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आज समय की मांग है कि डॉ. आंबेडकर के विचारों के अनुरूप हम आगे बढें। उनके विचार केन्द्रस्थान पर हों। हमारा देश विशाल है, विस्तीर्ण है। इस देश में अनेक लोग, अनेक समाज रहते हैं। इस देश में कुछलोग गीता के अनुसार अपना जीवन जीते हैं, कुछ कुरान के अनुसार चलते हैं, तो कुछ बाइबिल के अनुरूप। परंतु अगर पूरे समाज और देश की बात करें तो ऐसी एक ही चीज है जिसका हर कोई अनुसरण करता है और वह है डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के द्वारा लिखा गया संविधान। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी चुनाव जीतने के बाद डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमा को नमन किया था। आज संपूर्ण विश्व डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों के समक्ष नतमस्तक है। एक समय ऐसा था जब सारी समस्याओं का हल, और संसार का नेतृत्व अमेरिका के हाथ में था। इस्राईल, कुवैत इत्यादि देशों की किसी भी विपरीत परिस्थिति को वश में करने का एक ही मार्ग अमेरिका के पास था, युद्ध। परंतु इस दुनिया की सभी समस्याओं का हल करने के लिए युद्ध की नहीं बुद्ध की जरूरत है।
इंसान अपने पुरखों को अक्सर भूल जाता है। उनकी जयंती या पुण्यतिथि मनाना तो दूर उनका नाम भी हमें याद नहीं रहता। परंतु हम डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को नहीं भूलते, गौतम बुद्ध, म. फुले या शिवाजी महाराज को नहीं भूलते। इसका क्या कारण है? क्या हमारा इनसे खून का संबंध हैं? क्या इन्होंने हमें जन्म दिया है? नहीं! इन लोगों ने हमें भले ही जन्म न दिया हो, परंतु हमें जीवन दिया है। इनके कारण हम जी रहे हैं। इसलिए ही उनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाते हैं। एक और प्रश्न यह उठता है कि हम हमारे रक्त संबंध तो भूल गए परंतु जो संबंध रक्त के नहीं वरन विचारों के हैं वे हमें याद रह गए। इसका अर्थ यह है कि रक्त संबंधों की अपेक्षा विचारों के संबंध अधिक मजबूत होते हैं। अत: वे संबंध लंबे अरसे तक टिके रहते हैं।
मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूं। बिना किसी तर्क के मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करता हूं। विविध विद्वानों के बारे में अध्ययन करने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के जैसा व्यक्ति आज तक इस दुनिया में नहीं हुआ। वे एकमेवाद्वितीय थे। और यह हमारा सौभाग्य है कि उन्होंने भारत में जन्म लिया।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने तीन सूत्र बताए हैं। पढ़ो, संगठित रहो और संघर्ष करो। हम सभी को यह ज्ञात तो है, परंतु इसमें से हम कितना अपने आचरण में लाते हैं? कई बार तो यह क्रम उल्टा हो जाता है। शिक्षा होती नहीं, संगठन होता ही नहीं, सीधे संघर्ष होने लगता है। हमें इसका क्रम ध्यान मेें रखना होगा। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का जीवन देखें तो हमें पता चलेगा कि उन्होंने अपना आधा जीवन शिक्षा को समर्पित किया। मुझे कोई ऐसा महापुरुष दिखाई नहीं देता जिसके पास पीएच. डी. की चार उपाधियां हैं। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के पास थीं। वे कहते थे ‘शिक्षा’ शेरनी के दूध के समान है। जो उसे पियेगा वो निश्चित ही शेर के समान गरजेगा। इसलिए सभी को शिक्षा प्राप्त करनी ही चाहिए।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए बहुत कष्ट उठाए। अमेरिका की जिस लाइब्रेरी में वे पढ़ते थे वहां लिखा है कि जब लाइब्रेरी बंद होने का समय आता था तो डॉ. बाबासाहब आंबेडकर अकेले वहां पढ़ते रहते थे। बिना कुछ खाये पीये। लाइब्रेरियन ने एक बार उनसे पूछा ‘आप बिना कुछ खाये-पीये लगातार केवल पढ़ाई करते रहते हैं, क्यों? आप क्या करना चाहते हैं? डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनको उत्तर दिया ‘मेरा लाखों करोडों का समाज आज भी भूखा प्यासा है, उपेक्षित है, अत्याचार सहन कर रहा है। इस समाज को उस गर्त से बाहर निकालने के लिए मैं अध्ययन कर रहा हूं। इसलिए मुझे भूखा रहना पड़े तो भी मैं इसके लिए तैयार हूं। परंतु मैं पढ़ाई जरूर करूंगा। उनकी इस तपस्या के भाव को समाज को आत्मसात करना चाहिए।
दूसरा सूत्र बाबासाहब ने हमें बताया संगठित हों। भारत में द्वापर युग जब था तब एक-एक व्यक्ति इतना बलवान था कि अकेला ही पूरी सेना पर भारी पड़ता था। अब द्वापर युग नहीं रहा। अब कलियुग है। कलियुग में कहा जाता है ‘संघेशक्ति कलियुगे।’ कलियुग में संगठन में ही शक्ति है। अकेला व्यक्ति शक्तिशाली नहीं हो सकता। अत: संगठित होना ही होगा। किसी भी समस्या का सामना हम तभी कर सकते हैं जब हम संगठित होंगे।
तीसरा महत्वपूर्ण सूत्र उन्होंने दिया संघर्ष करो। केवल मांगने से कोई नहीं देता, कुछ पाने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। कुछ दिनों पूर्व में पुणे में दलित इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के द्वारा एक अधिवेशन आयोजित किया गया था। यहां दलित समाज के उन लोगों को आमंत्रित किया गया था जो दलित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। सभी स्टाल दलित समाज के उद्योगपतियों द्वारा लगाए गए थे। इस अधिवेशन के उद्घाटन के लिए रतन टाटा आए थे। उन्होंने इसकी बहुत प्रशंसा की। समापन कार्यक्रम के लिए उन्होंने मुझे आमंत्रित किया था। मैंने वहां जाकर सारे स्टॉल देखे। एक बड़े स्टॉल पर जाकर जब मैंने उस कंपनी का टर्नओवर पूछा तो उन्होंने मुझे कहा, ‘हमारी कंपनी का टर्नओवर ५०० करोड़ का है।’ यह डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों का प्रतिबिंब ही है कि एक दलित व्यक्ति इतने बड़े टर्नओवर का व्यवसाय कर सकता है।
नामदेव जगताप नामक व्यक्ति ने सन १९७० में सिद्धार्थ को- आप. बैंक की स्थापना पुणे के सदाशिव पेठ में की। सदाशिव पेठ ब्राह्मण बहुल इलाका है। मैंने बैंक के एक प्रतिनिधि से कहा कि आपके सदस्य कितने हैं, तो उन्होंने कहा- ४५०० सदस्य हैं। और हमने १००० लोगों को कर्ज दिया है। मैंने उनसे पूछा, १००० में से सदाशिव पेठ के कितने लोग हैं? उन्होंने कहा लगभग ९०% लोग सदाशिव पेठ के हैं। यह डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों का ही प्रतीक है कि किसी दलित व्यक्ति के द्वारा शुरू किए गए बैंक से ब्राह्मण कर्ज लेने आता है। हमें डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों के अनुरूप ही संघर्ष करना ही चाहिए।
इंसानों की विचारधारा बहुत संकुचित होती है। हमने डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को फोटो, पुतलों, जातपात में बांध दिया है। वे किसी एक वर्ग के नेता नहीं थे। उनके उपकार किसी एक समाज तक मर्यादित नहीं हैं। वे पूरे देश के लिए हैं। अत: डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का स्मरण हर व्यक्ति को करना चाहिए। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने हमें क्या नहीं दिया? उन्होंने महिलाओं को आय में हिस्सा प्राप्ति का अधिकार दिया, पैतृक संपत्ति में हिस्से का अधिकार दिया, मतदान का अधिकार दिया। उन्होंने महिलाओं को तलाक का भी अधिकार दिया। कहा जाता है कि म. फुले ने स्त्री मुक्ति की नींव रखी और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उस कार्य को पूर्ण किया।
उन्होंने तालाब से दलितों के पानी पीने और मंदिर मेें प्रवेश रोकने के विरोध में सत्याग्रह किया। वे जानते थे कि तालाब से पानी पीने के कारण वे स्वयं या दलित समाज अमर नहीं होगा परंतु जिस से जानवर भी पानी पीते हैं वहां दलितों को पानी न पीने देना एक अमानवीय कृत्य है। और इसलिए ही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने इस अमानवीय घटना के विरोध में सत्याग्रह किया।
कालाराम मंदिर में प्रवेश करने के लिए भी उन्होंने लगभग पांच वर्ष संघर्ष किया। क्यों? वे भगवान का दर्शन नहीं करते तो क्या हो जाता? कुछ नहीं। फिर भी सिर्फ इसलिए कि वे इस देश के लोगों में एकात्मता का भाव जागृत करना चाहते थे, उन्होंने पांच वर्ष तक संघर्ष किया। आज ८० साल के बाद उस मंदिर के महंत ने दलितों को अपनी यात्रा उस मंदिर से शुरू करने का न्यौता दिया। यह डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के संघर्षों का परिणाम है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचार समय से आगे जाकर किए गए विचार हैं। उन्हें उनके संघर्षों के कारण कई अत्याचार सहन करने पडे, लाठियां झेलनी पड़ीं, चेतावनियां मिलीं, अपशब्द कहे गए, परंतु उन्होंने कभी भी उसका हिंसा के माध्यम से प्रतिरोध नहीं किया है। वे कहते थे मैं भगवान बुद्ध का शिष्य हूं। उनकी शिक्षा के अनुसार मेरा बर्ताव भी अहिंसात्मक ही होगा। उन्होंने अन्य लोगों को भी हिंसा करने से परावृत्त किया। ऐसे कई लोग हैं जिन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन शुरू करके भी हिंसा का सहारा लिया; परंतु डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने अपने संपूर्ण जीवन में अहिंसा कभी नहीं छोड़ी।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर कहते थे ‘हमारा समाज चार मंजिला इमारत की तरह है। जिसमें ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जाने के लिए सीढियां नहीं हैं। इस कारण जातिभेद की पराकाष्ठा हो गई है। मैं इस इमारत में विचारों की सुरंग बनाऊंगा और इस इमारत के बंधनों को तोड़ दूंगा।’ सचमुच उन्होंने अपना सारा जीवन भारत से जातिभेद हटाने में गुजार दिया।
सन १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ तब अनेक देश भी स्वतंत्र हुए। श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान, लीबिया, इराक आदि। परंतु लोकतंत्र जितना मजबूती के साथ भारत में खड़ा है उतना और कहीं नहीं है। और इसका कारण है डॉ. बाबासाहब आंबेडकर द्वारा बनाया गया संविधान। इस संविधान का आदर ही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का आदर होगा और संविधान का अपमान डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का अपमान करना है।

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