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***प्रशांत पोल*****
टोसा यह छोटा सा द्वीप, सिंगापुर के आकर्षण का केंद्र है।इस सेंटोसा द्वीप पर एक किला है, ‘फोर्ट सिसेलो’। यह मलय भाषा से उत्पन्न हुआ शब्द है, जिसका अर्थ होता है, पत्थर (मूल संस्कृत शिला)। पिछले चालीस वर्षों से यह किला सिंगापुर के इतिहास का, विशेषतःसैनिकी इतिहास का जीता-जागता स्मारक है। यहां सैनिकी इतिहास का संग्रहालय (म्यूजियम) बनाया गया है। इस म्यूजियम में दूसरे विश्व युध्द के अनेक प्रसंग मूर्तियों द्वारा दर्शाए गए है। इन सब में उस समय का सिंगापुर दिखता है। उसे देख कर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है, कि यह वही सिंगापुर हैं, जहां हम खड़े हैं!
स्वतंत्र सिंगापुर का इतिहास प्रारंभ होता है, सन१९६५ से, अर्थात सत्तर वर्ष पहले से तब सिंगापुर गरीब हुआ करता था एक उपेक्षित सा,दरिद्री, बंजर जमीन का टुकड़ा..! अंग्रेजों ने इस पर राज किया, पर इसे ‘हांगकांग’ जैसा बनाने का कोई प्रयास नहीं किया। दूसरे विश्व युध्द के दरम्यान लगभग चार वर्ष जापानी फौजें और आज़ाद हिन्द सेना का कब्जा इस पर था। लेकिन वे सारे दिन युध्द के थे। देश को बनाने की बात सोचना भी बेमानी था।
अंग्रेजों की हुकूमत के अंतिम दिनों में, सिंगापुर ने मलेशिया के साथ मिलकर फेडरेशन बनाया था। १९६३से ६५ तक सिंगापुर मलेशिया का हिस्सा रहा। पर१९६५ में वहां जातीय हिंसा हुई और तब सिंगापुर को अलग किया गया। एक अलग देश के रूप में खड़े होने वाले सिंगापुर की परिस्थिति तब विकट थी। उजाड़ सी थोड़ी बहुत जमीन थी, जिस पर कुछ उगता नहीं था। सभी आवश्यक वस्तुएं बाहर से मंगानी पड़ती थीं। पानी भी, पड़ोस के देश, मलेशिया से लाना पड़ता था। ले दे कर समुद्री किनारा भर था, लेकिन वह भी उन्नत बंदरगाह के रूप में नहीं था।
ऐसे सिंगापुर को आज के सर्वाधिक विकसित एवं आर्थिक रूप से सक्षम राष्ट्र बनाने में सर्वाधिक योगदान रहा, ‘ली कुआन यू’ का। वे सिंगापुर के मात्र पहले प्रधान मंत्री ही नहीं थे, वरन सिंगापुर के पितृ पुरुष थे। १९६५ से १९९० तक, पच्चीस वर्ष वे सिंगापुर के प्रधान मंत्री रहे। बाद में १९९० से२००४ तक ‘गोहचोकटोंग’ के मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री रहे। इसके बाद २०११ तक, अपने प्रधान मंत्री बेटे के कार्यकाल में वे ‘पालक मंत्री’ रहे। अर्थात लगभग ६० वर्षों का लंबा राजनीतिक जीवन।
उन पर वंशवाद के आरोप लगे। उन्हें तानाशाह भी कहा गया। लेकिन किसी महानगर के बराबर के एक देश को विश्व स्तर का राष्ट्र बनाने का श्रेय निस्संदेह उन्हीं को जाता है। उन्हें खुली अर्थव्यवस्था के मजबूत पैरोकार के रूप में जाना जाता है। आज सिंगापुर दुनिया का पांचवां मुक्त अर्थव्यवस्था वाला देश है। इस मुक्त अर्थव्यवस्था ने सिंगापुर को पैसा, समृध्दि, रोजगार, खुशहाली.. सब कुछ दिया। किन्तु ली कुआन यू का महत्व मात्र इसलिए नहीं है। इन सब से ऊपर, उन्होंने सिंगापुर को एक राष्ट्र के रूप में खड़ा किया, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सिंगापुर की स्वतंत्रता के प्रारंभिक दिनों में सिंगापुर का अत्यंत छोटा आकार यह एक समस्या थी। उसका सभी बातों के लिए मलेशिया जैसे देशों पर निर्भर रहना यह भी नकारात्मक श्रेणी में आता था। लेकिन ली कुआन यू ने इन समस्याओं में भी रास्ता खोजा।
ली कुआन यू मूलतः चीनी थे। लगभग दो पीढ़ी पूर्व उनके पूर्वज चीन से आकर सिंगापुर में बस गए थे। मजेदार बात यह थी, कि ली को चीनी भाषा न तो बोलते बनती थी और न ही लिखते। ली की सारी शिक्षा अंग्रेजी में हुई और पहले उनका नाम भी वह ‘हैरी ली’ लिखते थे। किन्तु बाद में ली ने न केवल चीनी (मंदारिन) सीखी, वरन जापानी भाषा में भी महारत हासिल की। इसके चलते सिंगापुर के चार वर्षों के जापानी राज में उन्होंने जापानी अनुवादक की नौकरी भी की। बाद में ली की पत्नी बनी ‘क्वागिओकचू’ उनके साथ सिंगापुर के प्रतिष्ठित रोफेल इंस्टीट्यूट में पढ़ती थी तथा पढ़ने में अत्यंत तेज थी।
द्वितीय विश्व युध्द समाप्त होने के बाद ली, इंग्लैण्ड के ‘लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स’ से प्रथम श्रेणी में स्नातक बने। इंग्लैण्ड में अंग्रेजों को करीब से जानने के बाद, और विश्व युध्द के दौरान अंग्रेजों द्वारा जापानी फौजों के हाथों पराजय स्वीकार करते देखकर, ली ने ठान लिया था कि सिंगापुर को अंग्रेजों के हाथों से मुक्त कराएंगे। १९४९ में सिंगापुर वापस आने के बाद, सिंगापुर के अंग्रेजी शिक्षित मध्यम वर्गीय परिवारों के साथ उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और १९५४ में ‘पीपल्स एक्शन पार्टी’ बनाई। इस पार्टी के माध्यम से ‘तेजांग पगार’ सीट से वे लगातार जीतते रहे। १९५९ में यह पार्टी ५१ में से ४३ सीटें जीतकर सत्ता में आई।
प्रारंभिक दिनों में ली ने मलेशिया के साथ एक बड़ा फेडरेशन बनाने का प्रयास किया। यह बना भी। लेकिन १९६५ में सिंगापुर में मलय भाषा बोलने वाले मुस्लिमों के एक जुलूस ने चीनी समुदाय पर पत्थर फेंके और यहीं से मलय और चीनी समुदायों में जबरदस्त संघर्ष छिड़ा। इन दंगों से दुःखी होकर मलेशिया के प्रधान मंत्री ने सिंगापुर को फेडरेशन से अलग किया। ९ अगस्त १९६५ को जब यह घोषणा हो रही थी, उस समय ली कुआन यू एक पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्हें अपने आंसू रोकना मुश्किल हो रहा था। फेडरेशन से अलग होना यह ली के लिए एक जबरदस्त आहत करने वाला निर्णय था। लेकिन यहीं से ली का जादू प्रारंभ होता है। इस अपमान का बदला, सिंगापुर को विश्व का सब से विकसित देश बनाकर लेने की ली ने ठान ली थी।

समस्याएँ अनेक थीं। लेकिन ली ने इन सभी को अवसर माना। पहले तो मुक्त अर्थव्यवस्था का माडल अपना कर ‘मेक इन सिंगापुर’ का अभियान चलाया। उसके बाद सिंगापुर को पूर्व और पश्चिम के बीच का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बनाया। फिर उसे एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया।
१९६५ में सिंगापुर के पास जैसे पीने को पानी नहीं था, वैसे ही खुद की सुरक्षा का भी कोई इंतजाम नहीं था। इस बारे में ली ने दुनिया की परवाह ना करते हुए, ईस्राइल की मदद ली और १८ वर्ष के ऊपर के सभी को सैनिकी शिक्षा अनिवार्य की। इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए।
अपने कार्यकाल के प्रारंभ से ही ली ने भ्रष्टाचार के विरोध में कड़ा रुख अपनाया। ‘करप्ट प्रैक्टिसेज इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो’ प्रारंभ किया और उसे ताकत दी, अधिकार दिए। भ्रष्टाचार के विरोध में अनेक कड़े क़ानून पारित किए। आज सिंगापुर दुनिया में तीसरा भ्रष्टाचार मुक्त देश है। १९९४ में उन्होंने अपने मंत्री, न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिकारियों का वेतन निजी क्षेत्र के उच्चतम वेतन से जोड़ दिया। उन्होंने उच्च शिक्षा पर जोर दिया तथा उच्च शिक्षित महिलाओं को अनेक सुविधाएं दीं।
अपनी बात को मनवाने में मशहूर ली पर तानाशाही के अनेक आरोप लगे। सिंगापुर के नागरिकों के व्यक्तिगत जीवन में अतिक्रमण करने के आरोप भी लगे। लेकिन इस सारी प्रक्रिया को ली ने ‘सिंगापुर को राष्ट्र के रूप में खड़े करने’ के अपने जज्बे से जोड़ा।
इसीलिए २३ मार्च २०१५ को दिवंगत ली कुआन यू, जीवित रहते समय ही किवदंती बन गए थे..!
मो. : ०९४२५१ ५५५५१
 

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