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माओवादी आतंक समाप्त : मोदी सरकार में कितना बदला बस्तर?

माओवादी आतंक समाप्त : मोदी सरकार में कितना बदला बस्तर?

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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अक्सर कुछ लोग कहते मिल जाते हैं कि भाजपा और मोदी सरकार में क्या ही बदला है? ये इतना सामान्यीकरण करने वाला प्रश्न है, जो किसी के गले नहीं उतरता है। कहीं और की बात न करें केवल छत्तीसगढ़ और बस्तर को ही देखें तो हमें पूरी तस्वीर ही अलग दिखाई देती है।
भाजपा सरकार ने तय समय पर 31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ समेत देश को सशस्त्र माओवादी आ-तंक से मुक्त कर दिया। बस्तर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का पहुंचना। ये कोई सामान्य बात नहीं है। ये इतिहास की वो लकीर है, जो राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और समृद्धि की संघर्षमय-प्रतिबद्धता की कहानी कहती है। 2024 में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ये ऐलान किया था। उस समय लोग विश्वास नहीं कर रहे थे। ‘विरोध के लिए विरोध करने वाले’ धड़े, उपहास उड़ा रहे थे। किन्तु जब तय समयसीमा में देश से माओवादी आ-तंक (नक्सलवाद) समाप्त हो गया तो विरोध करने वाले उपहास का पात्र बनकर रह गए। हालांकि ‘अर्बन नक्सली’ और उन्हीं के र-क्तबीज ‘दिमागी नक्सली’ आज भी बस्तर में आंखें गड़ाए बैठे हैं। किन्तु वो अब कभी भी सफल नहीं हो पाएंगे। क्योंकि पूरा समाज जाग चुका है।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 23 अक्टूबर 2026 को बस्तर में राष्ट्रपति का जाना हुआ है। सैकड़ों साल पुरानी ‘मुरिया दरबार’ परंपरा और वहां की कई परंपराओं से राष्ट्रपति का साक्षात्कार होना, हमारी सांस्कृतिक अन्तश्चेतना का प्रतिबिम्ब है। ये कोई सामान्य बात नहीं है। यह उस संकल्प की परिणति है, जो संकल्प— बस्तर की ख़ुशहाली के लिए प्रतिबद्ध है।

राष्ट्रपति के दौरे से पहले बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार का नाम बदलने पर मचा बवाल

बस्तर में यही लोकतन्त्र का उदय है। जहां अब लोग निर्भय होकर जीवन जी रहे हैं। राष्ट्रप्रमुख उनके बीच पहुंच रहे हैं। जबकि इसके पहले ‘अर्बन नक्सलियों’ की कमांड से संचालित होने वाले सशस्त्र माओवादी— वहां हिं-सा, रक्त’-पात का वीभत्स खेल, रचते थे। ‘जनताना’ सरकार के नाम पर भारत के लोकतन्त्र और संविधान को चुनौती देते थे। इन्हें किस विचार और पूर्ववर्ती सरकार का घोषित-अघोषित समर्थन प्राप्त था? क्या ये किसी से छिपा है? लेकिन अब नक्सली नेस्तनाबूद हो चुके हैं। जिन माओवादियों ने सरेंडर किया है। उनके पुनर्वास के कार्यक्रम चल रहे हैं। उनको कौशल सम्पन्न बनाया जा रहा है। मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है। ये केंद्र की मोदी और राज्य की साय सरकार ने ही कर दिखाया है। आप इनकी और मुद्दों पर आलोचना कर सकते हैं। लेकिन माओवादी आ-तंक को समाप्त करने का जो साहसिक कार्य भाजपा सरकार ने किया है। वो ‘न भूतो न भविष्यति’ जैसा ही है।

अब बस्तर में – बस्तर पंडुम हो रहा है, बस्तर ओलंपिक हो रहा है। पर्यटन का विस्तार हो रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सड़कों का नया जाल बुना जा रहा है। भारत की राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मु का बस्तर पहुंचना भी कोई सामान्य बात नहीं है। उनका राष्ट्रपति बनना भी कोई साधारण बात नहीं थी। ये भी ध्यान रखना चाहिए कि- जनजातीय समाज से आने वाली बेटी ‘द्रौपदी मुर्मु’ को भाजपा ने सर्वोच्च पद राष्ट्रपति की आसंदी तक पहुंचाया है। जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने- जनजातीय समाज की इसी बेटी के ख़िलाफ़ अपना उम्मीदवार उतारा था। वो किसी भी स्थिति में जनजातीय समाज से आने वाली बेटी को राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे। भला, कांग्रेस और इंडी गठबंधन को जनजातीय समाज के विरोध में आने से क्या हासिल हुआ? क्या ये कॉलोनियल माइंडसेट नहीं था, जो जनजातीय समाज को कभी भी स्वीकार नहीं करना चाहता है?

वहीं गाहे-बगाहे कुछ लोग भारत के लोकतन्त्र को नसीहतें देते रहते हैं। उपनिवेश की मानसिकता के गुलाम आज भी कहते हैं कि —“15 अगस्त 1947 के बाद ही भारत में लोकतन्त्र आया।” ऐसे में उन्हें बस्तर के ‘मुरिया दरबार’ को जानना चाहिए। जहां सैकड़ों सालों से लोकतन्त्र और जन-संवाद का अद्भुत उदाहरण मिलता है। सैकड़ों गांवों के मांझी, चालकी और प्रतिनिधि ‘मुरिया दरबार’ में अपनी बातें रखते थे। क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर गहन, चिंतन और विमर्श करने की परंपरा निर्बाध रूप से जारी है। जहां पूरा समाज एक-दूसरे का पूरक है। भारत के कोने-कोने में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। अंतर केवल इतना है कि भारत ने लोकतन्त्र शब्द का झुनझुना नहीं बजाया बल्कि लोकतन्त्र को जीवन में उतारा है। इसे शराब और ऐय्याशी में डूबे एसी कमरों में बैठने वाले तथाकथित अकादमिक जल्लाद और गल्पकार (इतिहासकार) नहीं समझ सकते हैं।

Abujhmarh, N Bastar Naxal-free, says Shah as 170 Reds to surrender today | Raipur News - The Times of India

ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि वो लोग जो हमारे जनजातीय बांधवों को अपने चश्मे से दिखाते हैं। बताते हैं कि ‘आदिवासी हिन्दू नहीं हैं।’ वो 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरे को देखें। हमारा जनजातीय समाज ही बस्तर दशहरे का मुख्य कर्ताधर्ता है। पारंपरिक रीति-रिवाजों, मान्यताओं का जितना कड़ाई से जनजातीय समाज पालन करता है। उसका हम आप सहस्त्रांश नहीं कर पाते। यही हिन्दुत्व का विराट स्वरूप है।

ये जो जात-पात, वाद आदि के ज़’हर से समाज को तोड़ने की साज़िश करते रहते हैं। वो ज़रा! पूरे बस्तर दशहरा में एक कोई प्रकरण ढूंढ़ कर ला दें। जब पूरे बस्तर दशहरे के आयोजन के बीच कहीं कोई भेदभाव होता हो। यहां हर समाज के लोग बस आस्था और परंपरा के रंगों में डूबे मिलते हैं। प्रसन्नता के साथ धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करते मिलते हैं। कहने का आशय ये है कि —अब बस्तर में बारूद की गंध नहीं है। अब बस्तर में प्रकृति, संस्कृति, परिवर्तन और विकास की नई चेतना हिलोरें ले रही है। ये इसीलिए संभव हो पाया है क्योंकि देश की जनता ने प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी को दिल्ली में चुनकर भेजा है। जो ‘विकास और विरासत’ को एक साथ लेकर चलने के लिए संकल्पबद्ध है।
आप सोचिए कि — अगर केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार नहीं होती तो क्या देश से माओवादी आ-तंक समाप्त हो पाता? क्या धारा-370 ख़त्म हो पाती? बस्तर में हम जो दृश्य देख पा रहे हैं क्या वो कभी दिख पाते? ज़रा ! इन सवालों के ज़वाब ख़ुद से एक बारगी ज़रूर पूछिएगा!

– कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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