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य द्यपि पर्व और त्यौहारों की महत्ता एवं उद्देश्यपरकता सर्वविदित और निर्विवाद है तथापि कुछ पर्व और त्यौहार जाति विशेष के उद्भव, विकास और गौरव के प्रतीत होते हैं। एैसा ही पर्व ‘श्री महेश नवमी’ है। श्री महेश नवमी पर्व माहेश्वरी जाति का जीवन मंत्र है, जो प्रत्येक माहेश्वरी को कर्म को प्रतिबोध कराता है। धर्म की व्याख्या समझाता है और सामाजिक जीवन के यथार्थ को सुपरिभाषित करता है। विश्व में श्री महेश नवमी ही एक मात्र ऐसा पर्व है, जो एक साथ राष्ट्रीय, धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का विराट स्वरूप अपने आप में समाहित किए हुए है।
यहां सक्षेप में माहेश्वरी के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालना प्रासंगिक होगा। भगवान महेश और भगवती पार्वती की असीम अनुकंपा से माहेश्वरी जाति की उत्पत्ति हुई। इसमें किसी प्रकार की शंका करना स्वयं पर ही अविश्वास करने के समान है। माहेश्वरी समाज की धर्म के प्रति आस्था, आचरण की शुचिता, कर्म के प्रति सजगता और सेवा प्रति तत्परता इस बात को सत्यापित करती है कि माहेश्वरी जाति भगवान महेश की ही संतति है। वैसे दार्शनिक मान्यता भी यही कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की संतान है। यह बात अलग है कि कोई मानता है और कोई नहीं मानता है। जहां तक माहेश्वरी समाज का प्रश्न है, तो समाज निश्चित रूप से स्वयं को ईश्वर की संतान मानता है और उसी अनुरूप आचरण भी करता है।
विश्व में अनेक बार धार्मिक क्रांतियों का सूत्रपात हुआ। फलस्वरूप अनेक धर्मों का उदय हुआ। प्रत्येक धर्म के प्रचार -प्रसार में धर्म प्रचारकों ने साम, दाम, दंड और भेद का सहारा लिया। बलात् धर्म परिवर्तन की घटनाओं से तो इतिहास के अनेकानेक पन्ने रंगे हुए हैं। सनातन धर्म इसका अपवाद है। विश्व के इस प्राचीनतम धर्म ने कभी भी अपनी धार्मिक मान्यताओं को बलपूर्वक किसी पर नहीं थोपा। माहेश्वरी समाज ने सनातन धर्म की रक्षा में सदैव स्वयं को समर्पित रखा। इसका मूल कारण माहेश्वरी समाज का दैवीय उत्पत्ति सिद्धांत रहा।
वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म के सामाजिक जीवन का आधार रही। प्रत्येक वर्ण मेें कर्मानुसार अनेक जातियों और उपजातियों की उत्पत्ति हुई, किंतु राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी समूह द्वारा एक वर्ण को त्याग कर दूसरे वर्ण में जाना और सफलता के शीर्ष तक पहुंचना बहुत ही जोखिम भरा और साहसपूर्ण कार्य था। माहेश्वरी समाज ने यह जोखिम उठाया। क्षत्रिय धर्म त्याग कर वैश्य धर्म अंगीकार किया और देश के वित्त और वाणिज्य का गति और नवीन दिशा दी। इसे माहेश्वरी समाज की राष्ट्र के प्रति भक्ति भावना की पराकाष्ठा माना जा सकता है।
श्री महेश नवमी पर्व प्रति वर्ष माहेश्वरी समाज को आत्म गौरव और राष्ट्र के प्रति दायित्व बोध का स्मरण कराता है, जिसे कभी उनके पूर्वजों ने स्वीकार किया था। यह पर्व माहेश्वरी समाज को समर्थ बनने का संदेश देता है, क्योंकि समर्थ व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र की सही अर्थों में सेवा कर सकता है। श्री महेश नवमी पर्व महान सांस्कृतिक विरासत को अपने देश अंतर समाए हुए हैं, जिस पर संपूर्ण माहेश्वरी समाज को आत्मभिमान होना चाहिए। यह पर्व हमें बताता है कि जीवन का धर्म क्या है, मनुष्य का कर्म क्या है, प्राणी का धर्म क्या है और जीव मात्र का चरम लक्ष्य क्या है? माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति का यह पर्व समाज के सांस्कृतिक उत्थान और स्थिरता को परिभाषित करता है। आज माहेश्वरी समाज मात्र भौतिक संपदा से ही नहीं, वरन् सांस्कृतिक संपदा से भी सुसंपन्न है। उसका संपूर्ण श्रेय श्री महेश नवमी पर्व के प्रति समाज की अटूट आस्था को जाता है। सेवा, त्याग, सदाचार, विनम्रता, विद्वत्ता, आध्यात्मिकता, सहिष्णुता, उदारता, बंधुता, समता, सादगी, सकारात्मकता और दानशीलता जैसे जीवन मूल्य प्रचुरता से हमारी सुसंपन्नत सांस्कृतिक विरासत को उद्घोषित करते हैं और यह जात्योत्पत्ति पर्व इन मूल्यों के संवर्धन में केन्द्रीय भूमिका निभाता है। बेशक जात्योत्पत्ति पर्व हमारे जातीय स्वाभिमान का हमें स्मरण करता है। फिर भी निरंतर आत्मचिंतन और आत्मावलोकन का संदेश होता है, क्योंकि देशकाल और परिस्थितियां किसी भी समाज की जीवनचर्या और विशिष्टताओं को प्रभावित करती हैं। ऐसे में सतत जागरूक रहना परमावश्यक है।

आज पश्चिम की विषाक्त हवाएं बड़ी तेजी से भारतवर्ष की और बह रही हें और हमारा समाज भी इतर भारतीय समाजों की तरह इनकी चपेट में है। इसी का दुष्परिणाम है कि सादगी का स्थान कृत्रिमता और आडंबर ने ले लिया है। भोग और विलासिता में अर्थ को पानी की भांति बहाया जाता है। स्वतंत्रता के स्थान पर स्वच्छन्दता का नग्न नर्तन हो रहा है। मर्यादा की दीवारें रेत के टीले की भांंति भरभराकर ढह रही हैं। परिवार व्यवस्था दम तोड़ती जा रही है। समाज और परिवार में सामंजस्य की भावना गायब होती जा रही है। कन्या भ्रूण हत्या, अंतरजातीय विवाह, ग्राम और नगरीय जीवन के बीच विभाचन, अपव्यय, होटल संस्कृति, मिथ्याभिमान जैसी विकृतियां समाज में प्रविष्ट होती जा रही हैं। सामाजिक संबंधों में अविश्वास बढ़ता जा रहा है। संक्षेम में कहा जाए तो अपसंस्कृति का खतरा हमारे जैसे प्रबुद्ध और सुसंस्कृत समाज पर भी मंडराने लगा है। ऐसे में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला जात्योत्पत्ति पर्व संजीवन बूटी सिद्ध हो सकती है। आओ, हम सामूहिक रूप सें चिंतन करें कि क्या हम भगवान महेश के आदर्शों पर चल रहे हैं। कहीं हम भटक तो नहीं रहे हें? इसी में जात्योत्पत्ति पर्व को मनाने की सार्थकता है। महेश नवमी पर्व सभी के लिए सुख-सौभाग्यदायी हो, यशोकीर्तिवर्धक हो और परमकल्याणकारी हो, यही आराध्य देवता महेश से प्रार्थना है।
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