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मणिपुर में शांति के प्रयास और सरकार की प्राथमिकताएं

मणिपुर में शांति के प्रयास और सरकार की प्राथमिकताएं

by हिंदी विवेक
in राजनीति
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मणिपुर में स्थायी शांति की स्थापना आज पूरे राष्ट्र के लिए एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। मई 2023 से राज्य में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच जो जातीय हिंसा और अविश्वास की खाई उत्पन्न हुई है, उसने वहां के सामाजिक ताने बाने को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। इस अप्रत्याशित हिंसा के कारण न केवल सैकड़ों निर्दोष लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, बल्कि लगभग 1 लाख से अधिक नागरिकों को अपने घरों को छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा है। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर इस विस्थापन का गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण और तनावपूर्ण वातावरण में राज्य के भीतर सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करना, सशस्त्र विद्रोही समूहों की अवांछित गतिविधियों पर अंकुश लगाना और आम नागरिकों के जीवन की रक्षा करना प्रशासन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियां बनकर उभरी हैं। इन जटिल चुनौतियों का समाधान केवल सैन्य बल प्रयोग से कदापि संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए एक पारदर्शी, जवाबदेह और व्यापक संवाद आधारित प्रशासनिक व्यवस्था की नितांत आवश्यकता है।

इसी सकारात्मक दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में 25 अक्टूबर 2026 को राज्य के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने कांगपोकपी जिले में स्थित सिनाई शिविर का सघन दौरा किया। यह दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्थानीय समाचार माध्यमों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह पहला अवसर था जब किसी पदस्थ मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार और विद्रोही गुटों के बीच हुए बहुचर्चित अभियान निलंबन समझौते के अंतर्गत निर्धारित किसी शिविर का प्रत्यक्ष रूप से निरीक्षण किया। यह विशिष्ट समझौता मुख्य रूप से इसलिए किया गया था ताकि सशस्त्र समूह मुख्यधारा में लौट सकें, अवैध हथियारों का प्रयोग बंद हो और राज्य में शांति प्रक्रिया को जमीनी स्तर पर बल मिल सके। मुख्यमंत्री का यह साहसिक कदम यह दर्शाता है कि वर्तमान राज्य सरकार अब इन समझौतों की जमीनी हकीकत को परखने और सुरक्षा तंत्र में मौजूद गंभीर खामियों को दूर करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

सिनाई शिविर का यह पूरा मामला तब और भी अधिक चर्चा और चिंता का विषय बन गया जब एक संयुक्त सुरक्षा अभियान के पश्चात इस शिविर को पूरी तरह से निरस्त्र कर दिया गया और इसे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने अपने सीधे नियंत्रण में ले लिया। इस सघन सुरक्षा कार्रवाई के दौरान जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, वे राज्य की आंतरिक सुरक्षा प्रणाली और अभियान निलंबन समझौते के वास्तविक पालन पर कई गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। जांच के दौरान वहां 17 ऐसे व्यक्ति पकड़े गए जो पंजीकृत सदस्य होने का जाली दावा कर रहे थे और उनके पास से फर्जी पहचान पत्र भी प्राप्त हुए। राज्य के आरक्षी अधिकारियों और खुफिया एजेंसियों की आरंभिक पड़ताल के अनुसार, इन 17 व्यक्तियों में से 8 ने एक विशिष्ट जातीय राष्ट्रीय सेना का सदस्य होने का दावा किया, जबकि अन्य 9 व्यक्तियों ने एक अलग मुक्ति सेना का सदस्य होने की झूठी पहचान प्रस्तुत की।

Manipur CM Yumnam Khemchand Singh visits seized Kuki camp after 17 held for  impersonating SoO cadres - Manipur CM Yumnam Khemchand Singh visits seized  Kuki camp after 17 held for impersonating SoO cadres -

इस सघन और गोपनीय अभियान के दौरान सुरक्षा बलों ने भारी मात्रा में घातक हथियार और विस्फोटक सामग्री बरामद की, जिसने सभी को चौंका दिया। प्राप्त विवरण के अनुसार, वहां से 24 अत्याधुनिक आग्नेयास्त्र, 38 कारतूस रखने के पात्र, भारी मात्रा में मारक गोला बारूद, जानलेवा विस्फोटक और उच्च स्तरीय संचार उपकरण जब्त किए गए। हथियारों का यह विशाल जखीरा इस बात का स्पष्ट और अकाट्य संकेत है कि अभियान निलंबन समझौते के तहत निर्धारित नियमों का कहीं न कहीं घोर उल्लंघन हो रहा था। सबसे अधिक चिंताजनक बात यह है कि इस शिविर की कुल क्षमता 150 सदस्यों को रखने की थी, लेकिन वहां केवल वे 17 लोग मिले जिनकी पहचान पूरी तरह से जाली पाई गई। यह अनपेक्षित स्थिति प्रशासन और खुफिया एजेंसियों के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा करती है कि आखिर असली पंजीकृत सदस्य कहां गए, ये जाली लोग इतनी कड़ी सुरक्षा वाले शिविर के भीतर कैसे प्रविष्ट हुए और इतनी बड़ी मात्रा में अवैध हथियार किसके संरक्षण और सहमति से वहां रखे गए थे।

मुख्यमंत्री ने अपने दौरे के समय उपस्थित सभी शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों को स्पष्ट और सख्त निर्देश दिए कि किसी भी सुरक्षा अभियान के दौरान निर्दोष नागरिकों के जीवन और उनकी संपत्ति को कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। उन्होंने भटके हुए युवाओं और विद्रोही गुटों से मार्मिक अपील की कि वे तत्काल प्रभाव से हिंसा का विनाशकारी मार्ग छोड़ें, अपने सभी अवैध हथियार प्रशासन को बिना किसी शर्त के सौंप दें और समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर राज्य के नवनिर्माण और विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दें।

मुख्यमंत्री का यह संदेश बहुत स्पष्ट है कि हिंसा और प्रतिशोध की संस्कृति को समाप्त किए बिना मणिपुर में स्थायी और सुदृढ़ शांति का सपना कभी साकार नहीं हो सकता। इसके साथ ही, उन्होंने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि किसी एक हिंसक घटना के लिए पूरे के पूरे समुदाय को लांछित या दंडित करना घोर अनुचित है। अपराधियों की पहचान उनके व्यक्तिगत कृत्यों से होनी चाहिए, न कि उनकी जातीय या धार्मिक पहचान के आधार पर।

हाल ही में राज्य में हुई 3 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या और सिनाई शिविर से मिले जाली सदस्यों के मामले को अलग अलग दृष्टिकोण से देखने और जांचने की आवश्यकता है। यद्यपि ये दोनों घटनाएं राज्य की लचर कानून व्यवस्था से जुड़ी हैं, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से इनके बीच कोई ठोस संबंध अभी तक स्थापित नहीं हुआ है। न्याय के सर्वमान्य और मूल सिद्धांतों के अनुसार, दोनों मामलों की बिल्कुल पृथक, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। केवल पुख्ता साक्ष्यों और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर ही वास्तविक दोषियों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें न्यायालय के माध्यम से कठोर दंड दिया जाना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी अमानवीय घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके। जांच एजेंसियों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे हर प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक और जातीय दबावों से पूरी तरह मुक्त होकर अपना कार्य पूरी निष्ठा के साथ करें।

मणिपुर में शांति, सद्भाव और विश्वास की बहाली के लिए केवल हथियारों की जब्ती और विद्रोही शिविरों की कड़ी निगरानी ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक बहुआयामी और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने की नितांत आवश्यकता है। केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सुरक्षा बलों, विभिन्न नागरिक संगठनों और समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों के बीच निरंतर, पारदर्शी और सार्थक संवाद होना चाहिए। सुरक्षा बलों को अपनी सभी कार्रवाइयों में पूर्ण पारदर्शिता लानी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि वे मानवाधिकारों के सख्त दायरे में रहकर ही अपना कर्तव्य निभाएं। विस्थापित परिवारों की उनके मूल स्थानों पर सुरक्षित वापसी और उनका समग्र पुनर्वास इस समय प्रशासन की सबसे बड़ी और अनिवार्य प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्हें न केवल पर्याप्त आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए, बल्कि उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास भी जगाना होगा कि वे अब अपने घरों में पूरी तरह से सुरक्षित हैं।

इसके अतिरिक्त, प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के छिने हुए अवसरों को तत्काल प्रभाव से बहाल करना भी अत्यंत आवश्यक है। जब तक युवाओं के हाथों में रोजगार नहीं होगा और वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित रहेंगे, तब तक उनके असामाजिक तत्वों द्वारा गुमराह होने की आशंका निरंतर बनी रहेगी। विभिन्न समुदायों के बीच पनपे गहरे अविश्वास की दीवार को गिराने के लिए सांस्कृतिक आदान प्रदान कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और ग्राम स्तर पर शांति समितियों का सक्रिय रूप से गठन किया जाना चाहिए।

अंततः, मणिपुर की वास्तविक और स्थायी सफलता इसी बात में निहित है कि वहां का प्रत्येक नागरिक, चाहे वह किसी भी समुदाय, वर्ग या क्षेत्र का हो, बिना किसी भय, तनाव या आशंका के अपना गरिमापूर्ण जीवन यापन कर सके। त्वरित और निष्पक्ष न्याय, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारदर्शी प्रशासनिक जवाबदेही और अटूट आपसी भाईचारे के माध्यम से ही इस प्राकृतिक रूप से खूबसूरत राज्य को पुनः स्थायी शांति और निरंतर विकास के सुनहरे मार्ग पर अग्रसर किया जा सकता है।

– महेन्द्र तिवारी

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