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***संगीता जोशील***
एक बहुत पुराना हिंदी गाना याद आ रहा है, जिसके शब्दकुछ इस प्रकार थे-
चीनो-अरब हमारा, हिन्दोस्ता हमारा
रहने को घर नहीं है, सारा जहॉं हमारा….
पहली लाइन तो बिल्कुल सीधी प्रतीत होती है। उसमें काव्यगुण का अभाव भी लगता है। लेकिन दूसरी लाइन शायर ने ऐसी जोड़ दी है, कि दोनो पंक्तियों को बड़ा गहरा अर्थ प्राप्त होता है। उपरोधपूर्ण भाव पाठक तक पहुंचाने में शायर कामयाब होता है। सारा जहां हमारा होते हुए भी बहुत बड़ा वर्ग ऐसा होता है जिनके लिए घर नहीं है; जिन्हें भूख चोरी करने पर मजबूर कर देती है; कभी कभी गुनाहगार बना देती है। उन वंचित लोगों को ‘सारा जहां हमारा’ यह तो केवल साहित्य कल्पना ही लगती है। दूसरी पंक्ति शायर ने ऐसी ही उपहासपूर्ण भाव से लिखी है।
हसरत जयपुरी ने एक इसी मूड का गीत फिल्म ‘उजाला’ के लिए लिखा था। १९५९ में बनी यह काली-श्वेत फिल्म टेक्निकली तो अच्छी नहीं थी; लेकिन यह संदेश दे रही थी कि इन्सान मूलतः अच्छा ही होता है। परिस्थितियां उसे बुरा होने पर मजबूर कर देती हैं्। वर्ना बिना वजह वह क्यों भटकेगा?
बहुत सी पुरानी फिल्में खूब चलतीं थीं तो उनके गीतों के कारण! ‘उजाला’ का यह गाना इसकी एक मिसाल देता है।
अब कहां जाए हम? ये बता ऐ जमीं
इस जहां में तो कोई हमारा नहीं
अपने साये से भी लोग डरने लगे
अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं….
परिस्थितियों ने इन्सान को इतना असहाय बनाया है, कि वह किसी की मदद के लिए भी मोहताज है।उसे मदद क्यों नहीं मिलती? शायर वजह भी बता देता है। इस जमाने में कोई दूसरे पर भरोसा नहीं करता। विश्वास नहीं रखता।यहां तक कि अपने साये से भी उसे डर लगता है। सब के मन में एक खौफ बसा हुआ है। हम मदद करने जाएंगे, और उल्टा हम ही फंस जाएंगे; इस विचार से लोग आगे आते ही नहीं। सड़क के बीच होने वाले अत्याचारों, या दुर्घटनाओं के समय यह चित्र हमें देखने को मिलता है।
कोई हमारे घर के दरवाजे पर आता है, किसी संस्था के लिए कुछ मदद मांगता है; तो ज्यादातर हम उसे खाली हाथ भगा देते हैं। इसमें दोष हमारा भी नहीं है। क्योंकि आजकल दुनिया भले इन्सानों की दुनिया नहीं रही। ऐसा भी हो सकता है कि मदद के लिए आने वाला व्यक्ति सच्चा भी हो। सचमुच अच्छा काम कर रहा हो।
हम घर घर जाते हैं, ये दिल दिखलाते हैं
पर ये दुनियावाले हमको ठुकराते हैं।
रास्ते मिट गए, मंजिलें खो गईं
अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं…..
अभी भी ऐसे लोग हैं जो यतीम बच्चों को सहारा देते हैं्। फुटपाथ पर पलने वाले बच्चों को शिक्षा देने का प्रयास करते हैं। देश में अच्छे लोग तो हैं; लेकिन ऐसे नाम पर लूटने वाले भी कम नहीं। इसलिए मन में डर पहले आता है, कि सामने जो खड़ा है वह सच बोल रहा है या झूठ! पुराने जमाने में, हम गेहूं खरीदते थे तो साथ में थोड़े कंकर भी होते थे। लेकिन आज जमाना ऐसा है कि हमें कंकर ही मिलते हैं और उसमें से गेहूं के दाने ढूंढने पड़ते हैं।इसलिए हम भी फूंक फूंक कर कदम बढ़ाते हैं।
शायर की कविता का नायक अच्छा आदमी है। उस से जमाना बेदर्दी से ही पेश आता है। वह जिधर जाता है उधर उसे क्या मिलता है?
नफरत है निगाहों में, वहशत है निगाहों में
ये कैसा जहर फैला दुनिया की हवाओं में
प्यार की बस्तियां खाक होने लगीं
अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं…..
किसी अनजान को देखकर हमारी नजर में किसी के लिए नफरत या किसी के लिए इज्जत पैदा होती है। क्यों? क्योंकि हम सामनेवाले के कपड़ों से, उसकी भाषा से उसके बारे में अनुमान लगा लेते हैं। ऊंचे कीमती कपडों पर हम एकाएक भरोसा कर लेते हैं। इसीलिए तो ऐसे लोग बड़े पैमाने पर लोगों को झांसा देकर गायब हो जाते हैं। जैसे बोगस इन्वेस्टमेंट कंपनियां। ‘पॉश’ आफिस, सूट पहने हुए मैनेजर लोगों को आसानी से जाल में फंसाते हैं और लूट के चले जाते हैं। ऐसी घटनाओं से ही हम धीरेधीरे विश्वास खो देते हैं।
कोई फटे हुए कपड़ों में हमारे सामने आता है तो हम उसे फौरन लफंगा समझ लेते हैं। हो सकता है कि वह सचमुच भूखा हो, सिर्फ कुछ खाना मिलने की ही उसे उम्मीद हो; लेकिन हम प्यार से करुणा से उसे देखते ही नहीं। क्योंकि अब किसी को किसी पर भरोसा ही नहीं रहा।
हर सांस है मुश्किल सी, हर जान है इक मोती
बाजार में पर इस की गिनती ही नहीं होती
जिंदगी की यहां कोई कीमत नहीं
अब किसी को किसी पर भरोसा नहीं….
फकीर हो या आला, दोनों की जान तो एकजैसी है न? लेकिन आजकल किसी जान की कोई कीमत नहीं है। मुंबई की लोकल ट्रेन के नीचे कोई आ गया; या ट्रेन से गिरकर कोई मर गया तो लोगों की प्रतिक्रियाएं बड़ी अजीब होती हैं। ‘इसे हमारे ही ट्रेन के नीचे आना था? फिजूल में अब लेट मार्क हो जाएगा!’
न्यूज पेपर भी हम बड़ी स्थितप्रज्ञता से (!) पढ़ते हैं। किसी का खून, किसी एक्सिडेंट की न्यूज पढ़कर भी हम टस से मस नहीं होते। इतने संवेदनाहीन कैसे हो गये हैं हम?
परिस्थितियां हमें ऐसा बना रही हैं? लेकिन ये परिस्थितियां कौन बनाता है? कौन बदलता है? इन्सान ही तो इनको बनाता है। चाहे तो बदल सकता है। आज ये अवांछित दिशा में बदल गई हैं। क्या हम परिस्थितियों को सही दिशा में नहीं ला सकते? परस्पर विश्वास, भरोसा और अपनापन का माहौल नहीं ला सकते? हमें अपने आप को परिस्थितियों के हवाले करने के बजाय हमें उन्हें बदलना चाहिए।
जहां वंचित, उपेक्षित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, उन लोगों को समाने के लिए प्यार और करुणा की बहुत ज्यादा जरूरत है। हमें यह सब बदलना होगा। तभी अंधेरा हटकर उजाला हो सकता है।
यह गीत शंकर-जयकिशन के निर्देशन में मन्ना डे ने गाया था; और शम्मी कपूर पर फिल्माया गया था। १९५९, यह वह जमाना था जब शम्मी ‘याहू’ चिल्लाने वाले, दौड़ते हुए रोमँटिक गाना गाने वाले मजाकिया एक्टर नहीं थे। उन्होंने यह रोल बड़ी गंभीरता से निभाया है। हसरत जयपुरी को यह गाना लिखने के लिए, दिल से सलाम!
मो. : ९६६५०९५६५३
 

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