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लोकसभा चुनाव के नगाड़े देशभर में गूंज रहे हैं। 11 अप्रैल से आरंभ होने वाला मतदान 19 मई तक चलने वाला है। चुनावों में पारदर्शिता के प्रति चुनाव आयोग भी अत्यंत सतर्क है। 2014 के चुनाव की तुलना में इस चुनाव में लगभग 8 करोड़ 43 लाख मतदाता बढ़े हैं। इस वर्ष कोई 90 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें 18 से 19 वर्ष के दो करोड़ युवा मतदाता पहली बार मतदान करेंगे। चुनाव और लोकतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलू माने जाते हैं। अपने हित की दृष्टि से सरकार चुनने का मार्ग भारतीय संविधान ने नागरिकों को दिया है। भारत में होने वाले विभिन्न चुनावों में लोकसभा के आम चुनाव सबसे अधिक महत्वपूर्ण माने जातेे हैं। देश का आर्थिक, सामाजिक विकास तथा सामरिक और विदेश नीतियां तय करने का अधिकार लोकसभा चुनाव में विजयी होने वाली सरकार को प्राप्त होता है। इसी कारण लोकसभा चुनाव का अधिक व्यापक महत्व है।

हममें से अधिकांश किसी न किसी को मतदान करते हैं। लेकिन, चुनाव का इतना ही अर्थ नहीं होता। चुनाव एक गंभीर और व्यापक प्रक्रिया है। हर मतदाता इस गंभीर प्रक्रिया का महत्वपूर्ण घटक होता है। मतदान करना और वह करते समय देश और समाज का हित ध्यान में रखकर मतदान का अपना कर्तव्य पूरा करना सशक्त लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। इस तरह मतदान के जरिए उचित शासन चलाने वाले प्रतिनिधियों का चयन करना ही चुनाव है।

संविधान ने हर नागरिक को मतदान का हक दिया है। यह मूलभूत अधिकार है। लेकिन हम इस अधिकार का किस तरह उपयोग करते हैं? कितनी गंभीरता से करते हैं? ये प्रश्न हैं ही। वास्तव में चुनाव में जब 40% अथवा 45% जैसे मतदान का प्रतिशत सामने आता है तब मन में प्रश्न उठता है कि क्या हमारे भारतीय नागरिक लोकतंत्र को वास्तव में समझे हैं? हमारे यहां मतदान का प्रतिशत क्यों नहीं बढ़ता? मतदान के दिन पूरे भारत में अवकाश घोषित होता है, इस छुट्टी का आनंद लेने, सैरसपाटे के लिए निकलने या विश्राम करने के लिए हम क्यों उपयोग करते हैं? मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के कष्ट क्यों नहीं उठाते? मन में फिर गंभीर प्रश्न उपस्थित होता है कि लोकतंत्र से प्राप्त मतदान के अधिकार का वास्तविक अर्थ क्या भारतीय नागरिक समझते हैं?

फिलहाल किसी भी पार्टी को वोट न करने याने ईवीएम पर मौजूद ‘नोटा’ बटन के उपयोग करने का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। 2017 में गुजरात विधान सभा चुनाव में साढ़े पांच लाख मतदाताओं ने ‘नोटा’ का इस्तेमाल किया। इस तरह राजनीतिक दलों पर अविश्वास उन्होंने जताया। ये चुनाव कांटे के रहे और अनेक सीटों के परिणामों पर इसका प्रभाव पड़ा। इसी तरह कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विधान सभा चुनावों पर भी इसका सीधा असर पड़ा। वैसे ‘नोटा’ का इस्तेमाल इसके पूर्व भी अनेक चुनावों में हुआ है। लेकिन कांटे की टक्कर में यह ‘नोटा’ गलत तरीके से निर्णायक साबित होता है, इसे हम साफ तौर पर अनुभव करने लगे हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव बहुत टक्कर के हो सकते हैं। इस पर हमें ध्यान देना चाहिए। ‘नोटा’ का इस्तेमाल करने का मतलब है देश और हमारे समक्ष समस्याओं को हम स्वेच्छा से ही निमंत्रित कर रहे हैं। मतदान करते समय ‘नोटा’ के अस्त्र का इस्तेमाल करने के बजाय ‘मतदान’ के अस्त्र का किस तरह उपयोग कर सकेंगे, इसका भारतीय जनमानस को विचार करना चाहिए। पुलवामा की घटना के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने स्थिति को पूरी सक्षमता से सम्हाला। देश गंभीर मोड़ पर था, सम्पूर्ण देश का जनमानस राष्ट्र के नाम पर एकजुट हो गया था, लेकिन विपक्ष मोदी को हटाने के रोज नए-नए पांसे फेंक रहा था। देशहित की अपेक्षा मोदी-द्वेष उन्हें अधिक महत्वपूर्ण लगता था। विपक्ष की टोलियां भारत जीतने की अपेक्षा मोदी को हराने पर ही तुली हुई हैं।

यूपीए-2 सरकार ने 2009 में सत्ता ग्रहण की और सालभर में ही भिन्न-भिन्न घोटाले सामने आने लगे। राष्ट्रमंडल खेल घोटाले से लेकर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले तक असंख्य और बड़े मामले सामने आने लगे। भारतीय विकास में रोड़ा बनी दुखती नस पहचान कर 2014 में मोदी सरकार को चुनकर जनता ने सत्ता परिवर्तन किया। मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त शासन की आश्वस्ति दी थी और उसे पांच वर्ष की अवधि में शतप्रतिशत अमल में लाया। इस सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक पटल पर भारत की शक्तिशाली देश के रूप में छवि कायम करने का प्रयास किया। उसमें उसे बड़े पैमाने पर सफलता भी मिली। 2014 में भारतीय जनता ने परिपक्व लोकतंत्र का परिचय दिया था। क्या 2019 के चुनावों में इस तरह की परिपक्वता भारतीय जनमानस प्रकट करेगा?

सच तो यह है कि जब हमें कोई अधिकार मिलता है तब हमारे कर्तव्य भी निर्धारित होते हैं। इसलिए मतदान करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर भारतीय नागरिकों को चुनाव के इस महाउत्सव में सहभागिता करनी चाहिए। देश का कामकाज ठीक से चले, नागरिकों की चिंता वहन करने वाली सरकार सत्ता में आए, विदेश नीति में विश्व के सामने दृढ़ता से खड़ी रहने वाली सरकार आए ऐसा यदि आपको लगता है तो आपको उचित सरकार का चुनाव करना चाहिए। उचित उम्मीदवारों को ही चुनकर लोकसभा में भेजना चाहिए। यह सब हमें ही करना है। कोई जादुई छड़ी घूमेगी और उचित सरकार सत्ता में आएगी ऐसा नहीं होगा। वास्तव में यह जादुई छड़ी भारतीय लोकतंत्र ने मतदान के जरिए भारतीय मतदाताओं के हाथ में दी है। इसका ध्यान मतदान के अपने अधिकार का उपयोग करते समय हमें रखना चाहिए। चुनाव की संकल्पना का महत्व समझकर और वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखकर भारतीय मतदाताओं को दंगल में उतरना चाहिए। नए भारत का सपना साकार करना हो तो भारतीय मतदाताओं को इसका अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

This Post Has One Comment

  1. Bahut hi utsah janak lekh hai jisase matdata me vote ke prati apana dayitv ka dhyan aata hai…

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