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एनसीपी जैसी एकाध क्षेत्रीय पार्टी के अलावा कांग्रेस को कोई साथ नहीं रखना चाहता। विपक्ष के महागठबंधन से यह बात साफ हो गई है कि क्षेत्रीय दल खुद ही कांग्रेस मुक्त भारत चाहते हैं।

उपचुनाव में मिली हार भाजपा के लिए एक सख्त संदेश है। उन दिनों अधिकतर लेखों का उपशीर्षक यही था। इसके अलावा सभी प्रकाशनों ने इसी तरह की खबरें और विचार रखे थे। एक संदेश यह था कि जब बसपा के समर्थन से सपा यूपी के फूलपुर एवं गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा को हरा सकती है तो उसी तरह सपा-बसपा एवं अन्य विपक्षी पार्टियां एक बैनर तले आ जाए तो 2019 के चुनाव में भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

सेक्युलर राजनेताओं से अधिक सेक्युलर मीडिया और सेक्युलर बुद्धिजीवी थे जिन्होंने यह सोचा था कि भाजपा को हराने के लिए एक सफल फार्मूला बना लिया है। बहरहाल, मैं भाजपा को हराने के लिए विपक्ष के गठबंधन सूत्रों की ओेर ध्यान आकर्षित कराना चाहूंगा।

मीडिया को एक बड़े उदाहरण के रूप में देखते हुए यदि हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस को मिलाकर एक नया अखबार बनाया जाए तो दोनों के पाठक इस नए अखबार के पाठक बन जाएंगे। जाहिर सी बात है, इस नए अखबार के पाठकों की संख्या टाइम्स ऑफ इंडिया से अधिक होगी। हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस का गठबंधन मुंबई एवं दिल्ली में ही होगा।

क्योंकि हिंदुस्तान टाइम्स के अन्य शहरों में संस्करण नही है। यदि बेंगलुरू की बात की जाए तो वहां न तो इंडियन एक्सप्रेस है और न ही हिंदुस्तान टाइम्स। अतः नए अखबार को डेक्कन हेराल्ड की आवश्यकता होगी लेकिन इससे डेक्कन हेराल्ड को क्या फायदा होगा? इससे नया नाम तो मिलेगा परन्तु इसके पाठक वही रहेंगे। साथ ही टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठक भी वही रहेंगे। आगे कोयम्बटूर में देखा जाए तो इस नए अखबार को किसी भारतीय स्थानीय भाषा के अखबार से जुड़ना होगा। तो क्या इसका मतलब यह निकलता है कि भारतीय भाषा के पाठक अचानक से अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगेंगे। जिसे कि टाइम्स ऑफ इंडिया को हराने के लिए बनाया गया है और बिना किसी नए पाठक को जोड़े वह टाइम्स ऑफ इंडिया को हरा पाएंगे?

राजनीतिक दलों की स्थिति कुछ ऐसी ही है। एसपी एवं बीएसपी का गठबंधन हुआ है, लेकिन बीजेडी को ओड़िशा में कैसे लाभ होगा? एनसीपी व कांग्रेस महाराष्ट्र में गठबंधन में हैं तो आंध्र प्रदेश में टीआरएस को कैसे लाभ होगा? यह कुछ ऐसा है जिसे तथाकथित बुद्धिजीवी कहते हैं। मीडिया को भी यथास्थिति का पता नहीं लग पाया लेकिन राजनीतिक दलों ने इसका पता लगा लिया है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी, कांग्रेस और लेफ्ट अकेले जा रहे हैं। लेफ्ट ने 38 सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची घोषित कर दी है लेकिन दिलचस्प है कि टीएमसी और लेफ्ट दोनों ही कांग्रेस को आप पार्टी के साथ गठबंधन करने की सलाह दे रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस व टीडीपी का आंध्र प्रदेश में कोई गठबंधन नहीं है लेकिन कांग्रेस को आप से गठबंधन करने की सलाह टीडीपी लगातार देती आ रही है। कांग्रेस के बाद आप एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहता।
इससे यह साबित होता है कि भाजपा से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस मुक्त भारत देखना चाहती है। यदि हम यूपी की ओर नजर डालें तो इस तर्क को और मजबूुती मिलती है।

एसपी एवं बीएसपी ने अजीत सिंह के आरएलडी के साथ गठबंधन किया है लेकिन कांग्रेस के लिए दरवाजा बंद कर दिया है। यही नहीं हर दिन मायावती और अखिलेश नियमित रुप से कांग्रेस का अपमान पर अपमान किए जा रहे हैं।

इस सब के बीच केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाने के वह पक्ष में नहीं है।

टीआरएस नेता के.चंद्रशेखर राव गत एक वर्ष से राष्ट्रीय स्तर पर गैर कांग्रेस और गैर भाजपा विकल्प के लिए गठबंधन हेतु कार्यरत है।

यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने हेतु तीन-चार राजनीतिक दल जैसे आरजेडी, एनसीपी एवं जेडीएस और अन्य कोई भी राष्ट्रीय गठबंधन में दिलचस्पी नहीं रखता।

क्षेत्रीय पार्टियां राजनीतिक दल नहीं बल्कि व्यापारिक घराना है। व्यापार गठबंधन पर नहीं चलता अपितु विलय, अधिग्रहण या सहयोग से चलता है।

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी पार्टियों का गठबंधन नहीं हो सकता और यदि हो भी गया तो वह चुनाव नहीं जीत सकते।
कांग्रेस को यह पता चल गया है कि कोई भी उससे गठबंधन करना नहीं चाहता इसलिए गठबंधन की बात करने के अलावा पाकिस्तान, चीन, कैंब्रिज एनालिटिका आदि से कांग्रेस ने मदद मांगी है। प्रियंका गांधी से मिलने के बाद भीमा कोरेगांव की पुनरावृत्ति करने की धमकी देना यह उसी कड़ी का संकेत मात्र है।

लेकिन आज का भारत एक अलग भारत है, एक शिक्षित भारत है। एक ऐसा देश है जो विकास पर केंद्रित है। एक युवा भारत है, जो सफल होना चाहता है। क्षेत्रीय विभाजनों से वह विभाजित नहीं होगा।

सेक्युलर मीडिया और सेक्युलर बुद्धिजीवियों का सपना एक सपना ही रह जाएगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा को चुनाव जीतने के लिए कड़ी मेहनत नहीं करनी चाहिए। सभी की अपेक्षाएं है कि विकास के अलावा हिंदुओं की मांगों,अपेक्षा एवं उनके विकास पर ध्यान केंद्रित करें।

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