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 जब हम डॉ.बाबासाहबआंबेडकर की जीवनी पढ़ते हैं तब उनके स्वभाव की दो विशेषताएं ध्यान में आती है। वे हैं- उनका स्वाभिमान, उनकी अनुशासन प्रियता। ये दो गुण उन्होंने अपनी माताजी से प्राप्त किए थे। उनकी माताजी स्व. भीमाबाई एक आदर्श माता थीं; परंतु दुर्भाग्य से बाबासाहब बचपन से ही मातृसुख से वंचित हो गए।
भीमाबाई के पिता का नाम था लक्ष्मणराव पंडित-मुरबाडकर। वे महाराष्ट्र के ठाणे जिले में मुरबाड गाव के निवासी थे। वे भारतीय सेना में सुभेदार पद पर काम कर रहे थे। उन्हें गणपत नाम का पुत्र और भीमाबाई तथा बायजाबाई नामक दो पुत्रियां थीं। भीमाबाई बचपन से ही बहुत होशियार, मेधावी और आग्रही स्वभाव की थी।
भीमाबाई के पिता ने अपनी इस कन्या के लिए रामजी आंबेडकर यही वर निश्चित किया। रामजी भी पलटन में काम कर रहे थे। उनके पिता मालोजीराव ने बहू पसंद की और १३ बरस की भीमाबाई दुल्हन बन गईं। रामजी उस वक्त १९ बरस के थे। भीमाबाई और रामजी का विवाह बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ। अमीर घर की बेटी होकर भी भीमाबाई का रहन-सहन बिल्कुल सीधासादा था। अपने मायके से भीमाबाई बहुत अच्छे संस्कार लेकर ससुराल आईं। उसका स्वभाव बड़ा आग्रही था। उन्होंने अपने स्वभाव से, अपने काम से घर का सभी कारोबार सम्हाला। और, घर पर राज भी किया। भगवान की पूजाअर्चा, सभी कुलाचार, अतिथियों का स्वागत-सम्मान, रसोई सम्हालना, बच्चों की देखभाल यह सभी निभाते-निभाते उनका सारा दिन चला जाता था। किन्तु इन कर्तव्यों के प्रति उन्होंने कभी नाराजगी नहीं दिखाई। दुर्भाग्य से, बहुत ही कम उम ्रमें उन्हें सिरदर्द शुरू हो गया। १४ बार उन्हें प्रसव के कष्ट सहने पड़े, जिसकी वजह से उनकी तबीयत खराब होती चली गई। उन्हें उनके मायके में मुरबाड भेज दिया गया। थोड़े दिन वहां आराम करके वह सातारा लौट आईं। रामजी को पत्नी की बीमारी का पता चलते ही वे सातारा आ गए। सन १८९६ में भीमाबाई का देहांत हो गया।

भीमाबाई अपनी ननंद मीराबाई का बहुत आदर करती थीं। दोनों में मित्रता का बंधन था। दोनों मिलकर अपनी कुलदेवता की आराधना बड़ी श्रद्धा से करती थीं। भीमाबाई के निधन के बाद बाबासाहब को मीराबाई ने संभाला। उनको पालपोसकर बड़ा किया। किन्तु बचपन से जो संस्कार उन्हें अपनी माता से प्राप्त हुए उससे उनका पूरा जीवन उज्ज्वल बन गया। वे जन्मभर विद्याव्रती रहे। बचपन में ही उन्हें अपनी मां से शिक्षा और अनुशासन के संस्कार मिले थे। भीमाबाई बार-बार उन्हें यही समझाती थी कि तुम्हें बहुत बड़ा बनना होगा, अपनी शिक्षा पूरी करनी होगी और गरीबों का दुख दूर करना होगा। हम लोग अस्पृश्य हैं इसलिए समाज हमें दूर रखता है यही मेरा दुख है, यही मेरी और हमारे सभी जातिबंधुओं की चिंता है। तुम्हें उसे दूर करना है। और, बाबासाहब ने इसी बात को अपने जीवन का अंतिम ध्येय माना। अपने विद्याभ्यास से उन्होंने यह साबित कर दिया कि कोई व्यक्ति केवल जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता। अपने कर्तृत्व से बाबासाहब अमर हुए हैं। पं. जवाहरलाल नेहरू भी उनके बारे में कहते थे कि ‘ऊी. आलशवज्ञरी ळी र क्षशुशश्र रोपस ाू ाळपळीींीू.‘
लेकिन इस बालक को जन्म देने वाली उनकी माता भी उतनी ही महान है इसका स्मरण हमें रखना चाहिए। ऐसी असाधारण माता को आदरपूर्वक प्रणाम।
मो. : ९४०३७०३६४१
 

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