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भारतीय सिनेमा और उसमें भी खासकर बॉलीवुड में खुद को बुद्धिजीवी वर्ग का प्रतिनिधि मानते हुए देश-समाज से जुड़े विभिन्न मसलों पर निष्कर्ष के रूप में टिप्पणी दर्ज करवाने का एक अनूठा सा चलन चल पड़ा है। किसी व्यक्ति की निजता क्या होनी चाहिए से लेकर समाज में सहिष्णुता-असहिष्णुता का स्तर मापने के लिए इन स्वघोषित बुद्धिजीवियों का वर्ग हमेशा तैयार रहता है। एनडीए नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में जब असहिष्णुता के नाम पर हो-हल्ला मचा था, तो अपने-अपने तमगे लौटाने वालों में बॉलीवुड की इस जमात ने भी बढ़-चढक़र भाग लिया था। हैरानी यह कि मीडिया के एक खास तबके ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को निभाते हुए भारत और उसमें भी बहुसंख्यक समाज को असहिष्णु साबित करने के एजेंडे को पूरे मनोयोग के साथ आगे बढ़ाया। यह एक अलग विषय है कि सोशल मीडिया के वर्तमान दौर में मीडिया के उस तबके की कलई बार-बार खुली। उस पूरे घटनाक्रम में एक सवालिया निशान उठ खड़ा हुआ कि तथाकथित बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक धड़े के इस गठजोड़ के निहितार्थ क्या हैं ? आखिर किस आधार पर उस राष्ट्र को असहिष्णु साबित करने का षडयंत्र रचा गया, जो वसुधैव कुटुंबकम की सनातन परंपरा का वहन करते हुए हर पंथ, हर क्षेत्र और हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलता रहा है।

इस पृष्ठभूमि की पड़ताल इसलिए करनी पड़ी क्योंकि भारत को बदनाम करने के लिए सक्रिय यह गैंग एक बार फिर से चर्चा में है। हाल ही में फिल्म निर्माताओं, लेखकों और अभिनेताओं के 49 लोगों के एक समूह ने प्रधानमंत्री को खत लिखा और चिंता जाहिर की उन्मादी भीड़ की हिंसा द्वारा मुस्लिम और दलितों की पीट-पीटकर हत्या का सिलसिला चिंताजनक है। विशेष तौर पर कहा कि जय श्रीराम का नारा लगाने वालों द्वारा इस तरह की हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाली इन घटनाओं की अलग-अलग स्तर पर जांच जारी है लेकिन पड़ताल इस विषय की भी होनी चाहिए कि क्या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर हमलें  हिंदुओं पर भी हुए ? क्या भीड़ भारत के उन हिस्सों में भी उन्मादी हुई जहां हिंदू अल्पसंख्यक  में और दूसरे समुदाय के लोग बराबर या बहुसंख्या में हैं। गौरतलब है कि हिंसा अगर बहुसंख्यक समुदाय द्वारा की जाती रही है, तो अल्पसंख्यक समुदाय की भी इस मामले में भूमिका कहीं कम नहीं रही है।

यह अलग विषय है कि खुद पर बुद्धिजीवी का ठप्पा लगाकर घूमने वाले ये लोग जानबूझकर अल्पसंख्यक समुदाय की इन हरकतों को नजरअंदाज करते रहे हैं।
इस हकीकत को एक घटना के जरिए समझते हैं। 30 जून और 1 जुलाई की रात को चांदनी चौक के लाल कुआं बाजार में दुर्गा मंदिर वाली पंक्ति में लगाए गए एक सीसीटीवी कैमरा में चौंकाने वाली घटना रिकॉर्ड हुई। करीब 8 मिनट के वीडियो में साढ़े बारह बजे की घटना कैद है। 9-10 लोगों का यह समूह एकाएक रोड़े-पत्थर बहुसंख्यक समुदाय के लोगों के घरों पर फेंकने लगते हैं। इसी भीड़ ने लोगों के घरों के दरवाजों पर लात-लाठियां मारीं, पार्किंग में खड़े वाहनों को नुकसान पहुंचाया। जिन बहुसंख्यकों के घर पर उन्मादी भीड़ ने हमला किया, उसी में से एक ने कहा कि ये लोग ना केवल ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगा रहे थे, बल्कि और भी कई तरह की धमकियां दे रहे थे। हैरानी यह कि मीडिया ने इस घटना को कवर करने की दिलचस्पी नहीं दिखाई और ना ही ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगाने वालों के खिलाफ इन कथित बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री को खत लिखने की जहमत न उठाई। देश में अल्पसंख्यक वर्ग से आने वाली यही भीड़ तब भी उन्मादी हुई थी, जब नारों और हथियारों के साथ लाखों बहुसंख्यक हिंदुओं को कश्मीर से भगाया गया।

उस उन्मादी भीड़ पर लिखते वक्त इन कथित बुद्धिजीवियों की कलम की स्याही क्यों खत्म हो जाती है ? क्या इन बुद्धिजीवियों और मीडिया के एक वर्ग ने सिर्फ एक ही समुदाय के तुष्टिकरण का ठेका ले रखा है ? इसके अलावा हिंसा से सुलगते कश्मीर में जब भारतीय सेना देश की सुरक्षा की खातिर आतंकियों का सामना कर रही होती है, तो इन्हीं अल्पसंख्यकों की सैकड़ों-हजारों की भीड़ बार-बार सेना पर पत्थर बरसाती रही है। उस समय इन बुद्धिजीवियों और गैर जिम्मेदाराना मीडिया की आंखें अल्पसंख्यकों की भीड़ के उन्माद और सैनिकों के मानवाधिकारों को क्यों नहीं देख पाती ? साम्यवादी सोच से प्रभावित लोगों के गिरोह जब जनजातीय लोगों पर कहर बरपाते हैं, तब किसी बुद्धिजीवी को पिछड़े लोगों के अधिकारों की याद क्यों नहीं आती ? बुद्धिजीवियों का यह दोगलापन समाज के लिए किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता। अपनी वैचारिक निष्ठा के कारण यदि यह लोग यदि एक ही वर्ग के लोगों की बात उनकी सांप्रदायिक पहचान को आधार बनाकर उठाते रहेंगे, तो इसे समूचे समाज का अर्धसत्य ही माना जाएगा और कोई भी अर्धसत्य किसी झूठ से कहीं बड़ा झूठ होता है और प्रभाव में कहीं ज्यादा घातक। अगर आज देश में सांप्रदायिक आधार पर विभाजक रेखाएं खिंच रही हैं, तो ये बुद्धिजीवी उसके लिए सबसे ज्यादा कसूरवार ठहराए जाएंगे।

जहां तक भारतीय समाज की बात की जाए, तो उससे पहले समझना होगा कि कोई भी समाज हिंसा से सौ फीसदी मुक्त नहीं हो सकता। हर समाज में कुछ तत्व ऐसे पाये ही जाते हैं, जिनकी आसुरी प्रवृत्ति उन्हें किसी ना किसी तरह की हिंसा के लिए उकसाती ही रहती है। फिर यह लोग हिंसा को किसी भी रूप में अंजाम दें तो उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। अगर समाज का प्रबुद्ध वर्ग उसे किसी न किसी तरह की सांप्रदायिक पहचान से जोडक़र समाज के शेष लोगों की भावनाओं को भडक़ाता रहेगा तो ये लोग, हिंसा करने वाले लोगों से भी ज्यादा खतरनाक माने जाएंगे। इसलिए सबसे पहले इन्हीं से आग्रह है कि यदि समाज को रहने लायक बनाए रखना है तो इस तरह के प्रपंच करने से बचे। इसके अलावा समाज भी अपनी आंख और कान खुले रखे और हिंसा को केवल हिंसा के रूप में देखकर उसके सही समाधान के प्रयास करें। तभी समाज सुख-चैन से रह सकेगा

 

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