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***विजय कुमार***
ब चपन में एक कहानी पढ़ी थी। एक व्यापारी औरअध्यापक यात्रा कर रहे थे। रास्ते में जंगल भी थे और सुनसान गांव भी। व्यापारी ने समय काटने के लिए अध्यापक से बात करनी चाही। उसने कहा कि एक बात के सौ रुपये लगेंगे। व्यापारी कहीं से अच्छे-खासे नोट कमाकर ला रहा था। जेब गरम होने के कारण उसने अध्यापक के हाथ पर सौ रुपये रख दिए। अध्यापक बोला कि जिससे भी मिलो, सबसे पहले उसका नाम पूछो। इतना कहकर वह चुप हो गया।
व्यापारी को बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा कि अब इससे कोई बात नहीं करूंगा; पर रास्ता लम्बा था। बोरियत होते देख उसने अध्यापक को फिर सौ रुपये दिए। अध्यापक बोला, ‘‘नाम के बाद यह पूछो कि वह कहां का निवासी है?‘‘ इसी प्रकार तीसरी और चौथी बार सौ रुपये लेकर उसने सहयात्री से उसका गांव, काम आदि पूछने को कहा। इसके बाद दोनों के मार्ग अलग हो गए। थोड़ा आगे बढ़ते ही व्यापारी को डाकुओं ने घेर लिया। उसने अध्यापक को बहुत पुकारा। वह दौड़ा हुआ आया भी; पर उसके आने तक व्यापारी लुट चुका था।
व्यापारी नाराज होकर अंट-संट बकने लगा; लेकिन अध्यापक ने धैर्य न खोते हुए कहा कि यदि तुम मेरी बात मानकर मेरा नाम पूछते और फिर नाम से बुलाते, तो मैं जल्दी आ सकता था; पर तुम तो गुरु जी, गुरु जी चिल्ला रहे थे। यह कह कर उन्होंने व्यापारी के चार सौ रुपये वापस किए और अपने रास्ते पर चल दिया।
कहानी का भाव यह है कि नाम हर किसी की प्रमुख पहचान है। बच्चे के गर्भ में आते ही दम्पति संभावित नामों की चर्चा करने लगते हैं। आजकल तो बाजार में इस बारे में कई पुस्तकें भी मिलती हैं। वैसे जिन दिनों जिस नाम का जोर हो, लोग अपने बच्चे का वही नाम रख देते हैं। एक जमाने में राजीव और संजय नाम बहुत रखे गए थे। सचिन, सायना, सानिया से लेकर सद्दाम और ओसामा जैसे नाम भी मिल जाते हैं। दूसरी ओर लोग रावण, विभीषण, कंस, जयचंद और कैकेयी जैसे नाम नहीं रखते।
हिन्दुओं में तो जन्म के बाद पंडित जी को बुलाकर विधिवत बच्चे का नामकरण होता है। अन्य मजहबों में भी ऐसी ही कुछ व्यवस्था होती है; पर इससे पूर्व ही दादा-दादी आदि अपने-अपने नाम गढ़ लेते हैं। यद्यपि पंडित जी वाला नाम आजीवन, और यदि व्यक्ति प्रसिद्ध या बदनाम हो जाए, तो मृत्यु के बाद भी उसकी पहचान बनता है। क्या कहें, नाम की महिमा अपरम्पार है।
पर नामुराद विज्ञान इन दिनों इस नाम को ही मिटाने पर तुला है। सुबह से ही कोड, पासवर्ड और नंबरों का उपयोग शुरू हो जाता है। ऐसा लगता है कि यदि यही गति चलती रही, तो व्यक्ति को उसके नाम की बजाय नंबर और कोड से ही पहचाना जाएगा। बस खतरा यह है कि नंबरों के इस जाल में उलझ कर व्यक्ति का जीवन ही जंजाल न बन जाए।
वर्मा जी कहीं बाहर से आए हैं। घर में घुसने के लिए ताले को जिस कोड नंबर से खोलना है, दुर्भाग्यवश वे उसे भूल गए। वे उच्च रक्तचाप के मरीज थे, अत: तनाव में आ गए। वे समझ नहीं पाए कि क्या करें? तब तक पड़ोस के शर्मा जी आ गए। उन्होंने सुझाव दिया कि ताले वाली कंपनी को फोन करें, तो उनके इंजीनियर आकर आपकी सहायता कर सकते हैं।
मरता क्या न करता। वर्मा जी ने फोन करने के लिए मोबाइल निकाला, तो वह भी लॉक था। तनाव के कारण वे उसे खोलने वाला कोड भी भूल गए। किसी तरह शर्मा जी ने आसपास वालों की सहायता से ताले वाले इंजीनियर से सम्पर्क किया और इस प्रकार चार घंटे बाद वर्मा जी अपने ही घर में प्रवेश कर सके।
उधर गुप्ता जी अपने कम्प्यूटर के सामने सिर पकड़े बैठे हैं। आज न जाने कैसे वे उसे खोलने का पासवर्ड ही भूल गए। पासवर्ड उन्होंने एक डायरी में लिखा था और वह डायरी अल्मारी में है। पर हाय, वह अल्मारी भी कोड नंबर वाले ताले से बंद है, जिसका नंबर उनके कम्प्यूटर की एक फाइल में ही लिखा है। घबराहट में वे उस अल्मारी को खोलने वाला नंबर भी भूल गए। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि अल्मारी को तोडें या कम्प्यूटर को, या फिर अपना सिर ही फोड़ लें। अब आप ही उनकी कुछ सहायता करें।
सुरेश बाबू की परेशानी भी कुछ कम नहीं है। वे किसी काम से आज लखनऊ आए हैं। रास्ते में उनका मोबाइल फोन किसी ने पार कर लिया। अब वे दुखी हैं। उनके ए.टी.एम. कार्ड का पासवर्ड उसी मोबाइल में लिखा है। वे पी.सी.ओ. से कई बार घर फोन मिला चुके हैं; पर श्रीमती जी मंदिर गई हैं। जब तक वे वापस न आएं, तब तक सुरेश बाबू समस्याग्रस्त रहेंगे। क्योंकि उस ए.टी.एम. कार्ड का पासवर्ड उनके अलावा उनकी श्रीमती जी को ही मालूम है। अब सुरेश बाबू मजबूरी में स्टेशन पर बैठकर राम-नाम जप रहे हैं।
सोचिए, कुछ साल बाद क्या होगा, जब वोटर कार्ड से लेकर बैंक खाते तक और टी.वी. से लेकर कार तक को खोलने के लिए स्विस बैंक की तरह नाम नहीं, कोड ही काम करेंगे। दस नंबर वाले ‘आधार कार्ड’ को संभाल कर रखूं या नहीं, यह अभी तक मैं तय नहीं कर पाया हूं। पिछली सरकार ने नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में इसे बनवाया था। तब विरोधी दलों ने बड़ा हंगामा किया था। न्यायालय ने भी बिना संसद की सहमति के बनी इस योजना को बेकार कहा था; पर तब के विरोधी दल अब शासन में हैं, तो वे इसे एक उपयोगी चीज बता रहे हैं और इसके माध्यम से अनेक प्रकार की शासकीय सहायता (सब्सिडी) नागरिकों को दी जा रही हैं।
इससे मिलती जुलती ‘राष्ट्रीय पहचान पत्र’ की योजना पर सरकार काम कर रही है। तब हर नागरिक का नाम नहीं, नंबर ही महत्वपूर्ण होगा। वह कितने अंकों का होगा, कहना कठिन है। उसे याद रखना तो और भी मुसीबत होगा। मुझे भय है कि नंबर की गलती से रामलाल की बजाय कहीं श्यामलाल को ही नौकरी से न निकाल दिया जाए। कल्पना कीजिए, अमरसिंह पैर पटक-पटक कर चिल्ला रहे हैं कि मैं अभी जिन्दा हूं। मृत्यु समरसिंह की हुई है; पर शमशान के कम्प्यूटर में ठीक या गलत, जो नंबर आया है, उसके आधार पर उन्हें चिता पर चढ़ना ही होगा।
मैं पुरानी पीढ़ी का भला आदमी हूं। मेरी प्रभु से प्रार्थना है कि कोड और पासवर्ड के झंझट में फंसने से पहले ही वह मुझे अपने पास बुला ले; पर एक खतरे से मैं फिर आशंकित हूं कि कहीं वहां भी कोड न चलता हो और किसी नंबर या पासवर्ड की गलती से मैं स्वर्ग की बजाय नरक में न पहुंच जाऊं।
मो. : ९७१८१११७४७
 

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