रिपोर्ट की शुरुआत में अपनी जांच फ्रांस के अशांत इलाकों में फैली हिंसा को लेकर सिर्फ 50 संगठनों पर ध्यान केंद्रित किया था। लेकिन जैसे-जैसे उनकी जांच आगे बढ़ी, संगठनों की संख्या 101 तक जा पहुंची, जो 13 देशों में फैले हुए हैं। नोमानी की रिपोर्ट में ये दावा किया गया है ये फ्रांस और भारत में हो रहे प्रदर्शनों के संदेशों को जोड़ने का काम कर रहे हैं। इसके अलावा ये संगठन मैनहट्टन में पीपल्स फोरम से साथ भी रिश्ता रखता है।
कृषि कानूनों से शुरू हुआ टूल किट सिस्टम
भारत में जब 5 साल पहले तीन कृषि कानूनों के विरोध की आड़ में जब किसान आंदोलन हुआ था, तब एक शब्द प्रचलन में आया था टूलकिट। टूलकिट यानी आंदोलन की पूरी रूपरेखा। याद कीजिए, तब अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग का भी नाम सामने आया है। स्वीडन की इस पर्यावरण कार्यकर्ता ने किसान आंदोलन के समर्थन और भारत की मोदी सरकार के विरोध में आवाज उठाए थे। अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और भारत विरोधी टूलकिट का एक उदाहरण प्रधानमंत्री मोदी की नार्वे यात्रा के दौरान भी दिखा था, जब वहां की एक अनाम-सी पत्रकार हेला लेंग ने प्रधानमंत्री से सवाल पूछकर सनसनी फैलाने की कोशिश की थी।
फॉक्स न्यूज की पत्रकार असरा क्यू नोमानी की यह खोज रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा ग्लोबल नेटवर्क और इको सिस्टम ने भी बाकायदा टूलकिट बनाया है और उसकी अपनी रणनीति भी है। इसके जरिए वह भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में स्थानीय नाराजगी वाले मुद्दों को हवा देकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, ये संगठन विरोध-प्रदर्शनों के एजेंडे को आपस में साझा कर इन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला रहे हैं। इसमें नेविल रॉय सिंघम से जुड़े सूत्रों व कुछ अन्य समूह भी शामिल हैं। यह रिपोर्ट एक तरह से इन पूरे आंदोलनों का मास्टर माइंड साबित करती है।

नेविल राय सिंघम का कनेक्शन
असरा की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसे शंघाई चीन में रहने वाले अमेरिकी मूल के तकनीकी क्षेत्र के ताकतवर उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम ना सिर्फ आर्थिक मदद कर रहे हैं, बल्कि उसे समर्थन भी दे रहे हैं। नेविल रॉय सिंघम विवादास्पद शख्सियत रहे हैं। नेविल रॉय सिंघम का जिक्र होने से असरा की रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर चर्चित हो चुकी है। पर्दे के पीछे से इन आंदोलनों की आड़ में नेविल के समर्थन और आर्थिक सहयोग की बात को समर्थन 14 अक्टूबर को ब्रेकथ्रू न्यूज में छपे नेविल रॉय सिंघम की पत्नी और कोडपिंक की सह संस्थापक जोडी इवांस के इंटरव्यू से मिलता है। इस इंटरव्यू में जोडी इवांस ने फ्रांस, स्पेन और भारत में हो रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा है कि वह चाहती हैं कि लोग फ्रांस, स्पेन और भारत की ओर देखें और खुद से सवाल करें कि वे कहां हैं और वे सड़कों पर क्यों नहीं हैं। जोडी इवांस एक तरह से वैश्विक स्तर पर लोगों को उकसा रही हैं कि वे आंदोलनों के सड़कों पर उतरें और अराजकता को बढ़ावा दें। यहां याद करना जरूरी है कि जुलाई 2026 में अमेरिकी कांग्रेस ने सिंघम से जुड़े कई ट्रस्टों और संस्थाओं को गैर-लाभकारी फंडिंग के गलत इस्तेमाल व विदेशी एजेंडे के तहत समन भी भेजा था।
ब्रेकथ्रू न्यूज कोडपिंक …
कम्युनिस्ट आंदोलन भले ही बराबरी की स्थापना की बात करे, लेकिन उसकी पूरी सोच के मूल में हिंसा है। दुनियाभर के कम्युनिस्ट आंदोलनों को देखेंगे तो उनमें खून-खराबा ही नजर आता है। भारत में उन्हें लेकर एक छवि रही है कि वे काफी पढ़े-लिखे होते हैं। लेकिन हालिया जंतर-मंतर के प्रदर्शन में जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभद्र और असभ्य गालियों का प्रदर्शन हुआ, गालियों वाले पोस्टर लहराए गए, युवाओं ने मोदी को गंदी-गंदी गालियां दीं, उसे कथित कम्युनिस्ट विचारकों ने जमकर सराहा। उसका न सिर्फ बचाव किया, बल्कि यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी इसी के काबिल हैं। एक कम्युनिस्ट पूर्व प्रोफेसर ने गालियों के समर्थन में तर्क दिया कि बचपन में वह अपने पिता के दोस्तों को खूब गालियां देता था। बहरहाल हिंसा, बदसलूकी और गालियां कम्युनिस्ट आंदोलन का चेहरा रही हैं। असरा क्यू नोमानी की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है।
असरा की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यूरोप में हो रहे प्रदर्शनों और उसकी वजह से हुई अशांति को कम्युनिस्ट-समर्थक संगठनों का एक नेटवर्क भी बढ़ावा दे रहा है। इसमें ‘ब्रेकथ्रू न्यूज़’, ‘कोडपिंक’ और ‘पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन’ जैसे वामपंथी संगठन शामिल हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार, प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल नामक एक अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद विरोधी संगठन ने 16 अक्टूबर को अपनी वेबसाइट पर एक ब्रीफिंग के दौरान फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को एक साथ जोड़कर पेश किया। इसी ब्रीफिंग में सवाल उठाया गया कि ये नए विद्रोह संगठित होकर क्या इतना ताकतवर हो सकते हैं कि उन हालात को बदल दें, जिनके चलते ये विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
आईएपी और ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल गठजोड़
असरा की खोजी रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला नाम आया है फ्रांस स्थित संगठन ‘इंडियन अलायंस पेरिस’ यानी आईएपी का। IAP यह संगठन फ्रांस में स्थित भारतीय छात्रों, शोधकर्ताओं और प्रोफेशनल्स का एक ग्रुप है। इस संगठन ने फ्रांसीसी दंगों के साथ ही भारत में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों, मसलन चुनाव आयोग के खिलाफ हालिया प्रदर्शन व छात्र असंतोष को एक ही धागे में पिरोने की भूमिका निभाई है।
असरा नोमानी की खोजी रिपोर्ट में ‘ट्राइकॉन्टिनेंटल’ नामक एक रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी जिक्र है, जिसका नेतृत्व विजय प्रशांत करते हैं। इस रिपोर्ट में विजय प्रशांत के 18 अक्टूबर को ‘X’ (ट्विटर) पर लिखी एक पोस्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने पेरिस, नई दिल्ली और ब्यूनस आयर्स में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच समानताएं बताईं हैं। इस पोस्ट में विजय प्रशांत ने आगे लिखा है कि गुस्से को अपना समय लेने दें, क्योंकि गुस्सा ताकत बन सकता है।
असरा की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि अशांति फैलाने वाले इस नेटवर्क की पहुंच सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेटवर्क फ्रांस में आगे के प्रदर्शनों और 20 नवंबर को समूचे यूरोप में व्यापक युवा आंदोलन की तैयारी कर रहा है। साफ है कि अलग-अलग देशों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर जारी प्रदर्शनों के पीछे बड़ा वैश्विक नेटवर्क काम कर रहा है।
– उमेश चतुर्वेदी
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ये पैसा बोलता है….
भारत में रिजीम चेंज के लिए केवल प्रशांत भूषण और राहुल गांधी ही काम नही कर रहे हैं। एक बड़ा वैश्विक नेटवर्क इसमें लगा हुआ है। इसे समझने के लिए 2014 के बाद के उस नीतिगत बदलाव को पकड़ना होगा जो भारतीय शासन और राजनीति में एनजीओज के माध्यम से नियंत्रण की भूमिका को खत्म करने वाला रहा है।
एक दौर में केंद्रीय कैबिनेट और प्रधानमंत्री से ऊपर सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद हुआ करती थी जिसमें अरुणा राय, हर्ष मन्दर, जया द्रेज जैसे एनजीओजीवी देश को चलाते थे। सरकार वैश्विक ताकतों के इशारों पर काम करती थी। मोदी सरकार ने इस सिस्टम को खत्म कर दिया। विदेशी चंदे की दुकानें प्राय खात्मे की तरफ है। यह रिजीम चेंज की पुकार इसी प्रभुत्व के ढहने की कहानी है। जॉर्ज सोरोस से लेकर नेवल राय सिंघम असल में वे चेहरे हैं जो लोकतंत्र और सामुदायिक विकास के नाम पर कठपुतली सरकारों के जरिये अपने व्यापारिक हित साधते हैं। ताजा प्रदर्शन भारत में इसी आलोक में देखे जाने चाहिए।
नेविल रॉय सिंघम कौन हैं?
वे अमेरिका में जन्मे टेक उद्यमी हैं और ThoughtWorks सॉफ्टवेयर कंपनी के संस्थापक रहे हैं। उन्होंने 2017 में कंपनी बेच दी थी और बाद में सामाजिक तथा राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े संगठनों को वित्तीय सहायता देने के कारण चर्चा में आए।
अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति ने सिंघम से जुड़े तीन गैर-लाभकारी संगठनों—The People’s Forum, BreakThrough News और Tricontinental से वित्तीय एवं संगठनात्मक रिकॉर्ड माँगे।
भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरुद्ध प्रदर्शनों में जिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सार्वजनिक संलिप्तता नजर आ रही है वे यही संगठन हैं।
– यह रिश्ता क्या कहलाता है…!
भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध प्रदर्शनों और एसआईआर विरोध के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को समझने की नितांत आवश्यकता है। इसे समझने के लिए एक सिरा जॉर्ज सोरोस का पकड़ना पड़ेगा। इस अराजकतावादी वामपंथी कारोबारी ने 2024 , 2019 के चुनाव में खुलेआम मोदी सरकार को उखाड़ने के लिए अपना खजाना खोल दिया था।
“हिन्दुज फ़ॉर ह्यूमन राइट्स” नामक एक सन्गठन की सीधी भूमिका दिल्ली के प्रदर्शन में पाई गई है।
यह अमेरिका स्थित मानवाधिकार संगठन है जो भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिक अधिकारों से संबंधित मुद्दों पर अभियान चलाता है। ओपन सोसायटी फाउंडेशन जिसका मालिक जार्ज सोरोस है उसकी संस्था ने इस संगठन को 60 हजार डॉलर की फ़ंडिंग की है।
रिपोर्ट में एचएफएचआर द्वारा भारत के एसआईआर और मुख्य निर्वाचन आयुक्त से संबंधित प्रदर्शनों के समर्थन तथा विदेशों में एकजुटता रैलियाँ आयोजित करने का उल्लेख है।
वीमन फ़ॉर अफगान वीमन
जॉर्ज सोरोस से फंड पाने वाला यह एनजीओ भी दिल्ली में जारी प्रदर्शन के मामले में राडार पर है। इसकी सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ एचएफएचआर की भी सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं।
साउथ एशिया सोलिडेरिटी ग्रुप
यह लंदन स्थित दक्षिण एशिया-केंद्रित एनजीओ है।
लंदन में ध्रुव राठी से जुड़े कार्यक्रम और भारत के प्रदर्शनों के समर्थन में अभियान चलाने में भूमिका निभा रहा है। इसी एनजीओ ने भारतीय प्रवासी समुदाय को एसआईआर विरोध और मुख्य निर्वाचन आयुक्त से संबंधित मांगों के समर्थन के लिए प्रेरित किया।
कॉम्पेक्ट
यह जर्मनी में रजिस्टर एक नागरिक अभियान संगठन है।
इसका सीधा संबन्ध जॉर्ज सोरोस से जुड़े वित्तीय नेटवर्क और ग्लोबल प्रोग्रेसिव अलाइंस के साथ है।
इस नेटवर्क के माध्यम से पश्चिमी राजनीतिक समूहों और भारतीय विपक्ष की गतिविधियों के बीच सीधा कनेक्शन स्थापित मिलता है। ताजा विरोध प्रदर्शनों के बीच यह नेटवर्क पूरी ताकत से सक्रिय है।
ग्लोबल प्रोग्रेसिव अलायंस
विभिन्न देशों के प्रगतिशील, वामपंथी और कथित सामाजिक-लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों का अंतरराष्ट्रीय मंच यह एनजीओ है। इसका वित्तीय रिश्ता सोरोस के साथ है।
एक रिपोर्ट के अनुसार राहुल गांधी की अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक भूमिका और विदेशी प्रदर्शनों के पीछे इस एनजीओ की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ताजा प्रदर्शन और इसके पक्ष में उठने वाली वैदेशिक लहर के पीछे भी इसी एनजीओ की पीआर टीम काम कर रही है।
संभावना इंस्टिट्यूट फाउंडेशन
प्रशांत भूषण का संभावना इंस्टीट्यूट फाउंडेशन एनजीओ भी ऐसे ही चंदे का लाभार्थी है। इसने पिछले चुनाव में हजारों पत्रकारों को सोशल मीडिया साक्षरता और जागरुकता के नाम पर फ़ंडिंग की जिसमें लगभग सभी मीडिया घरानों के पत्रकार शामिल थे।
– डॉ. अजय खेमरिया

