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****अरुण करमरकर****
स्वातंत्र्यपूर्व समय केराजनैतिक-सामाजिक आंदोलनों से स्वातंत्रोत्तर प्रारंभिक समय तक भारत के राजनैतिक-सामाजिक परिवेश पर जिन महापुरुषों का लक्षणीय प्रभाव रहा है, उनकी सूची में महात्मा गांधी और महामानव बाबासाहेब आंबेडकर ये दो अधोरेखांकित नाम हैं। देश की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्थाओं के विषय में इन दोनों महापुरुषों ने अपने अपने गहन चिंतन के आधार पर विशिष्ट विचारप्रणाली का पुरजोर ढंग से समर्थन किया है। किन्तु वरीयता के विचार से गांधी जी ने राजनीति को, तो बाबासाहेब ने समाज नीति को वरीयता दी थी, यह बात निर्विवाद सत्य है। स्वतंत्रता के बाद दोनों को ही अधिक समय नहीं मिला। स्वतंत्रता के बाद सवा वर्ष में ही महात्मा गांधी जी की हत्या हो गयी तो आठ वर्षोमेंं बाबासाहेब का महानिर्वाण हो गया। महात्मा जी की हत्या के बाद की अवधि में बाबासाहेब के जीवन के दो महत्वपूर्ण प्रसंग देश के इतिहास में बड़े अक्षरों में उल्लेखित हुए हैं। पहली घटना थी भारतीय संविधान का निर्माण और दूसरी थी १९५४ में बाबासाहेब द्वारा बौद्ध धर्म का स्वीकार।
इन दोनों घटनाओं का विचार करने पर, यह ठोस रूप में ध्यान में आता है कि, बाबासाहेब ने अपनी समाज नीति पर राजनीति का आक्रमण न हो यह दृष्टिकोण जितने आग्रहपूर्वक अपनाया, उतनी ही निष्ठा से अपना सामाजिक आग्रह संविधान में प्रतिबिम्बित करवाते हुए भी इससे राष्ट्र नीति का संतुलन न बिगड़े इस पर विशेष ध्यान दिया। इसीलिए, महात्मा गांधी के राजनैतिक नेतृत्व के सामने खड़े होने का प्रसंग आते ही बाबासाहेब ने अपने आग्रह को मोड़ देने में कोई संकोच नहीं किया। १९३० से १९३२ की अवधि में ब्रिटिश सरकार ने तीन गोलमेज परिषदों का आयोजन किया था। इनमें से पहली परिषद में महात्मा गांधी जी उपस्थित नहीं थे। उस परिषद में डॉ. बाबासाहेब ने दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन की मांग की थी। दूसरी परिषद में उपस्थित रहे महात्मा गांधी जी ने इस मांग पर अपना विरोध दर्शाया था। मुस्लिम, सिख जैसे ‘धार्मिक’ अल्पसंख्यकों के लिए ऐसे स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्रों का प्रावधान ब्रिटिशों ने पहले से ही किया हुआ था। पर अस्पृष्यों के लिए ऐसे निर्वाचन क्षेत्र निर्माण किए गए तो हिन्दू समाज में भेदभाव पनपेगा, अलगाव निर्माण होगा, यह भय महात्मा गांधी जी को लग रहा था। इसी भय से उन्होंने दलितों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग का विरोध किया था।
ब्रिटिशों ने गोलमेज परिषदों के माध्यम से नए संविधान के प्रारूप पर विचारविमर्श में भारतीय प्रतिनिधियों का समावेश किया था, यह निश्चित ही स्वागतयोग्य बात थी। किन्तु इस संदर्भ में भी भारतीय समाज में मौजूद भेद भावना अधिक गहरी करने का अपना सुप्त हेतु उन्होंने कभी भी दृष्टि से दूर नहीं रखा। ‘धार्मिक’ अल्पसंख्यक (मुस्लिम, सिख आदि) गुटों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्रों की रचना उन्होंने प्रस्तावित की ही थी। आश्चर्य का विषय यह भी है कि इस प्रावधान का विरोध महात्माजी ने नहीं किया। फिर भी दलितों के स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्रों की रचना करने के लिए उनका विरोध उचित ही था, यही कहना होगा। इसी विषय पर उनमें और डॉ. आंबेडकर में हुए द्वंद्व को निश्चित ही एक वैचारिक और सामाजिक आयाम और महत्व प्राप्त होता है। विशेषतया इस प्रसंग में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी के द्वारा प्रदर्शित संयम उनकी प्रगल्भता का परिचय कराता है।
तीसरी गोलमेज परिषद में चर्चा की समाप्ति पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री रॅम्से मॅक्डोनाल्ड ने अस्पृश्यों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के प्रावधान से युक्त ‘‘कम्युनल अवार्ड’’ की घोषणा भी कर दी। पर महात्मा गांधी जी इस पर प्रखर विरोधक की भ्ाूमिका में सामने आए। डॉ. बाबासाहेब और महात्मा गांधी जी की भेंट एवं चर्चा हुई। इसी चर्चा से सुविख्यात ‘‘पुणे करार’’ साकार हुआ। बाबासाहेब ने स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र का अपना आग्रह वापस ले लिया और गांधी जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। ‘‘गांधी जी की ‘हठधर्मिता’ के सामने बाबासाहेब ने अपनी गर्दन झुका दी या बाबासाहेब को एक प्रकार से ‘ब्लॅकमेल’ किया गया’’ इन शब्दों में इस घटना की व्याख्या करना एकांगी एवं अतिवादी होगा। महात्मा गांधी जी के सरकार में और भारतीयों के मन में मौजूद प्रतिष्ठापूर्ण स्थान और उनके आमरण अनशन के कारण कुछ तनावपूर्ण एवं दबाव की परिस्थिति निर्माण हुई थी, यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता। फिर भी इस दबाव के आगे बाबासाहेब विवश हो कर झुक गए, यह कहना भी ठीक नहीं होगा। ‘पुणे करार’ के माध्यम से जिन प्रावधानों पर दोनों में मतैक्य हुआ उन पर ध्यान दे तो, दिखाई देता है कि, दोनों नेताओं ने अत्यंत सामंजस्यपूर्ण पैंतरा लिया था और सामाजिक ऐक्य स्थापना की दृष्टि से दोनों के द्वारा महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे।
डॉ. बाबासाहेब के द्वारा पुणे करार के संदर्भ में व्यक्त की गई भावना से उनकी विशुद्ध समाजनिष्ठा और प्रगल्भता की प्रतीति होती है। २४ सितम्बर १९३२ को पुणे करार पर दोनों नेताओं ने हस्ताक्षर किए। दूसरे ही दिन याने २५ सितम्बर १९३२ को इण्डियन मर्चेण्ट्स् एसोसिएशन की सभा में बाबासाहेब ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए भाषण दिया। यही भाषण ‘जनता’ नामक समाचार पत्र के १ अक्टूबर १९३२ के अंक में प्रकाशित हुआ। इस भाषण में बाबासाहेब ने कहा-
‘‘कुछ दिनों पूर्व की जटिल स्थिति का और आज की समाधानकारक स्थिति का विचार जब मैं करता हूं, तब यह एक सुखद स्वप्न है ऐसी ही भावना मेरे मन में निर्माण होती है। एक ओर महात्मा गांधी जी के अमूल्य प्राण की रक्षा और दूसरी ओर मेरे लाखों समाज बंधुओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए प्राणों की बाजी लगा कर प्रयास करना इस दोहरी पेंच से ऐसा समाधानकारक मार्ग सफलतापूर्वक निकलेगा इसकी कोई कल्पना करना मेरे लिए सम्भव नहीं था। इस जटिल प्रसंग के समय हिंदू नेताओं ने उच्च स्तर की समझदारी दिखाते हुए विचारनिष्ठ और सहयोगपूर्ण भ्ाूमिका अपनाई इसके लिए मुझे आंतरिक संतोष हो रहा है।’’
महात्मा गांधी और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के परस्पर सम्बंध से डॉ. आंबेडकर और पण्डित जवाहरलाल नेहरू के सम्बंधों की ओर मुड़ने से पूर्व सामाजिक समता और जाति व्यवस्था के विषय में महात्मा गांधी जी के चिंतन पर एक दृष्टिपात करना उपयोगी रहेगा। १९२१ और १९२२ की अवधि में ‘नवजीवन नामक गुजराती पत्रिका में इस संदर्भ में गांधी जी ने जो लेख लिखे थे उनका सारांश –
१. हिंदू समाज अपनी जाति या वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही दृढ़ता के साथ खड़ा रह पाया है।
२. अंतरजातीय विवाह या सहभोजन समता प्रस्थापना का प्रभावशाली मार्ग नहीं हो सकता।
इसका विश्लेषण करते हुए महात्मा गांधी जी ने लिखा है, ‘‘रक्त सम्बंधियों की संतान आपस में विवाह नहीं करती तो क्या उनमें परस्पर आत्मीयता नहीं होती? संक्षेप में समता प्रस्थापन का प्रभावी व्यवहार आत्मीयता पर आधारित होना चाहिए- यह गांधी जी का दृष्टिकोण था। पर आगे ३,४ वर्षोंं में ही गांधी जी ने अपनी सोच को जो मोड़ दिया वह भी महत्वपूर्ण है। १९२५ में गांधी जी ने एक भाषण में कहा था – ‘‘वस्तुत: और मूलत: जाति व्यवस्था का हेतु था संयम सिखाना। इसीलिए मैंने इस व्यवस्था का समर्थन किया था। पर आज यही व्यवस्था संयम नही ंतो बंधन बनता जा रहा है। संयम स्वतंत्रता का तो बंधन गुलामी का प्रतीक है। आज जाति व्यवस्था मूल शास्त्रीय अधिष्ठान से हट चुकी है और समाज अनेक जाति उपजातियों में विभाजित होते जा रहा है। इस प्रक्रिया का समर्थन नहीं हो सकता।’’ फिर इस पर क्या उपाय है इस प्रश्न के उत्तर में गांधीजी कहते हैं, ‘‘छोटे उपजाति गुटों का विलिनीकरण कर एक बड़ा, स्थूल जातिगुट बनाएँ। इससे मूल वर्ण व्यवस्था का पुनरुज्जीवन होना चाहिए। वर्ण व्यवस्था के मूल और असली संकल्पना के अनुसार शूद्रों को शिक्षा लेने में या क्षत्रियों को शूूद्रों के समान सेवा करने में कोई भी अवरोध नहीं था, ब्राह्मण भी व्यापार के या युद्ध के (वैकल्पिक रूप में वैश्य और शूद्रों के) गुणधर्म अपना सकते थे। एक वर्ण के व्यक्ति को दूसरे वर्ण के व्यक्ति की व्यावसायिक विषेशता के रूप में स्थापित कलाकोशल सीखने में कोई अवरोध नहीं होता था। मात्र व्यवसायानुसार विभाजन किया जोने से वर्ण व्यवस्था से सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया ने – गलाघोंटू प्रतिस्पर्धा और तज्जनित वर्ग कलह को रोक रखा है।
सारांश, जाति या वर्ण व्यवस्था के विषय पर महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर एक तरह से परस्परविरोधी भ्ाूमिका पर दृढ़ता के साथ खड़े थे। महात्मा गांधी वर्ण व्यवस्था के मूल और असली स्वरूप के साथ उसके पुनरुज्जीवन का स्वप्न देख रहे थे तो बाबासाहेब उस व्यवस्थाजनित विकृतियों की ओर निर्देश करते हुए उस व्यवस्था को जडमूल सहित समाप्त करने का आग्रह कर रहे थे।
पण्डित जवाहरलाल नेहरू के पूरे जीवन की दिशा ही राजनैतिक थी। समाज जीवन का जो भी विचार उनकी प्रस्तुति में या लेखन में प्रकट हुआ है, उसमें भी प्रमुखता से राजनैतिक व्यवस्था, सत्ता तंत्र, शासनप्रणाली, देश का औद्योगिक-आर्थिक विकास आदि विषयों की प्रधानता दिखाई देती है। इसलिए डॉ. बाबासाहेब और नेहरू की परस्पर तुलना में सामाजिक विषयों का संदर्भ (जो बाबासाहेब के विषय में अत्यंत स्पष्ट है) अधिक नहीं दिया जा सकता। फिर भी भारत के पहले ही मंत्रिमण्डल में प्रधान मंत्री नेहरू द्वारा देश के पहले विधि मंत्री के रूप में बाबासाहेब का समावेश (महात्मा गांधी जी की सूचना से नेहरू जी ने उनका समावेश किया था, ऐसा कुछ अध्येताओं का मत है) इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैसे ही संविधान सभा में उनका प्रमुखतया समावेश, संविधान सभा के मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर उनका चयन ये ध्यान देने योग्य बातें हैं।
भारत स्वतंत्र हो कर राज्य के सूत्र प्रत्यक्षत: भारतीय नेताओं के हाथों मेंं आने से पहले ही नेहरू जी ने बाबासाहेब को मंत्रिमण्डल में सहभागी होने का आमंत्रण दे दिया था। इससे भी पहले सन १९४६ में ही भारतीय संविधान के निर्माण समिति में उनका समावेश किया गया था। संविधान निर्माण के अपने दायित्व की ओर बाबासाहेब किस भ्ाूमिका से देख रहे थे यह उनके नवम्बर १९४६ में संविधान सभा के समक्ष किए गए भाषण से ही ध्यान में आता है। इस भाषण में उन्होंने अपने ‘‘बलशाली और एकसंघ भारत की संरचना’’ इसी उद्देश्य का प्रतिपादन किया। १९४७ के मार्च महीने में बाबासाहेब ने ‘सरकार और अल्पसंख्यक समुदाय इस विषय पर निवेदन प्रस्तुत किया। मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यकों के अधिकार, दलित वर्गांें के लिए सुरक्षात्मक उपाय और भारतीय रियासतों के प्रश्न आदि विषयों के निवेदनों को भी बाबासाहेब ने ही सम्हाला था। अप्रैल १९४७ में ‘अस्पृश्यता निर्मूलन’ के अनुच्छेद १७ को भारतीय संविधान में समाविष्ट करने का प्रस्ताव संविधान सभा ने स्वीकार किया। इस वैशिष्ट्यपूर्ण पार्श्वभ्ाूमि पर बाबासाहेब ने – पण्डित नेहरू के आमंत्रण पर – भारत के केन्द्रीय मंत्रिमंडल में विधि मंत्री के नाते प्रवेश किया था।
विधि मंत्री के रूप में उन्होंने हिन्दू समाज में सुधारों की प्रक्रिया को अधिकृत स्तर से आगे ले जाने का दृष्टिकोण अपनाया। हिन्दू विवाह अधिनियम, उत्तराधिकार विषयक विधान, विधवाओं की स्थिति, स्त्रियों के अधिकारों का संरक्षण, आदि महत्वपूर्ण विषयों में आधुनिकता और न्याययुक्तता निर्माण करने की दृष्टि से उन्होंने ‘‘हिन्दू कोड बिल’’ बनाया। यह विधेयक संसद में लाकर उसे विधान का स्वरूप देने की परिपूर्ण सिद्धता उन्होंने की थी। पण्डित नेहरू जी को उन्होंने इस विषय में ठोस आश्वासन भी दिया था।
I will sink or swim with this bill  शब्दों में उन्होंने इस विधेयक को स्वयं के और सरकार की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के संकेत दिण् थे। १९५० में बाबासाहेब ने हिन्दू कोड बिल संसद में प्रस्तुत किया। पर प्रधान मंत्री नेहरू ने और उनके मंत्रिमंडल ने उलटी छलांग लगा दी। इस विधेयक को सरकारी विधेयक के रूप में संसद में प्रस्तुत करना अस्वीकार कर दिया गया। एक प्रकार से यह खुल्लमखुल्ला अपमान ही था। बाबासाहेब का इससे व्यथित होना स्वाभाविक ही था। उन्होंने विधि मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। मंत्री पद के मानसम्मान की तुलना में उस पद के माध्यम से समाज सुधार और सामाजिक एकता का पोषण करने में ही उन्हें अधिक रुचि थी। पर नेहरू जी के मंत्रिमंडल ने उनकी इस साधना पर ही रोक लगा दी तो उन्हें इस पद में कोई रस नहीं रहा। पर कांग्रेस द्वारा, परोक्षत: गांधीजी एवं नेहरू जी द्वारा, उनकी उपेक्षा करने का क्रम यहीं तक नहीं रुका।
१९५२ में भारतीय संसद का पहला निर्वाचन सम्पन्न हुआ। इस निर्वाचन में बाबासाहेब मुंबई से खड़े हुए। केन्द्रीय मंत्रिमडल में उन्हें आदरपूर्वक आमंत्रण देनेवाले कांग्रेस के नेताओं ने इस निर्वाचन में बाबासाहेब का साथ देने के स्थान पर उनके विरुद्ध एस्. एन्. काजरोलकर को प्रत्याशी बनाया और निर्वाचित भी कराया। आगे एक वर्ष के बाद १९५३ में बाबासाहेब उपचुनाव में भंडारा से खड़े हो गए पर वहां भी उनके विरुद्ध एक कांग्रेसी प्रत्याशी श्री बोरकर की विजय हुई।
संयोग से इस घटना को एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि, १९५४ में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की। वस्तुत: धर्मान्तर की- या हिन्दू धर्म में न रहने की- घोषणा उन्होंने बाइस वर्षों पूर्व १९३२ में ही की थी। इन बाइस वर्षों में वे अपनी इच्छा पर पुनर्विचार करना चाहेंगे ऐसा प्रतिसाद, दुर्भाग्य से, उन्हें हिन्दू नेताओं से नहीं मिला। सामाजिक स्तर पर हिन्दू नेता या संस्थाओं ने उन्हें पुनर्विचार का अवसर प्रदान नहीं किया। वैसे ही सरकारी स्तर पर गांधी-नेहरू की कांग्रेस ने भी उनके समाज सुधार की उत्कट इच्छा का उपहास ही किया है, यही कहना होगा।
मो. : ९३२१२५९९४९
 
 

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