देह दिखाई देती है, संस्कार नहीं, फिर भी व्यक्ति की वास्तविक पहचान अंततः उसके संस्कार और आचरण से ही बनती है। नारे नहीं, ज्ञान चुनिए; उच्छृंखलता नहीं, स्वतंत्रता चुनिए; भोग नहीं, योग्यता चुनिए; अनुकरण नहीं, विवेक चुनिए। यही नारी-सम्मान से नारी-सशक्तीकरण और नारी-सशक्तीकरण से राष्ट्र-सशक्तीकरण की यात्रा है।
आज स्त्री-विमर्श केवल महिलाओं के अधिकारों का प्रश्न नहीं है बल्कि यह समाज की दिशा, परिवार की स्थिरता और राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा विषय है। स्त्री को शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए, किंतु प्रश्न यह भी है कि स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? क्या स्वतंत्रता केवल अपनी देह, अपनी इच्छाओं और उपभोग की स्वायत्तता है अथवा अपने विवेक, आत्मसम्मान, कर्तव्य और जीवन-निर्णयों का दायित्व भी? यहीं से पश्चिमी नारीवाद और भारतीय स्त्री-दृष्टि के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।
पश्चिमी समाज की विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों में विकसित प्रत्येक विचार भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में उसी रूप में लागू हो, यह आवश्यक नहीं। भारतीय परम्परा ने स्त्री को केवल एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि परिवार, समाज और संस्कृति की धुरी तथा सृजन और संस्कार की आधारशिला के रूप में देखा है। भारतीय दृष्टि में नारी शक्ति है, सहधर्मिणी है, जननी है, सृजनकर्ता है और संस्कारों की प्रथम शिक्षिका भी है। महाभारत का उद्घोष है- नास्ति मातृसमो गुरुः- माता के समान कोई गुरु नहीं। इसी भावभूमि में नारी को सम्मान, सृजन और संस्कार की केंद्रीय शक्ति माना गया। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री को केवल परिवार तक सीमित कर दिया जाए बल्कि यह कि उसकी भूमिका व्यक्तिगत जीवन से कहीं व्यापक मानी गई। गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होलकर, रानी लक्ष्मीबाई और सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाओं ने ज्ञान, शासन, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
नारीवाद की विकृति से सावधान
समस्या नारीवाद शब्द में नहीं बल्कि उसके कुछ अतिवादी और विकृत रूपों में है। जब महिला-मुक्ति का अर्थ पुरुष-विरोध, परिवार-विरोध या सामाजिक उत्तरदायित्व से मुक्ति मान लिया जाता है, तब विमर्श अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। विशेष रूप से कुछ अतिवादी वैचारिक प्रवृत्तियां स्त्री की मुक्ति को उसकी पहचान, सम्बंधों और सामाजिक दायित्वों से अलग करके केवल व्यक्तिगत स्वायत्तता और उपभोग की स्वतंत्रता से जोड़ती हैं। इसका परिणाम कभी-कभी यह होता है कि मेरा शरीर, मेरी आजादी जैसी अभिव्यक्ति को उसके व्यापक संदर्भ से काटकर केवल भोगवादी स्वतंत्रता का घोष बना दिया जाता है।
निश्चित रूप से प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर और जीवन के सम्बंध में गरिमा और स्वायत्तता का अधिकार है, पर स्वतंत्रता के साथ विवेक भी आवश्यक है। प्रश्न होना चाहिए- क्या जो कुछ मुझे करने की स्वतंत्रता है, वह मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए और समाज के लिए वास्तव में हितकारी भी है? स्वतंत्रता जब आत्मनियंत्रण और विवेक से जुड़ी हो तो शक्ति बनती है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी देशों में मेरी मर्जी के नाम पर यौन स्वच्छंदता और दायित्व के अभाव से किशोर गर्भधारण तथा अकेले मातृत्व जैसी सामाजिक चुनौतियां सामने आई हैं। इसलिए स्वतंत्रता के साथ संयम और उत्तरदायित्व भी आवश्यक हैं।
देह से आगे- नारी का वास्तविक सामर्थ्य
भारतीय चिंतन ने मनुष्य को केवल उसकी देह तक सीमित करके कभी नहीं देखा। देह मनुष्य की पहली पहचान हो सकती है, अंतिम नहीं। शरीर के साथ मन है, मन के साथ बुद्धि है और इन सबसे ऊपर संस्कारों से निर्मित वह चेतना है, जो व्यक्ति के आचरण को दिशा देती है। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि व्यक्ति क्या पहनता है बल्कि यह भी है कि किस अवसर पर, किस संदर्भ में और किस भाव के साथ स्वयं को प्रस्तुत करता है। समकालीन भारत में रक्षाबंधन के अवसर पर अभिनेत्री कृति सेनन के ॠखत- विज्ञापन को लेकर उठा विवाद इसी प्रश्न का एक उदाहरण है। विज्ञापन की प्रस्तुति और परिधान को लेकर सोशल मीडिया पर बहस हुई। इस विवाद को केवल महिला क्या पहने? के प्रश्न तक सीमित करना उचित नहीं होगा। किसी महिला का निजी पहनावा उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है, परंतु किसी धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व के सार्वजनिक विज्ञापन में वही पहनावा एक व्यापक संदेश और प्रतीक का हिस्सा बन जाता है। इसलिए वहां व्यक्तिगत पसंद के साथ पर्व की गरिमा, सांस्कृतिक प्रतीकों के सम्मान और संदर्भ की संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने जीवन के सामान्य सम्बंधों को भी संस्कारों का रूप दिया। परम्परा नदी की तरह होती है- समय के साथ उसमें नया जल आता है, किनारे बदलते हैं, पर उसकी मूल धारा बनी रहती है। यदि उत्सव का सांस्कृतिक भाव समाप्त होकर केवल उसका बाजारू रूप शेष रह जाए तो बाहरी स्वरूप तो बच सकता है, परंतु उसका संस्कार कमजोर पड़ सकता है। भगवद्गीता (3.21) में कहा गया है- ‘श्रेष्ठजन जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।‘ इसलिए सार्वजनिक जीवन में संस्कृति और परम्परा की प्रस्तुति करने वालों पर अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक जिम्मेदारी को समझने का दायित्व भी है।
स्वतंत्रता और दायित्व
आज ‘पिंजरा तोड़ो’ जैसी भाषा युवाओं में आकर्षण पैदा करती है। हर उस पिंजरे को तोड़ना आवश्यक है जो भेदभाव, हिंसा, अशिक्षा और अन्याय से बना है, पर हर सीमा पिंजरा नहीं होती।
अनुशासन पिंजरा नहीं है, परिवार पिंजरा नहीं है, संस्कार पिंजरा नहीं हैं, दायित्व पिंजरा नहीं है। ये स्वतंत्रता के विरोधी नहीं बल्कि उसे दिशा देने वाले आधार हैं।
नशे और भोग-विलास को आधुनिकता का प्रतीक बनाना भी चिंताजनक है। NFHS 5 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं में शराब सेवन का अनुपात 2.0% और तम्बाकू सेवन का अनुपात 4.8% था। यह आंकड़ा किसी एक लिंग को दोष देने के लिए नहीं बल्कि यह समझने के लिए है कि स्वस्थ और नशामुक्त जीवन भी सशक्तीकरण का हिस्सा है। इसी प्रकार सोशल मीडिया की असीमित स्वतंत्रता भी हमेशा वास्तविक स्वतंत्रता नहीं होती। LIKES,TRENDS, COMPARISON और बाहरी स्वीकृति की निर्भरता विशेषकर युवतियों के लिए एक आधुनिक अदृश्य पिंजरा बनती जा रही है। वायरल होने की होड़ में अश्लील या REELS के माध्यम से पहचान और स्वीकृति पाने की प्रवृत्ति इस नए बंधन का उदाहरण है। इसलिए हर वायरल विचार प्रगतिशील नहीं और हर विद्रोह क्रांतिकारी नहीं होता। सच्ची स्वतंत्रता विवेक, आत्मसम्मान और मर्यादा से आती है।
भारत की महिलाएं- वास्तविक परिवर्तन की वाहक
यदि हम महिलाओं के वास्तविक योगदान को देखें तो तस्वीर अत्यंत प्रेरणादायी है। झङऋड 2023-24 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं की Labour Force Participation Rate 2017-18 के 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई। यह बदलते भारत में महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी का महत्वपूर्ण संकेत है। ग्रामीण भारत में स्वयं सहायता समूहों ने महिला सशक्तीकरण का नया मॉडल प्रस्तुत किया है। जून 2025 तक DAY – NRLM के अंतर्गत 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवार लगभग 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़े थे और 1.48 करोड़ महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी थीं। यह वास्तविक महिला सशक्तीकरण है- जो हाथ परिवार सम्भालते हैं, वही हाथ अर्थव्यवस्था भी सम्भाल सकते हैं।
परिवार-कमजोरी नहीं, सामाजिक शक्ति
परिवार को पिछड़ेपन का प्रतीक मान लेना भी भारतीय सामाजिक संरचना को समझने में भूल होगी। परिवार स्त्री को सीमित करने का साधन नहीं होना चाहिए, परंतु परिवार को तोड़ना भी महिला मुक्ति का पर्याय नहीं हो सकता। TIME USE SURVEY अनुसार 15-59 आयु वर्ग की 41% महिलाओं ने घरेलू सदस्यों की देखभाल सम्बंधी कार्यों में भाग लिया, जबकि पुरुषों में यह 21.4% था। महिला प्रतिभागियों ने इन कार्यों में औसतन 140 मिनट प्रतिदिन लगाए, जबकि पुरुषों ने 74 मिनट। यह आंकड़ा दो बातें बताता है- महिलाओं के अदृश्य श्रम को पहचानना आवश्यक है और परिवार की जिम्मेदारियों को केवल महिला का दायित्व मानना भी उचित नहीं। समाधान परिवार-विरोध नहीं बल्कि जिम्मेदारियों का न्यायपूर्ण साझाकरण है।
अंततः भारत की नारी केवल घर की चौखट की संरक्षिका नहीं, राष्ट्र-निर्माण की सहभागी है। उसकी ममता में संस्कार हैं, उसके श्रम में सृजन है, उसके ज्ञान में दिशा है और उसके नेतृत्व में परिवर्तन की शक्ति है। शिक्षा से विज्ञान तक, खेत से प्रयोगशाला तक, प्रशासन से सेना तक, राजनीति से उद्यमिता तक- उसकी बढ़ती भागीदारी नए भारत की उभरती तस्वीर है। इसलिए नारी-शक्ति को केवल नारों में नहीं, उसके ज्ञान, श्रम, नेतृत्व, मातृत्व, उद्यमिता और सामाजिक योगदान में पहचानना होगा। भारत को ऐसा नारी-विमर्श चाहिए, जहां स्त्री और पुरुष प्रतिद्वंद्वी नहीं, राष्ट्र-प्रगति की सहयात्री हों; जहां स्वतंत्रता स्वच्छंदता नहीं, आत्मसम्मान बने; जहां अधिकार के साथ उत्तरदायित्व हो; जहां आधुनिकता अपनी जड़ों से संवाद करे और शिक्षा केवल रोजगार नहीं, विवेक और चरित्र का निर्माण करे क्योंकि जब नारी आगे बढ़ती है तो केवल एक व्यक्ति नहीं बढ़ता- एक परिवार, एक समाज जागता और एक राष्ट्र नई ऊंचाई की ओर बढ़ता है।
डॉ. शिवानी कटारा
