महिलाओं पर निर्भर है महिलाओं का विकास

एक ओर जहां नगरीकरण, औद्योगिकरण एवं सांस्कृतिक खुलापन बढ़ रहा है वही नारी अस्तित्व पर आक्रमण भी बढ़ रहे हैं। बलात्कार, भ्रूण हत्या, दहेज, हत्या व अन्य वारदातें समय-समय पर हमारे सामने उपस्थित हो रही हैं। नए कानून एवं सामाजिक निर्देशों के बावजूद भी  आपराधिक मानसिकता कानून को तोड़ने के हथकंडे अपना रही है। हैदराबाद में डॉक्टर युवती पर अमानुष अत्याचार कर युवती के शरीर को जला कर कोयला बनाना, महाराष्ट्र के हिंगणघाट में प्रो़फेसर युवती पर पेट्रोल डाल कर उसे जिंदा जलाना, उन्नाव में  बलात्कार की घटना ये सभी घटनाएं समाज के मन से अब तक गई नहीं है। दिल्ली के निर्भया कांड के नराधमों को फांसी पर लटकाने की संपूर्ण देश बड़ी बेसब्री से राह देख रहा है।

रोजमर्रा के जीवन में अपने घर की महिलाएं कितनी सुरक्षित है, इस चिंता से आज समाज अपरोक्ष रूप में चिंताग्रस्त है। इस बात के लिए सदियों से चली आ रही  सामाजिक मानसिकता जिम्मेदार है। समाज में धर्म, अर्थ, राजनीति, शिक्षा इस तरह सभी क्षेत्रों में स्त्री को एक इंसान के रूप में नकार कर सिर्फ महिला के रूप में ही देखने की परंपरा बन गई है।

इस कारण  “वह महिला है उसे क्या समझता है?, पैर की जूती पैर में ही रहना चाहिए” इस प्रकार की धारणा भारतीय समाज ने बना ली। भारतीय समाज में परंपरा से चलती आई इस समाज व्यवस्था की चिकित्सा किए बिना भारतीय महिलाओं ने नकारात्मक मानसिकता से स्वीकार किया गया और स्त्रियों ने ही आने वाली महिला पीढ़ी तक हस्तांतरित किया गया।

दिल्ली गैंग रेप के बाद प्रदर्शन कर रही लड़की ने एक प्रश्न उपस्थित किया- “शहर में महिलाएं स्वतंत्र नहीं हैं। हम शाम को अकेले बाहर नहीं निकल सकतीं। हमेशा किसी का साथ होना जरूरी होता है।” लड़की के ये उद्गगार समाज का महिलाओं की ओर  देखने का नजरिया स्पष्ट करता है। हमारा समाज लड़कियों को अकेले रहने, अकेले घूमने, अकेले जीने का हक नहीं देता। अगर किसी स्थिति में उन्हें अकेला रहना पड़े तो तमाम नजरें उनकी तरफ संदेह से देखती हैं। आदमी अकेला रह सकता है पर औरत का अकेला होना  समाज को बर्दाश्त नहीं।

कोई महिला या लड़की अकेली दिखे तो अपने शहर की सैंकड़ों नजरें उसे सवाल करती हैं। यह महिला अकेली क्यों है? इसी मानसिक विकृत धारणा से अकेली लड़की को विकृत मानसिकता वाले पुरुष घेर कर उसके अकेले घूमने का अंजाम दिल्ली, हैदराबाद जैसे वारदातों से उसे दे देते हैं।

लड़कियों को बचपन से ही एहसास कराया जाता है कि परिवार में सभी के साथ रहने से वह सुरक्षित रहेगी। दहेज उत्पीड़न के मामले में अक्सर परिवार के लोग ही लड़की को समझाते हैं कि उसे समझौता करना चाहिए, क्योंकि वह सारी जिंदगी अकेले नहीं रह सकती। ऐसी स्थिति में लड़कियां मौत को गले लगा लेती हैं। क्योंकि ससुराल वालों के साथ वह रह नहीं सकती और अकेले रहना उसके लिए और भी मुश्किल है।

ऐसी स्थिति में प्रश्न निर्माण होता है कि समाज व्यवस्था में स्त्रियों को जो दोयम स्थान दिया गया है, वह कब बदलेगा? आज 21वीं शताब्दी में भी स्त्रियों के संदर्भ में समाज की मानसिकता क्यों नहीं बदली है? आज की महिलाएं अपने घर और समाज में क्यों सुरक्षित नहीं हैं? पुरुष प्रधान मानसिकता में परिवर्तन लाने में अपनी शिक्षा व्यवस्था कमजोर क्यों साबित हुई  है? इस प्रकार के  कई प्रश्न आज हमारे सामने उपस्थित हैं। विभिन्न क्षेत्रों में अपना कौशल दिखाने का सपना देखने वाली महिलाओं को बंद दरवाजे के अंदर क्यों ढकेला जाता है? ये प्रश्न निरुत्तर करने वाले हैं। भारतीय समाज व्यवस्था को हम थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो स्त्रियों को दिशादर्शन करने वाली सैकड़ों महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान दे चुकी हैं। पर यह योगदान देते वक्त  उन्हें भी समाज के साथ संघर्ष करना पड़ा है।

आज 21वीं सदी में भारतीय स्त्रियों को अपने सामर्थ्य का एहसास होने लगा है। महिलाओं  की शिक्षा और आर्थिक आजादी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस सभी  परिवर्तन की प्रक्रिया में शिक्षा, आर्थिक और स्व-संरक्षण और आत्मविश्वास के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना भी सबसे जरूरी है। इन सब बातों से महिलाओं में यह भरोसा आता है कि हमें भी सम्मान से जीने का मौलिक अधिकार है।

स्त्री के सहयोग के बिना यदि कोई विकास कार्य किया गया है तो वह आधी मानव जाति के प्रतिनिधित्व के बिना किया गया विकास कार्य है, जो अपनी पूर्ण स्थिति को प्राप्त नहीं है। किसी भी देश की स्त्री जाति की वर्तमान दशा उस देश की स्थिति दर्शाती है। स्वस्थ, समृद्ध, सुखी समाज के प्रत्येक सदस्य को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए; जबकि हमारे समाज में दिल्ली, हैदराबाद, हिंगणघाट जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। नारी भ्रूण हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या अन्य वारदातों के रूप में घटना का गांव और नाम बदल कर समय-समय पर इस प्रकार की घिनौनी बातें हमारे सम्मुख आती रहती है। महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के संदर्भ में सरकारें कानून और नीतियां बनाती हैं पर अमल तो समाज के लोगों को ही करना है।

महिलाओं की सुरक्षा आज उनकी सतर्कता पर ही अवलंबित है। महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक संपन्नता, स्व-रक्षण के संदर्भ में ज्ञान और आत्मविश्वास इन्हीं बातों से मिलना है। इन बातों का विवेक  महिलाओं में निर्माण होना अत्यंत आवश्यक बात है। “स्त्री को क्या समझता है?” “औरत की अकल चूल्हे तक” इस मुहावरे के पीछे  स्त्रियों को बंदी बना कर रखने की जो भावना है, उस भावना को  महिलाओं ने समझना अत्यंत आवश्यक है। “आपको क्या समझता है?” इस संकोच से बाहर निकल कर, “हमें सब कुछ समझता है” इस प्रकार का आत्मविश्वास महिलाओं में निर्माण होना जरूरी है। भारत के सभी क्षेत्रों में अब तक महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा लगा कर कार्य कर रही हैं, इस प्रकार की बातें की जाती हैं। भविष्य में अपने बुद्धि, चातुर्य, मेहनत और लगन से पुरुषों से आगे निकल कर अपना अस्तित्व सिद्ध कर सकती हैं। स्त्री सृजन करती है। नवजीवन के सृजन के लिए स्त्री की भूमिका पुरुष के मुकाबले अधिक महत्वपूर्ण है। हमारे पूर्वज इस तथ्य को भलीभांति समझते थे। इसलिए हमने स्त्री को देवी का रूप दिया। स्त्री शक्ति का वह सम्मान और आदर फिर से निर्माण करना महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक संपन्नता, स्वावलंबन और  स्वसुरक्षा की समझ बढ़ने पर ही निर्भर है।

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