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प्रस्तुत लेख रा. स्व. संघ के सहसरकार्यवाह मा. कृष्णगोपालजी द्वारा हिंदी विवेक के ‘राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषांक’ तथा‘सामाजिक न्याय एवं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर’ पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर दिए गए भाषण का शब्दांकन है।
आंबेडकर जी का कथन था कि इस देश की भाषाएं इस देशका विलक्षण सौंदर्य हैं। सभी भाषाएं राष्ट्रभाषाएं हैं, लेकिन हिंदी सभी को जोड़ कर रखने का सामर्थ्य रखती है। अत: मराठीभाषी होते हुए भी वे हिंदी को सारे देश को बांधे रखनेवाला सूत्र मानते थे। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर विलक्षण और अलौकिक प्रतिभा के धनी थे। अनेक प्रकार की विपरीत परिस्थितियों में पले-बढ़े और आगे आए। परंतु उनके नाम को लेकर राजनीति करनेवाले लोगों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे देश में ऐसा वातावरण निर्माण किया गया, ऐसी भ्रांत धारणा उत्पन्न की गई कि वे किसी विशिष्ट वर्ग के ही नेता हैं। यह इस देश का दुर्भाग्य है कि नेताओं को उनकी जातियों तक ही सीमित रखने का प्रयत्न किया जाता है। इसके कारण एक महान व्यक्तित्व छोटा होता जाता है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर महाराष्ट्र में एक अत्यंत पिछड़ी जाति में जन्मे और बचपन से ही अस्पृश्यता का दंश झेलते हुए बड़े हुए। वे एक विशेष जाति में जन्मे जरूर थे पर वे किसी विशेष जाति के नहीं थे। जो लोग ‘क्लास स्ट्रगल’ को मानते हैं उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि आंबेडकर जी ने कभी भी ‘क्लास स्ट्रगल’ की बात नहीं की। उन्होंने हमेशा सामंजस्य की बात की। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि वे सवर्णों के विरोधी थे। यह बात बिलकुल गलत है। उन्होंने ऐसी कुछ मान्यताओं का विरोध किया था जिसके कारण समाज में भेदभाव की भावना बढ़ रही थी। जिस परंपराओं रुढ़ियों से समाज में डिस्क्रिमिनेशन है, उसका उन्होंने विरोध किया।कुछ लोग उन्हें मार्क्सवादी मानते थे, जबकि वे तो कम्युनिज्म के घोर विरोधी थे। कुछ लोग उन्हें धर्म विरोधी मानते थे, जबकि वे परंपराओं को माननेवाले थे। लोग उनके जीवन को समग्रता से नहीं पढ़ते। किसी एक कोन से उन्हें देखकर अपने स्वार्थ से प्रेरित होकर उसकी व्याख्या करने लगते हैं। अपने-अपने स्वार्थ के लिए जब हम उनका उपयोग करने लगते हैं तो समाज में डिवीजन उत्पन्न होता है।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने तो बचपन से इस भेदभाव को ही देखा है। वे जब बडौदा रियासत में नौकरी करने लगे तो उन्हें पिछड़ी जाति के होने के कारण वहां रहने के लिए किराए से कमरा नहीं मिल रहा था। उन्होंने एक पारसी होटल में फर्जी नाम से एक कमरा पर लिया। कुछ दिन बाद यह बात फैल गई कि रियासत में कोई महार लड़का नौकरी कर रहा है। बात होटल तक भी पहुंची और जब पता चला कि डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ही वह हैं, उन्हें तुरंत होटल छोड़ने का निर्देश दिया गया। वे बाहर आकर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। उनके पास डिग्रियां तो बहुत थीं पर रहने को कमरा नहीं था। यही उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। यहीं से उनकी सोच शुरू हुई। वे चाहते तो बहुत बड़े वकील बन सकते थे। उन दिनों इतनी डिग्रियोंवाला शायद ही कोई व्यक्ति हो। वे बहुत धनवान बन सकते थे। अपने ज्ञान के बूते ऊंचे पद प्राप्त कर सकते थे। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन बहते हुए आंसुओं के साथ ही उन्होंने यह संकल्प लिया कि मेरा यह जीवन अब मेरे लिए या अर्थोपार्जन के लिए नहीं है। यह जीवन अब उस वर्ग के लिए है जो इतना अपमानित है। उसी क्षण से उनके जीवन की दिशा बदल गई और उन्होंने समाज के उस वर्ग के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया। उन्होंने देखा, दलितों को मंदिरों में जाने की अनुमति नहीं थी, तालाब से पानी नहीं लेने दिया जाता था, अगर कोई ले लेता तो उस तालाब को शुद्ध करने के प्रयत्न होने लगते थे।
वे इन सब के विरोध में आवाज उठाते हैं। उस मूक समाज को वाणी देते हैं। उस समाज को एक मंच देते हैं जिसे समाज ने दूर रखा है। उस समाज को धीरज देने का काम करते हैं जिसके मन से उठने की इच्छा ही समाप्त हो चुकी है। जिस तरह मार्टिन लूथर किंग तथा अब्राहम लिंकन ने निग्रो (अस्पृश्य) लोगों के लिए कार्य किया उससे भी बड़ा कार्य यह था। अत: उनके जीवन का एक बड़ा आयाम यह है कि उन्होंने एक बहुत विशाल वंचित वर्ग में आत्मविश्वास का संचार किया। यहां एक बात ध्यान रखने योग्य है कि उनका संघर्ष निर्वैर था। उनका कोई बैरी या शत्रु नहीं था। शत्रु वे परंपराएं, वे मान्यताएं थीं, वे भ्रांतियां थीं जो समाज को वर्गीकृत करने का काम करती हैं। अत: उन्होंने जो किया वह ‘क्लास स्ट्रगल’ नहीं था। वह कुछ अधिकारों की प्राप्ति के लिए किया गया संघर्ष था।
जब लोग ये कहते थे कि उन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में राजनीतिक रूप में हिस्सा नहीं लिया तो डॉ. आंबेडकर का जवाब होता था कि ‘मैं आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने को तैयार हूं, पर क्या कोई मुझे इस बात का विश्वास दिलाएगा कि स्वतंत्रता के बाद मेरा समाज भी स्वतंत्र हो जाएगा। अगर कोई यह विश्वास दिलाता है तो मैं कांग्रेस से भी ज्यादा तीव्रता से आजादी की लड़ाई लडूंगा।’ परंतु उस समय का नेतृत्व उन्हें यह विश्वास नहीं दिलवा सका।
हम जब उनकी परिस्थिति में स्वयं को रखकर विचार करेंगे तो हमें ध्यान में आएगा कि वे क्या थे। उनके संपूर्ण जीवन का आंकलन थोड़े से ज्ञान से नहीं हो सकता। उनके नाम के आगे जो आंबेडकर उपनाम लिखा जाता है वह उन्हें एक ब्राह्मण अध्यापक ने दिया है। उन अध्यापक को यह लगता है कि आंठवीं का यह विद्यार्थी बहुत होशियार है परंतु महार जाति का सरनेम उसके लिए आगे समस्या खड़ी कर सकता है अत: डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के पिता की अनुमति लेकर उन्हें यह (ब्राह्मण) उपनाम देते हैं। केलुस्कर नामक अध्यापक उनके लिए किताबें, फीस और बडौदा के राजा से फेलोशिप दिलवाने का प्रयत्न करते हैं। डॉ. आंबेडकर यह स्वीकार करते हैं कि उनके जीवन में केलुस्कर जी का बहुत बड़ा योगदान है। जब मिलिंद कॉलेज में नवीन प्राध्यापक लाने का विचार होता है तो वे गजेन्द्रगडकर को खोज कर लाते हैं। लोग कहते हैं डॉ. साहब ने ब्राह्मण प्राचार्य चुना। लेकिन डॉ. बाबासाहब आंबेडकर कहते हैं कि ‘नहीं! मैंने ब्राह्मण नहीं योग्य प्राध्यापक का चुनाव किया है।’ ऐसे व्यक्ति के बारे में जब यह कहा जाता है कि वे ब्राह्मण विरोधी थे तो यह साफ दिखाई देता है कि लोगों ने उनको पहचाना ही नहीं।
पुणे पैक्ट के समय ऐसा लगा कि देश दो हिस्सों में बंट जाएगा। आंबेडकर जी बहुत गुस्से में हैं। सोचते हैं कि मेरे वर्ग का क्या होगा। एक समय वे सेपरेट इलेक्ट्रेट का विरोध करते हैं। सन १९३२ में राउंड टेबल कांफरेन्स में वे सेपरेट इलेक्ट्रेट की मांग करते हैं। म. गांधी इसका विरोध करते हैं। म. गांधी कहते हैं, ‘मैं मानता हूं हिंदू समाज के अंदर जातिभेद एक कुरीति है। इसे हटाना चाहिए और इसके लिए मैं हर संभव प्रयास करूंगा। परंतु सेपरेट इलेक्ट्रेट को मैं स्वीकार नहीं करूंगा। हमेशा के लिए मैं समाज का बंटवारा नहीं होने दूंगा इसके लिए मैं आमरण अनशन करूंगा।’ यह सब उन्होंने ब्रिटेन के प्रधान मंत्री को भी लिखकर भेजा था। आंबेडकर जी ने कहा, ऐसे महात्मा आएंगे और जाएंगे परंतु मैं अपने वर्ग का हक लेकर रहूंगा। लोगों को लगा देश पर संकट आ गया है। मालवीय जी कश्मीर की यात्रा छोड़कर मुंबई आ गए। दोनों के बीच निरंतर वार्ताएं हुईं। अंत में आंबेडकर जी मान गए। इस लड़ाई में न कोई जीता न कोई हारा वरन लोगों ने डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को राष्ट्रीय नेता के रूप में मान्यता दी।
जब संविधान निर्माण का समय आया तो जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल विदेश से कोई अच्छा संविधान निर्माता ढूंढ कर लाने वाले थे। तब म. गांधी ने उनसे कहा किसी को बाहर से बुलाने की क्या आवश्यकता है। आंबेडकर जी को बुलाइये। वे इस कार्य में पूर्ण सहयोग करेंगे। अत: जो लोग यह कहते हैं कि म. गांधी और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर में द्वेष था तो उन्हें यह घटना ध्यान में रखनी चाहिए। यह कोई छोटी बात नहीं है। यह बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं।
डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के जीवन के दो प्रमुख आयामों- संविधान का निर्माण और अस्पृश्यों को समान अधिकार दिलवाना- इसके अलावा भी उनके जीवन में बहुत कुछ था। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे बहुत बड़े अर्थशास्त्री थे। उनके द्वारा प्राप्त की गई डिग्रियों में से सबसे ज्यादा डिग्रियां अर्थशास्त्र में हैं। कम उम्र में ही उन्होंने कीन्स और माल्थस जैसे अर्थशास्त्रियों का विरोध करने का साहस दिखाया।
 

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