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***दिलीप ठाकुर****
लगभग पच्चीस साल पूर्व मनमोहन देसाई से हुई बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि श्रेष्ठ तकनीकी फिल्में हमारी फिल्म इंडस्ट्री या दर्शकों की आवश्यकता नहीं हैं। इसके दो कारण हैं- पहला कैमरे का उत्तम तरीके से उपयोग करके चित्रित की गई फिल्मों को प्रदर्शित करने के लिए जिस इफेक्टिव थिएटर की जरूरत होती है वह हमारे देश में ज्यादा नहीं है। मुंबई, दिल्ली, बंगलुरु जैसे महानगरों के कुछ विशेष भागों में ही उस स्तर के थिएटर हैं। दर्शक इस बात पर ध्यान नहीं देते कि कोई फिल्म किस प्रकार चित्रित की गई है या उसमें कौन सी तकनीक का प्रयोग किया गया है। उन्हें केवल इस बात से मतलब होता है कि परदे पर जो चल रहा है वह व्यवस्थित रूप से दिखाई दे रहा है और समझ में आ रहा है।
मनमोहन देसाई का यह मुद्दा उस समय के लिए बिलकुल सटीक था। परंतु मैं आज ये सब क्यों बता रहा हूं? वह इसलिए कि उस समय ‘बाहुबलि’ जैसी खर्चीली और स्पेशल इफेक्टवाली फिल्म को दर्शक पसंद नहीं करते। उस समय इस तरह की स्पेशल इफेक्टवाली फिल्में जैसे जय-विजय, रानी और लाल परी, बंडलबाज जैसी फंतासी फिल्में आईं परंतु वे दर्शकों को आकर्षित नहीं कर सकीं। इनकी जगह दर्शकों ने सभी प्रकार का मसाला भरी हुई फिल्मों को खूब सराहा।
बाहुबलि के प्रदर्शन तक अर्थात सन २०१५ तक इस परिस्थिति में अत्यधिक परिवर्तन हुआ। मल्टिप्लेक्स युग की शुरूआत हो चुकी है। देश के महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक भी श्रेष्ठ तकनीक वाले थिएटर खुल गए हैं।
अब खुली अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण, शहरी जीवन संस्कृति की बदलती शैली, होम थिएटर इंटरनेट आदि के कारण दुनिया भर की फिल्मों देखी जा सकती हैं। इन सब के कारण दर्शक उत्तम तकनीक और स्पेशल इफेक्ट का उपयोग करके बनाई गई फिल्में भी चाव से देखने लगे।
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी काफी बदलाव हुए। हिंदी फिल्मों के निर्माण का खर्च पचास-सत्तर करोड़ तक बढ़ गया और उनसे तीन सौ-चार सौ करोड रुपयों की कमाई होने लगी। फिल्मों की गुणवत्ता के स्थान पर इन आंकडों को प्रसार माध्यमों में अधिक महत्व मिलने लगा। इस बढ़ी हुई कमाई से निर्माण का खर्च, प्रमोशन, मार्केटिंग का खर्च इत्यादि सब कुछ घटाने के बाद जो शेष रहता है उसे सही मायने में कमाई कहा जाना चाहिए, परंतु इस बात पर कोई ज्यादा ध्यान नहीं देता। यह फिल्म व्यवसाय की सफलता जरूर होगी, परंतु कला की असफलता होगी। जब तक यह बात सोची गई तब तक ढाई सौ करोड़ की ‘बाहुबलि’ प्रदर्शित हो गई और उसे बहुत सफलता भी मिली।
बाहुबलि हमारे देश की ऐसी सबसे सफल फिल्म है जिसने स्पेशल इफेक्ट पर अत्यधिक खर्च किया है। फिल्म में एस.एस.राजामौली की सुंदर पटकथा से भी तकनीक अधिक दमदार दिखाई देती है। इस बात कोई प्रशंसा के रूप में कहता है तो कोई मजाक उड़ाने के लिए परंतु फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर कमाई की यह बात माननी ही होगी। फिल्म के कुछ दृश्य इतने शानदार हैं कि दर्शकों की आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। आकाश से जमीन पर गिरने वाला जलप्रपात, महिश्मती राजा का राजमहल और अंतिम दृश्य में रणभूमि पर होने वाला संग्राम इत्यादि इतने उत्कृष्ट हैं कि पूछिए ही मत। इसके लिए हमेशा उपयोग किया जाने वाला कैमरा उपयुक्त नहीं था। अत: ग्रीन स्क्रीन इफेक्ट, कंप्यूटर ग्राफिक्स इत्यादि आधुनिक तकनीक का प्रभावपूर्ण और भरपूर उपयोग किया गया है। खास बात यह कि सभी प्रकार के सभी स्तर के लोगों को वह बहुत पसंद आया। तात्पर्य यह कि प्रत्यक्ष रुप से सेट पर फिल्म जितनी चित्रित की गई उससे अधिक विकास कंप्प्यूटर पर हुआ।
फिल्म कैसे बनती है इसका आधुनिक काल का यह उत्तम उदाहरण है तथा कैसी फिल्म देखनी चाहिए इसका उत्तर दर्शकों ने यह फिल्म देखकर दे ही दिया है। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘बाहुबलि’ जैसी उच्च तकनीक वाली फिल्म तमिल में बन रही है और वह अन्य प्रादेशिक भाषाओं के साथ ही हिंदी में भी डब हो रही है यह हिंदी फिल्म के दर्शकों को पहले से ही पता था।
आजकल उपयोग में आनेवाले डिजिटल कैमरे की इमेज हरे रंग के लिए अधिक अनुकूल है। परंतु इसके बावजूद कलाकारों को हरे रंग की पोशाक पहनाना उचित नहीं होता। बाहुबलि के लिए इन करामातों का चित्रीकरण हैदराबाद के रामोजी फिल्म स्ठूडियो में किया गया।
बीस साल पहले जुरासिक पार्क ने इसी तरह की सफलता प्राप्त की थी। हालांकि हमारे यहां उसी समय इस तरह की फिल्में बननी चाहिए थीं। वीएफएक्स इसी प्रकार की एक महंगी तकनीक है। इसके एक सेकण्ड के लिए ५-७ हजार रुपये का खर्च होता है।
हॉलीवुड की ‘अवतार’ फिल्म इसी तरह की तकनीकी कुशलता से परिपूर्ण फिल्म थी।
‘बाहुबली’ की सफलता के बाद हमारे देश में भी अब इस प्रकार की फिल्मों के निर्माण में बढोत्तरी होने की संभावना है। इसका कारण यह है कि निर्माता अब इस तरह के फिल्मों के निर्माण में पैसा लगाने को तैयार हैं। वे विदेशों से भी तकनीक लेने में अब हिचकिचाते नहीं हैं। अब भारत में ऐसे मल्टीप्लेक्स भी बन गए हैं जो इन सारे स्पेशल इफेक्ट्स को सुंदर तरीके से प्रदर्शित कर सकते हैं। दर्शकों में भी अब इस प्रकार की फिल्मों का आनंद लेने की भावना जागृत हो गई है।
अब इस तरह की तकनीक के चमत्कार के लिए ‘थीम’ भी मजबूत होना आवश्यक है। इसलिए कुछ पुरानी हिंदी फिल्मों जैसे पारसमणि, राजा और रंक, अजूबा, पाताल भैरवी आदि काल्पनिक कथाओं पर आधारित फिल्मों का रीमेक किया जा सकता है।
बाहुबलि स्पेशल इफेक्ट पर अधिक खर्च करनेवाली फिल्मों का ‘ट्रेंड सेटर’ बन गई है। इस फिल्म की सफलता केवल यहीं तक सीमित नहीं है। उसके पात्रों पर सोशल मीडिया में कई जोक्स फैल रहे हैं। इस तरह के चुटकुलों या दंतकथाओं का जन्म होना ही फिल्म की ‘असली’ सफलता है।
पहले कहा जाता था कि तकनीकी कुशलता के कारण कहीं फिल्म का असली मतलब न खो जाए। उस समय के हिसाब से यह ठीक था। परंतु अब जब आदमी अपने मोबाइल में भी इतनी तकनीक का उपयोग करता है तो अपने आप ही वह बाहुबलि जैसी फिल्मों में उपयोग की गई तकनीक से ‘कनेक्ट’ हो जाती है। समाज और फिल्म का नाता कितना दृढ़ है यह समय-समय पर सामने आता रहता है। बाहुबलि की सफलता भी ऐसा ही कुछ संदेश देती है।
मो.ः ९८७०६१६२१६

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