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आतंकवादियों की आर्थिक मदद की नाकाबंदी-

आतंकवादी संस्थाओं को देश के बाहर से होने वाली आर्थिक मदद रोकने के लिये राष्ट्रीय जांच संस्था एन.आई.ए. को अधिकार देने वाला विधेयक संसद के दोनों सदनों में गत सप्ताह मंजूर हुआ। इस विधेयक की मंजूरी के बाद एन.आई.ए. ने तमिलनाडू में सोलह स्थानों पर छापे मारकर देश में युद्ध की स्थिति पैदा करने की तैयारी में लगे आतंकवादियों पर लगाम लगाई। ‘अन्सारूल्ला’ इस आतंकवादी गुट के ये लोग भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना हेतु प्रयत्नशील थे। इनको विदेशी आतंकवादी संगठन ‘इसिस‘ ‘सिमी’ ‘दाएश’ एवं ‘अल कायदा’ द्वारा आर्थिक सहायता दी जा रही थी।

टेरर मॉनिटरिंग ग्रुप(‘टीएमजी’) का गठन-

29 मार्च को केन्द्र सरकार ने आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने हेतु ‘टेरर मॉनिटरिंग ग्रुप’ अर्थात ‘टीएमजी’ का गठन किया। टीएमजी में सीबीआई, एन आई ए एवं सीबीडीटी के अधिकारियों का समावेश है। कश्मीर में रहकर आतंकवाद के लिये आर्थिक रसद पहुंचाने वालों को सामने लाने का काम टीएमजी करेगी। आतंकवादियों को मदद करने वाले सरकारी अधिकारियों सहित किसी को भी नही छोड़ा जायेगा।

आठ सदस्यीय टीएमजी के अध्यक्ष जम्मू-कश्मीर के पुलिस उपमहानिदेशक हैं। टीएमजी में जम्मू-कश्मीर के एक पुलिस महानिरीक्षक, राज्य की आईबी शाखा के अतिरिक्त निदेशक, केंद्रिय अन्वेषण विभाग, राष्ट्रीय जांच एजेन्सी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड तथा सीबीआई के प्रतिनिधि का समावेश है। टीएमजी का गठन आतंकवादियों को आर्थिक रसद पहुंचाने के विरोध में चालू कार्रवाईयों को एकत्रित करना एवं आतंकवाद से संबधित अन्य गतिविधियों पर लगाम लगाना है। साथ ही आतंकवादियों के साथ सहानुभूति रखने वालों के जाल को भी उद्ध्वस्त करना है। टीएमजी को आतंकवाद के सभी ज्ञात-अज्ञात चेहरों के विरूद्ध कार्रवाई के अधिकार दिये गये हैं। अब तक रजिस्टर हुए सभी आतंकवादी उनको आर्थिक सहायता पहुंचाने वाले एवं आतंकवाद से संबधित सभी घटनाओं पर टीएमजी कार्रवाई करेगी। आतंकवाद को किसी भी स्वरूप में सहायता करनेवाले समर्थकों को सामने लाना एवं अर्थ साहाय्य के सभी मार्गों की जांच कर उनको नेस्नाबूद किया जायेगा।

ग्यारह वर्षों में एनआईए द्वारा 183 विविध प्रकरणों का खुलासा-

सन् 2008 में मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले का षडयंत्र विदेश में रचे जाने की जानकारी जांच के दौरान सामने आई। इस हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली आतंकवादियों की हलचल का पता लगाने के लिये एक स्वतंत्र संस्था की आवश्यकता महसूस की जाने लगी एवं इसी में से एनआईए का जन्म हुआ। तत्कालीन सरकार ने एनआईए की स्थापना की। इसके पहले आतंकवाद कार्रवाईयों की जांच प्रमुखत: राज्य पुलिस, आतंकवाद विरोधी टोली (एटीएस) और कुछ अन्य विविध संस्थाओं के बल पर होता था। परंतु आतंकवादियों द्वारा विदेश में की जा रही हलचलों की जांच के लिये इन संस्थाओं को आईबी,रॉ या इंटरपोल जैसी संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता था। इसके अतिरिक्त प्रत्येक जगह के आतंकवादी हमले का स्वरूप एक जैसा ही है क्या, यह जांचने के लिये समय भी अधिक खर्च होता था। इसके कारण ऐसी घटनाओं की जांच राष्ट्रीय स्तर पर एक ही संस्था के माध्यम से कराने हेतु एनआईए की स्थापना की गई। अब तक ग्यारह वर्षों की कालावधि में एनआईए ने आतंकवाद से संबधित 183 मामले सामने लाये हैं जिसमें से 37 मामलों में एनआईए की जांच के बाद मामलों का निबटारा हो चुका है। अनेक मामलें अभी भी निर्णय हेतु लंबित है। आतंकवादियों को सजा दिलाने में एनआईए की जांच अब तक 94.4% सफल रही है। कुछ जगह अधुरे सबूतों के कारण आरोपी छूट गये हैं। इसका मुख्य कारण याने देश के बाहर जांच करने के संबध में अधिकारियों का मर्यादित क्षेत्र। आतंकवादियों को विदेश से आर्थिक सहायता मिलती है परंतु कई बार सबूतों को इकठ्ठा करने का अधिकार न होने के कारण एनआईए समय से सबूत जुटाने में असमर्थ रहती है। फिर भी 94.4% का परिणाम एनआईए की जांच में सफलता दर्शाती है।

एनआईए को बल देने वाला विधेयक संसद में मंजूर-

एनआईए की यह अड़चन दूर करने हेतू हाल ही में संसद ने एक विधेयक मंजूर किया है। सन् 2012 में एनआईए ने पाकिस्तानी नागरिक अबू जुंदाल, फसीद मोहम्मद और इंडियन मुजाहिदीन के यासीन भटकल इन आतंकवादियों को गिरफ्तार किया। यासीन भटकल की जांच में सामने आये इंडियन मुजाहिदीन के दो और वरिष्ठ सदस्यों को भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया। 2014 में बांग्लादेश से चलनेवाली आतंकवादी गतिविधियों का एनआईए द्वारा भंडाफोड़ किया गया। पश्चिम बंगाल, असम एवं झारखंड के सीमावर्ती भागों में बांग्लादेशी घुसपैठियों को सहायता करने हेतु आतंकवाद फैलाने वाले ‘जमात-उल-मुजाहिदीन’ नामक आतंकवादी संस्था के अनेक आतंकवादी कार्रवाईयों को असफल करने में कामयाबी मिली है। अब विदेश में जांच करने की ताकत एनआईए को मिली है एवं इस कारण आने वाले समय में वे आतंकवादियों पर और बड़ी कार्रवाई कर सकते हैं।

सायबर अपराध, मानव तस्करी, विदेश में स्थित भारतीयों पर हमलें की जांच

एनआईए द्वारा की गई जांच में खुलासा हुआ कि 2012 में पुलवामा जिले में आतंकवादियों/अलगाववादी शक्तियों द्वारा वहां के हिन्दू एवं सिखों को परेशान करना प्रारंभ किया गया। तब वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि, “हम इसमें कुछ नही कर सकते, आप अलगाववादी नेताओं से मिलकर अपनी सुरक्षा का इंतजाम करें।”

एनआईए ने गत अनेक महिनों में अलगाववादी नेताओं के घरों पर छापे मारे हैं। कश्मीर पुलिस तथा सीआरपीएफ को साथ लेकर ये छापे डाले जाते हैं। इसमें सय्यद अली शाह गिलानी का बेटा नईम गिलानी, कश्मीर की अलगाववादी महिला नेता आसिया अंद्राबी, जेकेएलएफ के नेता यासिन मलिक, शब्बीर शाह, अशरफ सेहराई और जफर भट भी शामिल हैं। ये अलगाववादी पाकिस्तान का समर्थन करते हैं और आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। इसके लिये आतंकवादियों को आर्थिक सहायता देने का काम भी ये अलगाववादी कर रहे थे।

आईएसआईएस से संबधित मामलों में एनआईए देशभर में छापेमारी कर रही है। मुंब्रा एवं औरंगाबाद में छापे में 9 संदिग्धों से पूछताछ की गई है। “हरकत उल हर्ब-ए-इस्लाम” इस आतंकवादी गुट द्वारा पूरे देश में दशहतवादी कार्रवाईयां करने का षडयंत्र एनआईए ने 26 दिसंबर को असफल कर दिया। इसके बाद एनआईए ने दिल्ली सहित उत्तरप्रदेश के अनेक ठिकानों पर छापेमारी की थी।

आतंकवाद समूल नष्ट होना चाहिये और प्रत्येक भारतीय का जीवन सुरक्षित रहना चाहिये। वर्तमान में जो कानून अस्तित्व में है, उसके अनुसार हमारी जांच एजेन्सी को केवल देश के अंदर की घटनाओं की जांच के अधिकार थे। परंतु, अब देश के बाहर कही भी जांच के अधिकार एनआईए को मिल गये हैं। लोकसभा द्वारा पारित इस संशोधित विधेयक के कारण सायबर अपराध, मानव तस्करी एवं विदेश में स्थित भारतीयों पर यदि हमलें होते हैं तो अधिकार का दायरा बढ़ाना यह समय की मांग थी।

विधेयक को समर्थन देने कारण विरोधी दलों का अभिनंदन

दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला हुआ था। इसलिये भारत सरकार ने दिसंबर 2002 में “प्रिवेशन ऑफ टेरिस्ट एक्ट” (पोटा) यह कानून संसद से पास कराया। आतंकवाद के विरोध में भारत की ओर से जो कार्रवाई की जाती थी, पोटा के कारण उसे बल मिला। इस कारण पोटा का अनन्य साधारण महत्व था। इसमें अतिशय कड़ी धारायें शामिल की गई थी। इसके कारण आतंकवादी कार्रवाई करते समय या ऐसे कृत्यों का समर्थन करने के लिये किसी को भी हजार बार सोचना पड़ता था। अटलबिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब यह कानून बनाया गया था परंतु कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनते ही सन् 2004 में यह कानून रद्द कर दिया गया। यदि यह कानून होता तो शायद सन् 2008 में मुम्बई पर आतंकवादी हमला न होता। “पोटा” समाप्त करने के पीछे वोटों की राजनीति थी। वास्तविक पोटा रद्द के बजाय उसे और कड़ा बनाने की आवश्यकता थी। अब एनआईए के कार्यक्षेत्र में वृद्धि करने के प्रस्ताव का समर्थन कर कांग्रेस ने ‘देर आये दुरुस्त आये’ की उक्ति चरितार्थ की है, यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी।

एनआईए को व्यापक अधिकार देने वाला संशोधित विधेयक लोकसभा में पास होने से देशविरोधी ताकतों को सही रास्ते पर लाना संभव होगा। सत्ताधारी भाजपा के नेतृत्व में एनडीए द्वारा रखे गये इस विधेयक का समर्थन करने के लिये कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, नेशनल कांन्फेस, द्रमुक इ. विरोधी दलों का अभिनन्दन करना होगा। आतंकवादियों एवं उनकी सहायता करने वालों को कठोर दंड देने की दृष्टि से एनआईए का दायरा बढ़ाना आवश्यक था। यह महत्वपूर्ण काम सरकार ने किया, इसका प्रत्येक भारतीय ने स्वागत करना चाहिये। केंद्र में सरकार किसी भी दल की हो, सरकार यदि देशहित का विचार कर कोई कानून बनाती है, तो उसको दलीय मतभेद भूलाकर सभी ने समर्थन करना चाहिये।

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