शोक कब तक, हिन्दुओं अब तो जागो


हिन्दुओ! पालघर की घटना से सबक लो। ईसाई मिशनरियों की चाल को समझो। याद रहे संगठित होओगे तो ही बचोगे, अन्यथा साधुओं को जिस बेरहमी से मारा गया वैसे ही  समय समय पर मारे जाओगे। पालघर की घटना शोक नहीं हिन्दुओं में जागृति चाहती है।

पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर को भीड़ द्वारा पीटपीटकर मार डालने की घटना मन को गहराई तक चोट पहुंचाने वाली है, बेहद वेदनादायी है। फिर भी, इस वेदना का सामाजिक जागृति के रूप में उन्नयन करना सकारात्मक है। इस पर हमें अवश्य
चितन करना चाहिए। देश के विभिन्न क्षेत्रों में आए दिन भारत विरोधी विचारधाराओं के माध्यम से इस प्रकार की अलग-अलग घटनाएं होती रहती हैं। इन घटनाओं के केंद्र का पता लगाना, उनकी विचारधाराओं को टटोलना, उनकी कार्य-प्रणाली पर नजर रखना, उनके लक्ष्य को समझना बहुत जरूरी लगता है।

भारत में यह कोई नई समस्या नहीं है। अध्यात्म और सेवा की आड़ में अपना जहरीला मंसूबा पूरा करने के लिए ईसाई मिशनरी लम्बे समय से भारत की भूमि पर प्रयास कर रहे हैं। हिंदुओं की जीवन पद्धति के श्रद्धा-स्थानों और मूल्यों पर प्रहार करना ईसाइयों की गंदी रणनीति का एक हिस्सा है। देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नीतियों का उपयोग करके ईसाई मिशनरी भारत के खिलाफ अपना षड्यंत्र चला रहे हैं।

ईसाई मतांतरण और धर्मांतरण के कारण होने वाली भयंकर राष्ट्रीय -सांस्कृतिक क्षति किस तरह देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरनाक है, यह आज की नई पीढ़ी को समझाना अत्यंत आवश्यक है। भारत में गृहयुद्ध और देशद्रोह का वातावरण फैलाने की उनकी जो रणनीति है, उसके जो शातिर तरीके हैं, उन तरीकों को समझना बहुत जरूरी है। जिन साधनों के माध्यम से ईसाई धर्म प्रचार होता है उन साधनों को  समझना भी उतना ही आवश्यक है।

अनाथालय भारत में ईसाइयों की संख्या बढ़ाने का माध्यम हैं। अकाल, बाढ़, भूकंप तथा इसी प्रकार की अन्य प्राकृतिक आपदाओं के अवसर पर अनाथों को मिलने वाली सेवा यह कोई आश्चर्य नहीं है। जरूरतमंदों की सेवा के पीछे ईसाई मिशनरियों का मूल लक्ष्य उन्हें ईसाई बनाना ही होता है। केवल पिछड़े, आदिवासी या जनजातियां ही उनका लक्ष्य नहीं होते। मिशनरी स्कूलों के माध्यम से शिक्षित समाज में भी ईसाइयों की घुसपैठ हो रही है। धर्मांतरण के पीछे आर्थिक लाभ की लालच भी होती है। पर्वतीय और आदिवासी क्षेत्रों में जरूरतमंदों को ॠण उपलब्ध करवाना, ईसाई धर्म स्वीकार करने पर उस ऋण को माफ कर देना भी धर्मांतरण की एक तरकीब है। धर्मांतरण के लिए ऐसी अनेक तरकीबों का ईसाई मिशनरी इस्तेमाल करते हैं। भोलेभाले आदिवासी हिन्दू जनों को अपने जाल में फांसने के लिए ईसाइयों ने अपने प्रचार में भजन- कीर्तन की प्रथा भी चालू की है। इन भजनों को वे ईसा-भजन और बाइबिल को ईसा-भागवत कहते हैं। ईशावास्योपनिषद में ‘ईशावास्यमिदं सर्वम्’ यह वाक्य होता है। इस वाक्य की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि समस्त जगत ईसाई हो रहा है।

ईसाइयों के शिक्षा, सेवा या विकास कार्य कुछ भी हो सब का एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं का धर्मांतरण ही होता है। पिछड़े हिन्दू जनों को ईसाई विचारधारा के नजदीक लाना, इन लोगों के मन में भारतीय संस्कृति के प्रति घृणा पैदा करना, उसे नष्ट करना और अंत में हिंदुओं का धर्मांतरण करना यही मुख्य हेतु होता है; ताकि जल्द से जल्द इस भरत भूमि को ईसा-लैंड बनाया जा सके। ईसाइयों की रणनीति किसानों, भूमिहीनों, मजदूरों, अनुसूचित जनजातियों एवं बेरोजगार युवक-युवतियों में हिन्दू धर्म के प्रति भ्रम निर्माण करने की है, जिससे भारत सरकार और हिंदू समाज के प्रति घृणा फैलाकर उन्हें अलगाववादी आंदोलक के रूप मे खड़ा किया जा सके। भूतकाल और वर्तमान में देश के विभिन्न क्षेत्रों में जो नक्सली एवं जनजातियों में हिंसक माहौल दिखाई देता है उसके पीछे ईसाई मिशनरियों की बहुत बड़ी राष्ट्र विरोधी विचारधारा कार्य करती है। भारत में हिंसा, आतंकवाद, राष्ट्रद्रोह जैसा माहौल निर्माण करने के लिए जो योजना या गतिविधियां ईसाई मिशनरियों के माध्यम से चल रही हैं उसी के परिणाम
स्वरूप पालघर में साधुओं की हत्या तथा केरल, छत्तीसगढ़, झारखंड, दक्षिण भारत जैसे इलाकों में नक्सली एवं अन्य हिंसक घटनाएं होती रहती हैं।

जब जब आदिवासी क्षेत्र में, पर्वतीय क्षेत्रों में धर्मांतरण या ईसाइयों के बढ़ते प्रभावों को रोकने का प्रयास होता है, तब तब वहां ईसाई संस्थाओं से प्रेरित अलगाववादी हिंसाचार भड़क उठता है। इससे देश की अखंडता और हिंदू वर्ग को बड़ा खतरा निर्माण होता है। अपने उद्देश्य को ध्यान में रखकर क्रूर, हिंसक संगठनों को ईसाई मिशनरी निमंत्रित कर रहे हैं। अपना मकसद पूरा करने के लिए माओवाद, नक्सलवाद का इस्तेमाल करना उनकी नीतियों का एक हिस्सा बन चुका है। वे जानते हैं कि आदिवासियों, जनजातियों में जो हिन्दू भाव है उसे नष्ट किए बिना भारत पर ईसाई विचारधारा राजनीतिक और धार्मिक नियंत्रण प्राप्त नहीं कर सकती। इसी कारण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वे जगह जगह पर नक्सलवाद- माओवाद जैसे भयंकर हिंसक संगठनों को निरंतर प्रोत्साहित करते रहते हैं। झारखंड़, छत्तीसगढ़, उड़ीसा तथा दक्षिण भारत के राज्यों में हजारों ईसाई मिशनरियों को प्रशिक्षित करके वहां की स्थिति बिगाड़ने के लिए भेजा जाता है। प्रशिक्षित मिशनरी आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासियों, जनजातियों को भारत देश और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ भड़काकर उनमें विद्रोह की भावना निर्माण करते हैं। उनमें पनप रही विद्रोही भावनाओं को वे सेवा अथवा हिंसा जैसे हर तरह के प्रयासों से भारत विरोधी कट्टरता में परिवर्तित करते हैं। हिंदू धर्म में लोग आदिवासियों, पिछड़ी जनजातियों को किस प्रकार अपना नहीं मानते, वे हिंदू धर्म के लिए अस्वीकृत और तिरस्कृत किस प्रकार से है, इस प्रकार की मनगढ़ंत विकृत बातें आदिवासियों और जनजातियों के मन मस्तिष्क में ठूंस ठूंस कर भरते हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर केरल तक, आंध्र से लेकर महाराष्ट्र के पालघर जिले तक जो हिंसाचार हमें हिंदुओं के खिलाफ, सरकार की नीतियों और सरकार की व्यवस्था के खिलाफ आदिवासियों, पिछड़ी जनजातियों में दिखाई देता है उसके पीछे मिशनरियों का यह बहुत बड़ा षड्यंत्र काम करता है।

ईसाई मिशनरी अनुसूचित जनजातियों और आदिवासियों में विद्रोह भड़काने का प्रयास पुरजोर ढंग से कर रहे हैं। इन भ्रमित लोगों के माध्यम से ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है, इन्हीं भ्रमित लोगों के माध्यम से वैटिकन के लिए वफादार सेना भारत में ही निर्माण हो रही है। वही भ्रमित लोग भारत की सरकारों को हानि पहुंचाकर वैटिकन के सपने को साकार करने के लिए ईसाई मिशनरियों को सहयोग देते हैं। चर्च के अधिकृत ऑपरेशन वर्ल्ड में स्पष्ट कहा गया है कि ईसाई को ईश्वरीय आदेश है कि ईसाई विरोधी सरकार पलट दें।

मिशनरी भारत को ईसाई राष्ट्र बनाने की योजना को क्रियान्वित करने के लिए साम्यवादी -नक्सलियों का हिंसक समर्थन जगह-जगह पर ले रहे हैं। विनाशकारी हिंसा और हिंसाचार के माध्यम से भारत सरकार को अस्थिर करने का यह प्रयास है। ऐसे समय में भारत की राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित होकर ईसाइयों को रोकने के प्रयास करने चाहिए। हम भारतीयों की भयंकर परीक्षा का समय अब प्रारंभ हुआ है। आज हमें अपनी मातृभूमि की संस्कृति की रक्षा के लिए दूरदर्शी दृष्टिकोण से, भावुकता को छोड़कर ईसाई मिशनरियों के सामने कार्य करना है। ईसाई मिशनरियों की कूटनीति को समझकर हमें भारत के आदिवासियों, जनजातियों में अपना कार्य प्रारंभ करना चाहिए। पालघर की घटना में साधुओं को जिस प्रकार से दर्दनाक तरीके से मारा गया है, उस घटना पर सिर्फ शोक प्रकट करके हमें रुकना नहीं है। हमें प्रत्यक्ष रूप में इस विषय को लेकर समाज में सकारात्मक रूप में सच्चाई को लेकर जाने की जरूरत है।

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ईसाई संस्थाओं के बारे में हर प्रदेश में अध्ययन दल बनाया जाए। अध्ययन दल ईसाई संस्थाओं के बारे में सर्वेक्षण करें। ईसाइयों के राष्ट्र विरोधी, अलगाववादी षड्यंत्र जैसे कार्यों पर प्रकाश डालें। स्थानीय समाचार पत्रों एवं अन्य प्रसार माध्यमों के माध्यम से ईसाइयों के विनाशकारी कार्य के संदर्भ में समाज में जागरूकता लाने का प्रयास करें। ईसाई शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने वाले छात्रों के अभिभावकों को ईसाई मिशनरियों के छद्म उद्देश्य के बारे में समय समय पर सही
जानकारी उपलब्ध करवाई जानी चाहिए।

हिंदू समाज का प्रत्येक जागरूक व्यक्ति और संस्था या संस्थाओं के कार्यकर्ता कम से कम एक आदिवासी या जनजाति परिवार को अपना मित्र बनाए। उनके जन्म, मृत्यु, बीमारी, शोक, विवाह, उनके सांस्कृतिक त्योहारों में सम्मिलित हो। आदिवासी जनजातियों में उनके हिंदू होने के संदर्भ में भाव जागृत करें। हर हिंदू कार्यकर्ता प्रतिदिन अपने संपर्क में आने वाले हर हिंदू से कम से कम 5 मिनट इस धर्मांतरण के खतरे और निराकरण के संदर्भ में अनौपचारिक वार्ता करें। ईसाई संगठनों के माध्यम से निर्धन और जरूरतमंद व्यक्तियों में तथाकथित सेवा कार्यों के लिए सहायता दी जाती है। उसके हेतु के संदर्भ में जानकारी रखने का प्रयास करें। राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं को संगठित होकर वनवासियों के पिछड़े गांवों तथा शहरों की अभावग्रस्त बस्तियों में संपर्क करने का प्रयास करें। शिक्षा, चिकित्सा तथा भारतीय संस्कृति, धर्म का प्रचार साहित्य उन तक पहुंचाने का प्रयास हो।

गांवों और शहरों में जो मंदिर, गुरुद्वारा, धार्मिक स्थान, भारतीय संस्कृति से प्रेरित विद्यालय हैं उनके माध्यम से भारतीय संस्कृति के महत्व को प्रकट करने वाले कुछ कार्यक्रम समय-समय पर आदिवासियों या जनजातियों की बस्तियों में प्रस्तुत करने योजना हो।

हिंदू समाज के संत महात्माओं, लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, उद्योजकों और सभी प्रमुख जातियों के मुखियाओं को ईसाई मिशनरियों की कूटनीति के प्रति जागृत किया जाए। इन्हें भारतीय संस्कृति की रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के कार्य में सक्रिय एवं सजग होकर अपने अपने कार्य क्षेत्रों में सहयोग देने के लिए उत्साहित किया जाए।

ईसाई मिशनरी धर्मांतरण के माध्यम से हिंदुओं की जीवन पद्धति, श्रद्धा केंद्रों, सम्मान-प्रतीकों और जीवन मूल्यों पर कठोर प्रहार कर रहे हैं। आज पालघर में जो घटना घटी और भगवा वस्त्रधारी साधुओं को जिस क्रूरता से पीट-पीटकर मारा गया यह कोई एक सामान्य घटना नहीं है। आदिवासियों और जनजातियों के मन में हिंदू समाज के संदर्भ में जो घृणा का भाव कूट कूट कर निर्माण किया गया है, इसी हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी प्रयासों का परिवर्तन पालघर जैसी साधुओं की निर्मम हत्या की घटनाओं में होता
है। ईसाई मिशनरियों के माध्यम से भयंकर राष्ट्रीय- सांस्कृतिक क्षति, देश की एकता और अखंडता की सुरक्षा के लिए हम सभी को ईसाइयों के इस षड्यंत्र को बहुत बारीकी से समझना होगा। इस षड्यंत्र के खिलाफ जागृत होकर खड़ा होना है। राष्ट्रीय शक्तियों को ईसाई मिशनरियों की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के विरोध में संगठित किया जाना आवश्यक है। अब हमारी संस्कृति और देश की रक्षा करने का समय आ गया है। समय की जरूरत को समझकर हिन्दुओं को भविष्य में संगठित होकर काम में लगना आवश्यक है। हिन्दुओ! याद रहे संगठित होओगे तो ही बचोगे, अन्यथा पालघर में साधुओं की जिस तरह निर्मम हत्याएं हुईं वैसे ही समय समय पर मारे जाओगे। पालघर की घटना शोक नहीं हिन्दू जागृति चाहती है। हिन्दू जागरूक होकर इस स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन लाएगा या शोक ही मनाता रहेगा? आने वाला भविष्य इसी बात के इंतजार में है।

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